कोरोना संकट: सुपर स्प्रेडर बन सकती हैं क्षमता से अधिक भरी जेलें, आंकड़े दे रहे गवाही

देश भर के जेलों में क्षमता से ज़्यादा कैदी भरे हुए है। देश के 15 राज्यों के जेल अपनी क्षमता से अधिक भरे हुए है।

Representational Photo, Jail, Prisonerप्रतीकात्मक तस्वीर।

भवेश झा

पिछले साल के एक आंकड़े के अनुसार देश भर के जेलों में 18,000 से ज़्यादा कोरोना के मामले सामने आये थे। इस साल 1 मार्च 2021 से 21 अप्रैल 2021 तक देश के जेलों में 938 कोरोना के मामले आ चुके है। (Commonwealth Human Rights Initiative, 2021) भारत दुनिया भर के जेलों में बंद कैदियों के जनसंख्या के आधार अमेरिका, चीन, ब्राज़ील और रूस के बाद पाँचवे स्थान पर है। (वर्ल्ड प्रिज़न ब्रीफ, 2021 ) कोरोना महामारी के दूसरे लहर में जहा देश में अफरातफरी का माहौल है वही इस दौरान देश के जेलों में बंद कैदियों की स्वास्थ्य चिंता का सबब बनी हुयी है। कई जेलों में संक्रमण फैलने की खबरें आ रही है।

क्षमता से अधिक भरे हुए जेलों में कोरोना दिशा निर्देश का पालन करना मुश्किल है। एहतियातन कई राज्यों में परिजनों से मुलाक़ात बंद कर दिया गया है और ज़्यादा भीड़ भार वाले जेलों से कैदियों को दूसरे जेलों में स्थान्तरित किया गया है। नए कैदियों के प्रवेश से पहले कोरोना जाँच अनिवार्य कर दिया गया है।

पिछले साल कोरोना संकट को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्यों को हाई पावर कमिटी बनाकर जेलों में कैदियों की भीड़ कम करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने सकारात्मक पहल करते हुए अधिकतम सात साल की सजा वाले सजायाफ्ता और विचाराधीन कैदियों को पैरोल या अग्रिम जमानत पर छोड़ने पर विचार करने को कहा था।

कई राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अमल करते हुए कैदियों को रिहा किया था। हलाकि 1 मार्च 2021 को कोर्ट ने अपने निर्णय से पलटते हुए सुधरती हुयी कोरोना स्थिति का हवाला देकर कैदियों को वापस चरण बद्ध तरीके से आत्मसमर्पण करने का आदेश दे दिया। जिससे कोरोना की दूसरी और ज़्यादा खतरनाक लहर के कारण कैदियों की स्वास्थ्य सुरक्षा पर गंभीर संकट मंडराने लगा है।

क्षमता से अधिक भरे हुए जेल : देश भर के जेलों में क्षमता से ज़्यादा कैदी भरे हुए है। देश के 15 राज्यों के जेल अपनी क्षमता से अधिक भरे हुए है। सबसे भीड़ भार वाली जेलों में दिल्ली और उत्तरप्रदेश क्रमशः 175 प्रतिशत और 168 प्रतिशत ऑक्युपेंसी दर के साथ पहले और दूसरे स्थान पर है साल 2016 में कैदियों की संख्या जहां 4,33,003 थी, वही साल 2019 में ये बढ़कर 4,78,600 हो गयी। जबकि इसी समयावधि में कुल जेलों की संख्या में 4.39 प्रतिशत की गिरावट दर्ज़ की गयी। कोरोना महामारी की वजह से कोर्ट का काम बाधित हो रहा है और जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या और बढ़ने की संभावना है। (India Justice Report, Tata Trusts, 2020)

राष्ट्रीय स्तर पर तीन साल के खाली पदों के आंकड़ों के हिसाब से देश भर के जेलों में 30 प्रतिसत से ज़्यादा की कमी है। मानव संसाधन की इतनी कमी की वजह से जेल कर्मी जेल में निगरानी और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कैदियों को कम जगह में एक साथ रखने को मजबूर होते है। हमारे संसाधनहीन और क्षमता से ज़्यादा भरे जेल कोरोना को फैलने के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान कर रहे है।

कैदियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य: धूम्रपान, ड्रग्स का सेवन, साफ सफाई की कमी, सही पोषण ना मिल पाना और बीमारियों की वजह से कैदियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। आम आबादी की तुलना में कैदियों में मधुमेह , रक्तचाप, एचआईवी, यौन संचारित रोग , टीबी , हेपेटाइटिस जैसे बीमारियों का खतरा दो से दस गुना तक ज़्यादा रहता है। (राघवन , 2020)

भारत में कैदियों की मृत्यु दर 2001 में 311.8 प्रति दस लाख थी जो कि 2016 में बढ़कर 382.2 हो गयी। प्रिज़न स्टेटिस्टिक्स इंडिया, 2019 के अनुसार 2019 में देश के जेलों में विभिन्न बीमारियों से मरने वाले कैदियों की संख्या 1466 है। इनमे ह्रदय से जुड़े रोग (406), फेफड़ो सम्बंधित रोग (190), टीबी (81) और कैंसर (78 ) आदि प्रमुख कारण थे। वही आत्माहत्या जेल में होने वाले आप्रकृतिक मौतों में सबसे बड़ा कारण है। साल 2019 में 116 कैदियों की जान आत्महत्या की वजह से हुयी जो की टीबी (81 ) और कैंसर (78 ) से ज़्यादा है। जेलों में बंद 7000 से ज़्यादा कैदी किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रषित है। इससे जाहिर होता है कि कैदियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर एक साथ ध्यान देने की जरूरत है।

कोरोना की दूसरे लहर से पूरा देश से जहा अफरातफरी और इलाज के अभाव में मौत की खबरे हम सभी को चिंतित कर रही है। ऐसे माहौल में क्षमता से ज़्यादा भरे हुए जेलों में बंद कैदियों के मानसिक स्थिति की कल्पना करना कठिन है। पिछले साल कोरोना संकट के दौरान जेलों में हिंसा और अव्यवस्था फैलने की खबरे भी आयी। पहले से अकेलापन और लम्बा तनाव के दौर से गुजर रहे कैदियों में कोरोना संकट मानसिक रोगो को उत्पन्न कर सकता है।

बढ़ते कोरोना खतरे को देखते हुए कई राज्यों में परिजनों से मुलाक़ात बंद कर दिया गया है और ज़्यादा भीड़ भार वाले जेलों से कैदियों को दूसरे जेलों में स्थान्तरित किया गया है। ऐसे में इनका परिवार से संपर्क टूट जाने का खतरा है। देश भर के जेलों में सुविधाओं और स्वस्थ्य कर्मियों की भारी कमी है।

देश के जेलों में बंद ऐसे कैदियों की बड़ी संख्या में बंद है जिनके मामले पुलिस जाँच या सुनवाई का इंतज़ार कर रहे है। देश भर के जेलों में बंद कुल कैदियों में से 68 % विचाराधीन कैदी है। जहा जेल अपनी क्षमता से ज़्यादा भरे हुए है वही जेलों में कर्मचारियों की भरी कमी है।कई राज्यों में 40 -50 प्रतिशत चिकित्सा पदाधिकारी के पद खाली है। जबकि मॉडल प्रिज़न मैनुअल, 2016 के अनुसार प्रति 300 बंदी पर एक चिकित्सा पदाधिकारी होना चाहिए। देश के विभिन्न जेलों में मनोचिकित्सक और काउंसलर के पद खाली परे है। (India Justice Report, Tata Trusts, 2019 )

बचाव और आपात कार्ययोजना: यदि सरकार ने जेलों में कोरोना संक्रमण फैलने से ना रोक पाए तो इस महामारी को रोकने के प्रयास असफल हो सकते है। यदि ठोस प्रयास नहीं किये गए और भीड़ भार वाले जेलों में संक्रमण पैर पसारने में कामयाब रहा तो चरमराई स्वास्थ्य व्यवस्था पर और अधिक बोझ बढ़ सकता है। यह अकेले कोर्ट और जेल व्यवस्था के बस की बात नहीं है। जेल, न्याय और स्वास्थ्य व्यवस्था समन्वय स्थापित कर र काम करने की ज़रूरत है। जेलों में संक्रमण रोकने के लिए जोखिम प्रबंधन रणनीति बनाकर संक्रमण फैलने के संभावित कारणों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। उसी आधार पर स्वास्थ्य सेवाओ जैसे आइसोलेशन बेड, कोरोना टीका आदि का वितरण किया जाना चाहिए।

यह मूल्यांकन दो स्तरों पर किया जाना चाहिए। पहला कैदियों और जेल कर्मियों का रिस्क स्ट्रैटिफिकेशन या जोखिम स्तरीकरण। रिस्क स्ट्रैटिफिकेशन कैदियों के उम्र और अन्य स्वास्थ्य समस्या जैसे मधुमेह , रक्तचाप, एचआईवी, यौन संचारित रोग , टीबी , हेपेटाइटिस ,गंभीर मानसिक रोग आदि के आधार पर किया जाना चाहिए। गंभीर शारीरिक या मानसिक रोगी कोरोना संक्रमण के लिए अति संवेदनशील होते है। दूसरे स्तर पर जेल की व्यवस्था और दैनिक गतिविधियों को महामारी के अनुकूल ढलने पर जोर देना चाहिए। जैसे जेल के कमरे हवादार हो, आपसी दूरी , हाथ धोने की समुचित व्यवस्था, मुलाकात और अन्य गतिविधियों का आयोजन आदि बिंदुओं का मूल्यांकन और सुधार करना। संक्रमण की जल्दी पहचान, मेडिकल आइसोलेशन और कोरोना मरीजों का उपचार आवश्यक है।

जेल में रह रहे महिलाओं और बच्चों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। महामारी को रोकने के लिए कुछ प्रतिबंध जरूरी है जैसे परिवार या सगे सम्बन्धियों से मुलाकात कम करना। जेल प्रशासन को प्रतिबंध जारी करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि नए प्रतिबंध की वजह से कैदियों के मानसिक स्वास्थ्य पर कम से कम प्रतिकूल प्रभाव हो ।(WHO, 2021)।

जेल में कैदियों को एक जगह इकठ्ठा करने से ज़्यादा से ज़्यादा बचना चाहिए। जैसे कैदियों का खाना सार्वजनिक कैंटीन की जगह उनके सेल में दिया जाये, खाने के समय को बढाकर अलग-अलग समयावधि बनाना, कैदियों के सेल से बाहर रहने के समय को कैदियों में अलग अलग यूनिट के हिसाब से बाँटना आदि। कैदियों को ज़्यादा से ज़्यादा खुली हवा में रखना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कैदी रोज कम से कम एक घंटा खुली हवा में समय बिता सके। (WHO, 2021)।

कोरोना जोखिम से जुड़े जुड़ी जानकारी कैदियों से साझा करना बहुत जुरूरी है। सभी कैदियों को कोरोना से बचाव और बीमारी को लक्षणों की जानकारी आसान भाषा में सुलभ होनी चाहिए। उन्हें बीमारी के लक्षणों, गंभीर लक्षणों के पहचान चिन्ह, खुद की निगरानी कैसे करना है जैसे शरीर का तापमान के जाँच आदि से जुड़े जानकारी मालूम होनी चाहिए।

न्याय व्यवस्था और जेलों की मौजूदा स्थिति को देखते हुए बड़े पैमाने पर जेलों से भीड़ काम करने की जरुरत है। कैदियों की रिहाई सम्बंधित निर्णय में उनके स्वास्थ्य जोखिम आकलन के आधार पे हो ना कि उनके अपराध या क़ानूनी स्थिति के आधार पर होना चाहिए । कैदियों को प्राथमिकता के आधार पर टीकाकरण किये जाने की जरूरत है । जेल में बंद कैदियों को स्वास्थ्य का उतना ही अधिकार है जितना किसी जेल से बाहर रह रहे इंसान की। इस महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हम सभी तब तक सुरक्षित नहीं है जब तक कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े इंसान की सुरक्षा सुनिश्चित ना हो जाये।

देश के न्यायपालिका को क़ानूनी सुनवाई करते समय गैर हिरासत उपायों को प्राथमिता देनी चाहिए । देश के जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की बड़ी संख्या को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा “अर्नेश कुमार बनाम बिहार सरकार” के मामले में जारी आदेश को गंभीरता से लागू करने की जरुरत है। कोर्ट ने निर्देश दिया था की पुलिस और मजिस्ट्रेट को सात साल या उससे काम सजा वाले अपराधो में जल्दबाजी में गिरफ़्तारी से बचना चाहिए।

(भवेश झा, एक निजी कंपनी में मैनेजर हैं और टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पब्लिक हेल्थ में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त की है। यहां व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

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