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Blog: गुजरात में दलित सुरक्षित नहीं, सरकार ने करोड़ों रुपये खर्चकर छुपाई सच्‍चाई

पिछले पन्द्रह वर्षों में गुजरात में दलितों पर हुए अत्याचारों की संख्या खुद इसकी गवाह है। आधुनिकता और विकास के मॉडल का चेहरा ओढ़े गुजरात का इतिहास मानवीय क्रूरता का रक्तरंजित इतिहास रहा है।

Author July 24, 2016 1:49 PM
ऊना में दलित युवकों की पिटाई के बाद से गुजरात में दलित प्रदर्शन कर रहे हैं।

गुजरात के ऊना जिले में चार दलित युवकों के साथ कथित गौ रक्षकों के अमानुषिक क्रूरतम जाति उत्पीडन की जघन्य घटना सबूत है कि गुजरात में दलित सुरक्षित नहीं। कथित सवर्णों द्वारा दमन शोषण उत्पीड़न के शिकार दलित गुलाम जैसी स्थिति में जीने को मजबूर किए जा रहे हैं। जातिगत घृणा, तिरस्कार, छुआछूत के कारण हो रही जघन्य अत्याचार, दलित स्त्री पर बलात्कार की अनगिनत घटनाओं को राज्य तंत्र के दबाव में पुलिस भी अनदेखी करती है| ऊना उत्पीडन घटना की रिपोर्ट पुलिस ने दो दिन बाद दर्ज की। दलित उत्पीडन के खिलाफ दलितों के प्रतिरोध से गुजरात सरकार के होश उड गए। जाति की अमानवीय परम्पराओं का चरम स्वरुप गुजरात में मौजूद है।

पिछले पन्द्रह वर्षों में गुजरात में दलितों पर हुए अत्याचारों की संख्या खुद इसकी गवाह है। आधुनिकता और विकास के मॉडल का चेहरा ओढ़े गुजरात का इतिहास मानवीय क्रूरता का रक्तरंजित इतिहास रहा है। 2002 के सांप्रदायिक दंगे में गुजरात हजारों निरीह लोगों के क़त्ल की कत्लगाह बना दिया था। राजनीति पर धर्म के कब्ज़ाकरण के भयंकर परिणाम कितने भयानक अमानवीय हो सकते है, यह गुजरात के सांप्रदायिक दंगों में हुई मानव हिंसा ने देश को दिखा दिया। साम्प्रदायिक और जाति दंगों का कहर सबसे अधिक हाशिये के वर्ग पर ही टूटता है क्योंकि राज्य तंत्र स्वार्थवश सवर्णों के हाथों की कठपुतली बने रहना चाहता है, दलित, आदिवासी, महिलाएं और अल्पसंख्यकों के प्रति राज्य तंत्र नृशंस रवैया अपना लिया है।

ऊना के बीच बाजार में पुलिस चौकी से महज दो सौ मीटर दूरी पर चार दलित युवकों को गौ रक्षक लगभग चार घंटों तक जानवरों की माफिक रस्सियों से बांधकर जिस बेरहमी से पिटते रहे उसे देखकर मर्मान्तक पीड़ा से इन्सान कांप उठा। लेकिन राज्य के तंत्र का हिस्सा पुलिस महकमे ने अकर्मण्यता और असंवेदनशीलता की मिसाल पेश की। राज्य के जाति भेदभावपूर्ण रवैए ने सवर्णों को दलित आदिवासियों पर अत्याचार करने की खुली छूट दे रखी है। जब तक अत्याचार के विरोध में दलितों का गुस्सा फुट नहीं पड़ा तब तक राज्य सरकार दलित उत्पीडन की घटना पर तुरंत करवाई करने की बजाय सोते हुआ पाया गया। गाय के मांस का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर गुजरात राज्य में कथित गौ रक्षक बेख़ौफ़ दलितों पर अत्याचर करके सवर्ण वर्चस्व स्थापित करना चाहते है।

सौराष्ट्र के दबंगों के अत्याचार का कहर दलितों पर हमेशा से टूटता रहा ,जिसके खिलाफ पुलिस में शिकायतें भी दर्ज की गई लेकिन पुलिस हमेशा से दबंगों को बचाती रही। गुजरात में 2001 से 2014 के बीच हुए दलित अत्याचार के आंकडे दलित उत्पीडन की सच्चाई बयान करते हैं: (आरटीआई मार्फ़त एकत्रित आंकड़े )

दलित अत्याचार : 2001 से 2014 तक 13468 दलित पर अत्याचार के केसे दर्ज हुए।
दलित की हत्या : 2001 से 2014 तक 257 दलितों की हत्या की गई।
दलित महिलाओं पा बलात्कार :2001 से 2014 तक 408 दलित महिलाये बलात्कार की शिकार हुई।

दलितों पर जुल्मो सितम के यह आंकड़े देश की जनता को सोचने पर मजबूर करेगी। गुजरात के दलितों की दर्दनाक सच्चाई के आंकड़े सभी जागरूक नागरिकों दहला देंगे। पिछले पन्द्रह वर्षों से गुजरात सरकार ने दलित उत्पीडन की सच्चाई को छुपाकर सैकड़ों करोड़ों खर्च करके गुजरात राज्य की विकसित राज्य के रुपमे झूठी तस्वीर प्रस्तुत करता रहा। ऊना उत्पीडन की घटना ने देश को दलितों के दमन शोषण उत्पीडन की पाशविक परंपरा की मौजूदगी से रूबरू किया है। दूसरा कारण, अत्याचार और छुआछूत की लगातार बढती घटनाओं पर प्रस्तुत तमाम सर्वे रिपोर्ट को राज्य द्वारा नकारते रहने से दलित वर्ग में राज्य के प्रति गुस्सा बढ़ना स्वाभाविक है। दलित अत्याचार पर नवसर्जन की रिपोर्ट ने सामाजिक समरसता और विकास के गुजरात मॉडल की बात करने वाली सत्ता में रही भाजपा सरकार की पोल खोली।

दलित युवकों ने आत्महत्या करने का कदम दलित अत्याचारों के प्रति राज्य अपने कर्तव्य को समझे और दलितो को न्याय दिलाए इस मकसद से उठाया। गुजरात की सीमा महाराष्ट्र से जुडी होने से डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की वैचरिक चेतना का प्रभाव गुजरात के दलित चेतना आन्दोलन और दलित लेखन पर स्पष्ट रूपसे दिखाई देता है दलित चेतना से लैस दलित पैंथर संगठन द्वारा दलित अत्याचारो विरोध में तीव्र आन्दोलन इसी चेतना का विकास है।

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