सोशल मीडिया पर विरोधाभाषी बुद्धिजीवी

हम किसी बात को तिल का ताड़ क्यों बना देते हैं! यह ठीक है कि भारतीय संविधान और न्यायालय ने हमें लिखने-बोलने की आजादी दी है, लेकिन इसका यह मतलब तो कतई नहीं कि समाज के सीधे—सादे लोगों की मति को भ्रष्ट कर उसे कत्लेआम करने के लिए मजबूर कर दें।

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फाइल फोटोः Unsplash)

निशिकांत ठाकुर

सामाजिक क्रांति के रूप में समाज में खास स्थान बना चुके सोशल मीडिया पर आज तरह—तरह की बातें की जाती हैं। कोई इसके पक्ष में बात करता है तो कोई कहता है— यह सामाजिक नीतियों के विरुद्ध काम करता है, जो भ्रम पैदा करके हमें आपस में बांटता है। अब इस विरोधाभासी तर्क—वितर्कों के बारे में क्या कहा जाए! आप किसके पक्ष में होंगे? दरअसल, यह संभव ही नहीं है कि आज कोई भी व्यक्ति सोशल मीडिया की नजर या यूं कहें कि प्रभाव से बचकर निकल जाए।

कहने को लोग चाहे जो कहें, लेकिन एक बड़ा सच यह है कि निश्चित रूप से सोशल मीडिया के आने से समाज में एक जागृति—सी आई है। लेकिन, सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि इसके जरिये गंध भी इस कदर फैलाई जाती है जो समाज में आपसी विग्रह को पैदा करता है। अभी हाल ही में एक तथाकथित बड़े पत्रकार को सोशल मीडिया पर देखा, तो उन्हें सुनने का मन हुआ। वह हिन्दू-मुस्लिम की बात कर रहे थे। उन्होंने कहा— जो मैं बताने जा रहा हूं, उसे आप किसी अखबार—टेलीविजन पर न पढ़ेंगे और न ही देखेंगे। हिंदू-मुस्लिम झगड़े के तीन उदाहरण उन्होंने दिए, जिनमें एक में हिन्दू सदाशयता की बात थी, जबकि दो घटनाएं मुस्लिम विरोधी थीं। दुख हुआ कि आज भी हमारे वरिष्ठ पत्रकारों के मन में भी वही पुरानी बातें घर किए बैठी हैं जिनका उल्लेख हम अपने पिछले लेख में कर चुके हैं कि अंग्रेजों की सोच यह थी कि जब तक दोनों आपस में भिड़ते रहेंगे, हम उन पर राज्य करते रहेंगे। इसीलिए उन्होंने एक पक्ष को नीचा दिखाने का निश्चय किया और ऐसा करके वह अपने मकसद में सफल भी रहे। फिर वर्षों दोनों कौम को आपस में लड़ाकर हम भारतीयों को दबाकर न केवल रखा, बल्कि हमारे ऊपर राज्य भी करते रहे।

दरअसल, उन वरिष्ठ पत्रकार महोदय की बात से सहमत नहीं हो पा रहा हूं, क्योंकि यदि उन घटनाओं का उल्लेख अखबारों या टेलीविजन पर प्रकाशित या प्रचारित किया गया होता, तो निश्चित रूप से एक नहीं, कई बड़े दंगे देश में हो सकते थे। शायद पत्रकार महोदय ने इस बात पर ध्यान नहीं देकर अपने आकाओं को खुश करने के उद्देश्य से ऐसा न करने पर अखबारों और टेलीविजन चैनलों की आलोचना कर रहे थे। इसी के साथ अपनी वाहवाही कराने का कोई मौका भी नहीं गंवा रहे थे। धन्य हैं ऐसे लोग, जो केवल हितसाधन के लिए आकाओं को खुश करना चाहते हैं और देश को दंगे—फसाद की आग में झोंक देने से भी परहेज करना नहीं चाहते हैं।

मैंने कई बार अपने लेख में इस बात का उल्लेख किया है कि सभा—समारोह में जाकर उसका ब्योरा देना ही पत्रकारिता नहीं होता है। सामने दिखने वाले की अपेक्षा उसके पीछे के सत्य को खोजकर उसे उजागर करना ही सच्ची पत्रकारिता है। अनुभव, आलोचना-शक्ति, कल्पनाशक्ति, खोज और गुप्तचरी के साथ खतरों से भरा मार्ग अपनाकर पता न लगाया जाए तो भला उसे कैसी पत्रकारिता कहेंगे। इसके साथ ही यह भी बार—बार लिखता रहता हूं कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री ने रिश्वत ली या नहीं, इसका निर्णय इस देश के न्यायालय में नहीं होता है। साक्ष्य और कागजात के आधार पर भी नहीं होता है। इसका फैसला केवल जनता करती है, चुनाव में।

यह कोई नई बात नहीं है, जिसे मैं बार—बार कहता रहा हूं। इस पेशे से जुड़े लगभग सभी इस बात को जानते हैं कि किस बात से समाज में सनसनी फैलेगी और किस बात से समाज दंगों की आग में झुलसने लगेगा, लेकिन लिखते समय वह इस बात को भूल जाते हैं कि उनकी इस एक पंक्ति का असर समाज या जनमानस पर क्या पड़ेगा। दूरदराज की तीन घटनाओं का जब वह सोशल मीडिया पर उल्लेख कर रहे थे और अपनी नाराजगी जता रहे थे, वह निश्चित रूप से उनकी लंबी पत्रकारिता जीवन पर एक धब्बा है। उस क्षेत्र के स्थानीय समाचार पत्र के संपादक इतने जागरूक होंगे जिन्होंने इस दूषित मानसिकता वाली खबर को आगे बढ़ने से रोक दिया। फिर हाईकोर्ट का जो निर्णय आया, उसे ही केवल सार्वजनिक किया। यह निश्चित रूप से एक अच्छी पत्रकारिता है।

यहां दो अंग्रेजों की बातचीत का हवाला देना चाहूंगा। वैसे इस बारे में मैंने अपने पिछले लेख में भी उल्लेख किया था, इस बार थोड़ा विस्तृत जानकारी देना चाहूंगा कि सर चार्ल्स लॉर्ड मेटकैफ और लॉर्ड मैकाले के बीच बातचीत हो रही थी। लॉर्ड मैकाले ने कहा— ‘इन काले, घिनौने और अंधविश्वासी भारतीयों के बीच रहना तो अत्यंत मु​श्किल है। बेशक, खासकर तब जबकि आप न तो उनके देश की भाषा जानते हैं, न उनसे कोई सहानुभूति रखते हैं। सच तो यही है, लेकिन मुझे दो काम करने हैं -पहला यह कि मैं उनके लिए जो कानून बनाऊं, उसमें मुझे एक ही बात नजर में रखना पड़ेगा कि उनके द्वारा अंग्रेजी सरकार के हाथ मजबूत हों और सर्वसाधारण असहाय रह जाए।

मेरा दूसरा काम यह होगा कि मैं कंपनी की सरकार को यह सलाह दूं और उसके सामने शिक्षा की ऐसी योजना पेश करूं जिससे भारतीयों को अंग्रेजी सिखाकर उनकी सहायता से अंग्रेज हिंदुस्तान पर हुकूमत करें। वह इसलिए, क्योंकि हिन्दुस्तानियों में राष्ट्रीय भावना पैदा ही न होने पाए। निस्संदेह यह एक बड़ा खतरा है, लेकिन मेरा दृष्टिकोण यह है कि अंग्रेज आसानी से भारत में चिरस्थायी रहे।’

इस कार्य को अंजाम देने के लिए मैकाले ने तीस वर्ष का समय मांगा और उसने कहा कि तीस वर्ष के अंदर भारत में कोई मूर्ति पूजक नहीं बचेगा, सारे—के—सारे स्वयं ईसाई बन जाएंगे और भारत चिरकाल तक अंग्रजों का गुलाम बना रहेगा। भारत के लिए कितने दुर्भाग्यपूर्ण दिन थे जब ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम पर अंग्रेजों ने हमारे मुल्क को लूट लिया, लेकिन किसी ने उन्हें चोर नहीं कहा। अमेरिका वाले जानलेवा दवाएं और लड़ाकू जहाज बेचकर सारी दुनिया का पैसा खींच रहा है, उसे कोई चोर नहीं कहता। बाजार में इलेक्ट्रानिक सामग्री और कार लाकर जापान पूरी दुनिया का पैसा अंदर—ही—अंदर चूस रहा है, पर उसे कोई…..।

इन उदाहरणों को पेश करने का तात्पर्य महज इतना है कि हम किसी बात को तिल का ताड़ क्यों बना देते हैं! यह ठीक है कि भारतीय संविधान और न्यायालय ने हमें लिखने-बोलने की आजादी दी है, लेकिन इसका यह मतलब तो कतई नहीं कि समाज के सीधे—सादे लोगों की मति को भ्रष्ट कर उसे कत्लेआम करने के लिए मजबूर कर दें। अंग्रेजी पढ़े—लिखे भारतीय लोग जब अपने को किसी के प्रति समर्पित कर देते हैं, निश्चित रूप से मन में समर्पण का भाव पैदा होता है और फिर वह दंगा—फसाद करने के आदि हो जाते हैं। यही तो अंग्रेजों की नीति थी जिसके लिए उन्होंने बड़ी बारीकी से ऐसे लोगों को नियुक्त किया जो हम भारतीयों की मति को भ्रष्ट कर सकें और उन अंग्रेजों के चिरस्थायी गुलाम बने रहें। जिस प्रकार भारत में वर्ष में कई मौसम बदलते हैं, उसी प्रकार पांच या दस वर्ष में सरकार भी बदलती है- फिर आप जैसे भक्तों का क्या हश्र होगा श्रीमान।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। 

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