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हे गंगा, आप आखिर कितना गंदगी ढोएंगी?

कोरोना वायरस संकट के बीच गंगा नदी में से शव निकलने की खबरें आई थीं। पढ़िए, इसी मसले से जुड़ी दुर्दशा को बयां करता निशिकांत ठाकुर का ब्लॉग।

यूपी के कानपुर से सटे उन्नाव में गंगा नदी के तट किनारे रेती वाले इलाके में परिजन को दफनाने के लिए इंतजार करते लोग। (फाइल फोटोः पीटीआई)

बीते कुछ समय से किसी का हाल चाल पूछिए, बातचीत में यही निकलकर आएगा – कैसे जीतेंगे हम कोरोना रूपी इस महाजंग से?

सारा देश त्रस्त है। व्यवस्थाएं पूरी तरह से चरमरा चुकी है। संघीय व्यवस्था कागजों में भले ही हो, लेकिन राजधानी दिल्ली से लेकर सुदूरवर्ती गांव तक एक जैसा ही कोहराम है। यह कोहराम है कोरोना का। इंसान का सबसे बडा महायुद्ध है कोरोना से। सनातन सोच में माना जाता है कि ईश्वर की नजर जहां टेढ़ी होती है, मनुष्य कुछ भी करने की स्थिति में नहीं होता । वैसे इस आपदा को प्राकृतिक आपदा कहना बिलकुल नाइंसाफी है, क्योंकि विश्वमानवता का सबसे बड़ा शत्रु कहा जाने वाला चीन के लिए तो यही कहा जा रहा है जिसकी वजह से इस महामारी से आज भारत ही नहीं विश्व उलझा हुआ है । हम कहीं और की बात को बाद में करेंगे , लेकिन जो भयावह स्थिति भारत में बन गई है उससे अधिक दुखदाई मानव सभ्यता के लिए और क्या हो सकता है । वैसे मृतकों को मुखाग्नि देकर जल प्रवाहित करना भारत में लोग करते रहे है, लेकिन अब जब से अंधाधुंध मौतों का सिलसिला इस महामारी में शुरू हुआ है उसमे ऐसी भयावह स्थिति बन गई है की अब तो मुखाग्नि देने भी अपने परिवार के सदस्य मृतक के पास नही होते। क्योंकि इस महामारी के लिए देखा यह गया है कि जो भी कोरोना के मरीज के आसपास होता है, उसपर विषयुक्त कीटाणु टूट पड़ता है।

अब जो स्थिति बन गई है उसमे भारत में प्रतिदिन लाखो व्यक्ति इसके शिकार होते हैं। हजारों में उनकी मौत होती है जिसके कारण शमशान और कब्रिस्तान में स्थान कम पड़ गए है। परिणाम स्वरूप उन्हे मुखाग्नि दिए बिना अथवा मुखाग्नि देकर बड़ी छोटी नदियों कें हवाले कर दिया जाता है, जिसे चील और कौए अपना उपयुक्त आहार बनाते हैं । इस मामले में सरकार ने अब नदियों की ओर ध्यान दिया है, जिसके कारण एक एक दिन में एक एक शहर 75 – 80 शव निकाले जा रहे है ।

अभी कुछ दिन पहले ही बक्सर , उन्नाव और पटना में गंगा नदी से शव निकालकर अंतिम संस्कार किए गए । जिस गंगा नदी को साफ करने के लिए सरकार ने एक मंत्रालय बनाया अरबों रुपए गंगा को साफ करने में लगाए उस गंगा की यह दुर्दशा कैसे होती रही और सरकारी महकमा उसकी सुरक्षा के लिए कहां गायब रही यह बात समझ में नहीं आती। मेरे मन में यह सवाल है और मन दुखी भी है कि आखिर, गंगा कितनी गंदगी को साफ करेगी और कब तक ??? कहा यह भी जाता है कि गंगा ही नही किसी भी नदी में मृतक को फेंककर परिजन भाग जाते हैं । ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई शव नदी में बहा रहा है और नदी की सुरक्षा में तैनात उसके पर्यवेक्षक क्या करते रहते है। जो विभत्स फोटो कई टीवी चैनलों तथा समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए है, उसे देखकर मन खिन्न हो जाता है और सरकार की लापरवाही पर उन्हे कोसना पड़ता है।

-काश, ऐसी महामारी से निपटने के लिए हमारे वैज्ञानिक जान पाते कि ऐसी भयानक आपात स्थिति आने वाली है। इसकी पूर्व जानकारी दी होती है, तो सकता है इस दुर्दशा से शायद भारत निकल सकता था, लेकिन अब वही कहावत चरितार्थ होती है की अब पछताए क्या ……..। अब तक देश का भारी नुकसान हो चुका है अब सरकार को बहुत तेजी से कार्य करने की जरूरत है । रही आम जन की बात तो उन्हें समझना बहुत ही कठिन है क्योंकि उनके सामने , उनके अगल बगल में लोग काल के गाल में समा रहे हैं, लेकिन उन्हें सरकारी आदेशों का उलंघन करने में सुख मिलता है वे मास्क नही पहनते , शारीरिक दूरी बनाकर नहीं रखते । रही ऐसे परिवारों की बात जिनका अब काम बंद हो गया है और जो भूखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं उनकी ओर सरकार को ध्यान देना ही होगा अन्यथा कोरोना से नहीं तो भूख से उनकी मौत निश्चित हो ही जाएगी। इस बार भी अब फिर से पिछले साल वाला सिलसिला चल पड़ा है और श्रमिक अपने गांव की ओर रुख करने लगे हैं ।

-पिछले वर्ष 2020 में कामगार मजदूरों का जो हाल हुआ था, यदि फिर कहीं अचानक लॉक डाउन लगा तो वही उनकी दशा फिर से होने वाली है कि बच्चा गोदी में और सर पर गृहस्थी का सामान रखकर हजारों किलोमीटर का सफर तय करते हुए अपने प्राणों को अर्पित कर देते थे । इसके बावजूद हम इतने दिनो में उनके लिए कोई उनकी सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम नहीं कर सके। यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है । जो स्थिति ऑक्सीजन और अन्य प्राण रक्षक दवाओं की हमारे यहां हो गई है, जिसमें ब्लैक मार्केटिंग करने वाले तथाकथित लोग आज भी स्वतंत्र रूप से घूम रहे हैं। सौ दो सौ के दबाओं का दाम कई गुना बढ़ाकर रोगियों के परिजनों से वसूलते हैं।

देश का दुर्भाग्य यह है कि अब तो अपने ही देश में बड़े बड़े तथाकथित राजनेता एंबुलेंस की भी चोरी करने लगे है, लेकिन क्या मजाल की आप उन पर इस आपातकाल में भी अंगुली उठा सकें । ढेरों एंबुलेंस छपरा के सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री ने अपने यहां छिपा कर क्यों रख रखा था। जब उसका भांडा फोड़ एक समाज सेवी और भूतपूर्व सांसद ने किया तो उसे किसी न किसी प्रकार जेल भेजवा दिया गया। यह तो अफसोस की बात है कि एक पूर्व केंद्रीय मंत्री द्वारा इस महामारी में यह कहना की इन एंबुलेंस को चलाने के लिए ड्राइवर उपलब्ध नहीं है – ऐसा कैसे हो सकता है , लेकिन हां, ऐसा हुआ और भूतपूर्व सांसद पप्पू यादव पर 32 वर्ष पुराने एक तथाकथित मामले में जिसमें सुलहनामा भी अदालत में पेश कर दिया गया है उस मुकदमें को खोलकर सरकार ने जेल भेज दिया ।

प्रश्न यहां यह है की सरकारी संपत्ति सांसद महोदय ने अपने निजी कार्यालय में क्यों रखा था और यदि ड्राइवर नही मिल रहे थे तो उसके लिए कितने विज्ञापन समाचार पत्रों में दिए गए , क्या साक्षात्कार के लिए कोई टीम बनाई गई थी, साक्षात्कार के लिए कोई समय या स्थान निर्धारित किया गया था और यदि ऐसा कुछ भी नहीं किया गया तो जरूर दाल में कुछ काला है । जिस बिहार के लोग बेरोजगारी से आजिज आकर देश के कोने कोने में रोजगार के चक्कर में मान अपमान को सहकर छटपटा रहे हैं उस प्रदेश के सांसद द्वारा यह कहना की ड्राइवर नही है तो यह सरासर झूठ है। यदि देश के बड़े समाचार पत्रों में ऐसा विज्ञापन नहीं दिया गया तो निश्चित रूप से सांसद महोदय ने बहुत बड़ा अपराध किया है – क्योंकि सांसद निधि से खरीदा गया कोई भी वस्तु सांसद की संस्तुति पर जनहित के लिए होता है । पाठक को इस बात की जानकारी होगी पप्पू यादव बिहार के बाढ़ में – सुखाड़ में, चमकी बुखार और कोरोना के प्रहार में हर जगह लोगो की सेवा में वह मौजूद रहते हैं। यह वही पप्पू यादव हैं जब पिछले वर्ष पटना और बिहार के कई शहर पानी से लवा लव भरा था जब उपमुख्य मंत्री शहर से अपने परिवार को लेकर दूसरे राज्य का आनंद उठा रहे थे। उस काल में भी यही सुशासन बाबू नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे और सुशील मोदी उप मुखमंत्री थे ।

सबसे अधिक दुख तब होता है, जब सुबह यह पता चलता है की अमुक पत्रकार नहीं रहे मैं इसलिए पीड़ित होता हूं कि जो मेरे साथ कभी न कभी किसी न किसी रूप में जुड़े रहे और मेरे अनुज की तरह ही रहे उनके असामयिक निधन की खबर से हिल जाता हूं । मेरे साथ संयोग यह रहा कि इस क्षेत्र में मैने वर्षो काम किया और हजारों इस पेशा के लोग जुड़ते बिछड़ते रहे , लेकिन मन को यह संतोष होता था कि उसने मेरे साथ अथवा मेरे सानिध्य में काम किया है । जब उनके महामारी से मृत्यु की खबर सुनता हूं स्तब्ध रह जाता हूं । चूंकि मेरा कार्य क्षेत्र जम्मू- कश्मीर से लेकर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र , मध्य उत्तर प्रदेश का कुछ भाग मुझे संस्थान द्वारा देखने को कहा गया था।

अतः इसी सिलसिले में इतने राज्यों का दौरा करना पत्रकार और गैर पत्रकारों की नियुक्ति का अधिकार संस्थान द्वारा मुझे प्राप्त था। इसलिए किसी भी यूनिट को लगाना उसके हर विभाग के लोगों से संपर्क करना फिर समाज को यह बताना की हम किसलिए आपके पास आए हैं। स्वर्गीय नरेंद्र मोहन जी कहा करते थे, हमें अपने पेशे से जुड़े किसी की बुराई नहीं करनी है ,लेकिन अपनी विशेषता बताना अपना लक्ष्य होना चाहिए । हम सबसे अलग क्यों हैं और विश्व के सबसे बड़ा अखबार दैनिक जागरण अपनी किस विशेषता के कारण से आज यहां हैं। इसकी भी जानकारी समाज को देना होता था। इसलिए मेरे कार्यकाल का क्षेत्र बहुत बड़ा था और मुझसे जुड़े और या कहीं मिले हुए व्यक्ति आज भी सुख दुख में गाहे बगहे याद करते हैं उनके निधन की जानकारी से कैसे विचलित होता हूं इसकी कल्पना कोई भी कर सकता है।

coronavirus, nishikant thakur, jansatta blog लेख में दिए गए विचार निजी हैं और लेखक निशिकांत ठाकुर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीति विश्लेषक हैं।

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