आपकी डिजिटल लाइफ कहीं निजता न खत्म कर दे?

भारत में आईटी एक्ट की धारा 69 (2) में साधारण डेटा लीक होने पर 3 साल, संवेदनशील डेटा में 10 साल सजा का प्रावधान है किंतु इस कानून के माध्यम से अब तक कोई विशेष राहत नहीं मिली है।

Data Privacy
भारत में आईटी कानून और डाटा सुरक्षा। (Express Illustration)

जितेंद्र पारख एवं अभिनव नारायण झा
कोरोना वायरस के कई प्रभावों में से एक प्रभाव यह भी है कि इस महामारी ने अधिक से अधिक लोगों को डिजिटल अर्थव्यवस्था में भाग लेने के लिए मजबूर किया है। डिजिटल युग में जहां तमाम सरकारी और निजी कार्यक्रम व्हाट्सएप, गूगल, फेसबुक, वेबेक्स आदि डिजिटल एवं सोशल प्लेटफॉर्म में हो रहे है ऐसे में डाटा सुरक्षा कैसे होगा यह सवाल जायज है?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत 21वीं सदी के डिजिटल परिदृश्य को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहता है तो उसे डेटा तथा उसकी सुरक्षा के संबंध में कार्य करना चाहिए। लोकल सर्कल्स सर्वे में पता चला है कि करीब 33 प्रतिशत भारतीय कंप्यूटर पासवर्ड्स, बैंक अकाउंट्स, क्रेडिट और डेबिट कार्ड नंबर और पिन जैसा डाटा असुरक्षित तरीकों से स्टोर करते हैं। सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि यूजर्स इस डाटा के अलावा आधार और पैनकार्ड जैसे डिटेल्स भी अपने कॉन्टैक्ट नंबर्स की लिस्ट में या फिर ईमेल पर स्टोर करते हैं।

भारत में निजी डाटा चोरी एवं दुरूपयोग का मामला इतना बढ़ चुका है किसी बीआई ने भारत में 5.62 लाख फेसबुक यूजर्स का डाटा चोरी होने के मामले में कैम्ब्रिज एनालिटिका लिमिटेड और ग्लोबल साइंस प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया है। इतना ही नहीं निजी कंपनी द्वारा लाखों आधार कार्ड की जानकारी लीक होना, व्हाट्सप्प हैक कर डाटा चुराना आदि बेहद सामान्य बात हो गई है।

क्या कहता है कानून?
भारत में आईटी एक्ट की धारा 69 (2) में साधारण डेटा लीक होने पर 3 साल, संवेदनशील डेटा में 10 साल सजा का प्रावधान है किंतु इस कानून के माध्यम से अब तक कोई विशेष राहत नहीं मिली है। मार्च 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने डेटा चोरी के मामले में कानून नहीं होने को लेकर भी सवाल खड़ा किया है तथा शीर्ष अदालत ने कहा है कि जब डेटा चोरी पर कानून नहीं है तो आधार डेटा कैसे सुरक्षित रहेगा?

इसी तारतम्य में केएस पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना तथा इसी के व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक, 2019 अस्तित्व में आया लेकिन यह विधेयक अब तक कानून नहीं नहीं बना है। इस विधेयक में डाटा चोरी करने वाले को 3 साल की सजा और करोड़ों के जुर्माने का प्रावधान है किंतु जब तक कानून अस्तित्व में नहीं आता तब तक जागरूकता ही समाधान है।

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ऐसे रहे सुरक्षित?
दोहरा सत्यापन लगभग सभी सेवाएं (ईमेल, सोशल मीडिया इत्यादि) अब दोहरे सत्यापन का विकल्प देती हैं। सुरक्षा सेटिंग्स के माध्यम से आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। जब आप दोहरी सत्यापन व्यवस्था को इनेबल या सक्षम कर देते हैं, तो हर बार जब आप किसी डिवाइस पर अपने खाते में लॉग-इन करते हैं, तो आपको पासवर्ड के साथ ओटीपी देना होता है। ओटीपी सुरक्षा कोड होता है जो अपने आप जेनरेट होता है। ज्यादातर यूजर्स इस विकल्प को सक्षम नहीं करते हैं। कारण है कि इससे लॉग-इन प्रक्रिया में असुविधा होती है। हालांकि, नहीं भूलना चाहिए कि इससे आपके खाते की सुरक्षा बढ़ जाती है।

करें डिजिलॉकर का उपयोग
भारत सरकार द्वारा डिजिलॉकर एप्लीकेशन की शुरुआत की गई है, इस पहल के तहत आवेदन के आधार से जुड़ा हुआ 10MB का समर्पित व्यक्तिगत भंडारण स्पेस मिलता है जहां सुरक्षित रूप से ई-दस्तावेजों एवं यूआरआई लिंक को रखा जा सकता है एवं एक्सेस किया जा सके। इतना ही नहीं इस एप्लीकेशन में बहुत सारे सरकारी दस्तावेजों को सिर्फ डिटेल्स के आधार पर फेच किया जा सकता है, जैसे ड्राइविंग लाइसेंस, आधार कार्ड, पैनकार्ड और भी बहुत कुछ। इससे इश्यूअर और वेरिफायर के बीच ऑथेंटिकेशन के आधार पर सुरक्षित तरीके से दस्तावेजों का आदान-प्रदान होता है।

समय रहते, हमें डाटा प्राइवेसी की कीमत को समझना होगा। यह बेहद सही कहा गया है “डाटा इस द न्यू आयल”। देश में एक ऐसा डिजिटल तंत्र तैयार करने की आवश्यकता है जिस मे डाटा प्राइवेसी और निजता के अधिकार की प्रधानता हो।

jitendra parakh abhinav narayan jha
अभिनव नारायण झा कानून और संविधान के जानकार तथा अधिवक्ता है। जितेंद्र पारख स्वतंत्र पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक है।

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