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दादी इंदिरा गांधी से कुछ तो सबक लें राहुल गांधी, कांग्रेस के शरीर और आत्मा दोनों में बदलाव जरूरी

कांग्रेस पार्टी जब दो धड़ों में बंट गयी तो इंदिरा गांधी के धड़े के पास जमीनी संगठन नहीं था लेकिन गरीबी हटाओ के नारे के साथ उन्होंने चुनावी जीत हासिल की।

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी मंगलवार (14 मार्च) को लोक सभा के बाहर। (PTI Photo by Kamal Kishore)

उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड चुनाव में भारी पराजय के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि कांग्रेस पार्टी में अब ढांचागत बदलाव करने पड़ेंगे। पर 1969 में कांग्रेस में महाविभाजन के बाद जब राजनीतिक मुश्किल में पड़ीं तो तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने पार्टी की काया के बदले उसकी आत्मा में परिवर्तन किया था। इंदिरा गांधी ने मुददों की राजनीति शुरू की और गरीबी हटाओ का नारा दिया। जो काफी सफल रहा क्योंकि आम लोगों को यह लगा कि इंदिरा जी सचमुच गरीबी हटाना चाहती हैं। काश! राहुल गांधी ने अपनी दादी से कुछ सीखा होता।

पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस को लगातार कई चुनावी पराजयों का सामना करना पड़ा है। हर बार कांग्रेस हाई कमान यही कहता रहा है कि उसे अब संगठन को मजबूत करना पड़ेगा। दिल्ली विधान सभा चुनाव में पराजय के बाद तो राहुल गांधी ने कहा था कि अब मैं अरविंद केजरीवाल से कुछ सीखूंगा। पर कुछ हो नहीं रहा है और पराजय की रफ्तार थम नहीं रही है।

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कांग्रेस जैसी एक देशव्यापी संगठन वाले दल का इस तरह दुबलाना स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं माना जा रहा है। पार्टी के भीतर भारी राजनीतिक मतभेद के बीच कांग्रेस कार्य समिति ने 12 नवंबर 1969 को तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया था। पार्टी में विभाजन के बाद दो दल बन गये। एक का नाम ‘संगठन कांग्रेस’ पड़ा तो दूसरे का कांग्रेस ‘आर’। इंदिरा गांधी की पार्टी कांग्रेस ‘आर’ थी। संगठन कांग्रेस के नेता एस निजलिंगप्पा थे जो अविभाजित कांग्रेस के भी अध्यक्ष थे।

संगठन में काम कर रहे देश भर के अधिकतर पुराने नेता ‘संगठन कांग्रेस’ में ही रह गये। इंदिराजी की कांग्रेस के अधिकतर नेता नये लोग थे।
पर इंदिरा गांधी ने कमजोर संगठन को अपनी चुनावी जीत के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया। उन्होंने यथास्थितिवादी पार्टी के रूप में पहले जानी जाने वाली पार्टी को परिवर्तन का हथियार बनाने की कोशिश शुरू कर दी। संगठन तो बाद में मजबूत हुआ।

इंदिरा गांधी गांधी ने 14 निजी बैंकों को राष्ट्रीयकरण किया। राजाओं-महाराजाओं के प्रिवी पर्स और उनके विशेषाधिकार समाप्त किये। कुछ अन्य कदम उठाये। इन कदमों से इंदिरा गांधी ने आम लोगों को यह विश्वास दिला दिया कि वह गरीबी हटाने के क्रम में ऐसे कदम उठा रही हैं।यह अलग बात है कि इंदिरा गांधी अंततः गरीबी हटाने में सफल नहीं हुईं। आज की राजनीति देखें तो इंदिरा गांधी की शैली को नरेंद्र मोदी ने पकड़ा। उन्होंने यह प्रदर्शित कर दिया कि नोटबंदी का काम गरीबी और भ्रष्टाचार हटाने के सिलसिले में ही हुआ है।

दरअसल राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि आज के मतदाता आखिर चाहते क्या हैं। 2014 के लोक सभा चुनाव में मतदाताओं ने कांग्रेस को एक सबक जरूर दिया था। पर कांग्रेस सबक लेने में विफल रही। अब भी समय है। हालांकि कांग्रेस के पास कोई महत्वपूर्ण पहल करने के लिए केंद्र में अपनी सरकार नहीं है। यह सुविधा 1969 में इंदिरा गांधी के पास थी और आज नरेंद्र मोदी के पास है।
फिर भी कांग्रेस अपनी राज्य सरकारों के जरिए आज भी चाहते तो यह साबित करने की कोशिश कर सकती है कि वह न सिर्फ काया में बल्कि अपनी आत्मा में भी बदलाव करना चाहती है।

राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार 2014 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस की पराजय के मुख्यतः दो कारण थे। एक तो केंद्र सरकार ने महा घोटालेबाजों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई की मांग को नहीं माना। जबकि अन्ना हजारे के नेतृत्व में चुनाव से पहले इसको लेकर बड़ा आंदोलन हुआ था। उल्टे मनमोहन सिंह सरकार घोटालेबाजों के बचाव में ही अपनी शक्ति का इस्तेमाल करती रही। साथ ही,कांग्रेस पार्टी और सरकार ने एकतरफा और असंतुलित धर्म निरपेक्षता की नीति चलाई। ऐसी स्थिति का पूरा लाभ भाजपा और नरेंद्र मोदी ने उठाया।

कांग्रेस की ‘आत्मा’ में परिवर्तन की पहली शर्त यह है कि कांग्रेस और उसकी राज्य सरकारें यह साबित करें कि वे किसी भी तरह के भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ है। साथ ही वह सभी समुदायों के बीच के कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ समान रूप से कार्रवाई करे। याद रहे कि तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने यदि कभी आरएसएस के लोगों के खिलाफ कार्रवाई की तो जमात-ए-इस्लामी के कट्टरपंथियों के साथ भी ऐसा ही सलूक किया था। इस बीच पंजाब से यह अच्छी खबर आई कि कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने यह फैसला किया है कि वे शपथ ग्रहण समारोह में सादगी रखेंगे। याद रहे कि नेताओं की सादगी और ईमानदारी पर अधिकतर जनता अक्सर मोहित हो जाती है।

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