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होली के रंग – अर्थ की खिड़की

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें, तो आदिकाल से अधुनातन पर्यन्त होली का त्योहार भारतीय जन-जीवन को उद्वेलित करता रहा है। कई संस्कृत ग्रंथों में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन मिलता है जिनमें हर्ष की 'प्रियदर्शिका' एवं 'रत्नावली' तथा कालिदास की 'कुमारसंभवम्' तथा 'मालविकाग्निमित्रम्' शामिल हैं।

Holi, Holi in India, National Newsहोली पर रविवार को रंग खेलती युवतियां। (फोटोः पीटीआई)

कमलेश कमल।

सदा आनंद रहे यही द्वारे, मोहन खेले होरी हो!

वसंत को सदा से नवजीवन का मौसम माना गया है। यह पतझड़ के बाद सर्जना की ऋतु है। इसके आगमन से ही बहुत कुछ बदल जाता है। सरसों के खेत पीले फूलों की चादर ओढ़ लेते हैं। ठूँठ हुए पेड़ वासंती ऊर्जा से पुनः छतरा जाते हैं, पूरी धरित्री विविध फूलों का शृंगार कर लेती है,
तो आम्र-मंजरियों की सुगंध से बौराए कोयल की कूक किसी हिय में प्रेमास्पद के लिए हूक उठा देती है।

वसन्तोत्सव का रंगीला, मौजीला, मस्तमौला अनुष्ठान है होली। वसन्त का पूर्ण परिपाक है होली। वस्तुतः फाल्गुन आते ही चहुँओर स्त्री-पुरुष, पेड़-पौधों में एक नवीन स्पंदन, एक नूतन ऊर्जा का संचार दिखता है। यह ‘फगुनाहट’ पूर्णिमा के दिन उमंग एवं उल्लास के साथ ‘फाग’ गाकर एवं रंगों की बौछार के साथ होली मनाकर समाप्त होता है।

भाषिक रूप से देखें, तो ‘होली’ शब्द ‘होलिका’ से व्युत्पन्न हुआ है। ‘होलिका’ के अर्थ की कई व्याख्याओं में एक के अनुसार यह विनाशिका शक्ति है। होलिका या विनाशिका शक्ति जब ‘प्रह्लाद’ या ‘विशिष्ट आह्लाद’ को अपने आग़ोश में लेती है, तो उसे समाप्त नहीं कर सकती, अपितु स्वयं समाप्त हो जाती है। मान्यता है कि हिरण्यकशिपु अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद को मारना चाहता था। उसकी बहन होलिका प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रविष्ट हुई। होलिका जल गई, प्रह्लाद सुरक्षित रहे। ज्ञातव्य है कि प्रह्लाद ‘आह्लाद’ की विशेष अवस्था है जो ज्ञान की अग्नि में तप कर प्राप्त होती है।

वस्तुतः, होलिका का इस तरह होम हो जाना और प्रह्लाद का अक्षुण्ण रह जाना होली का संदेश है। इस अर्थ में बुराई पर अच्छाई की जीत का त्योहार है होली। मन के मैल को, कालुष्य को दूर कर सबका स्वागत करने एवं नव-आरम्भ करने का त्योहार है होली।

वेद और पुराण में होलिका शब्द का अर्थ इससे भिन्न अग्नि की “रक्षिका” शक्ति से है। पुराण में वर्णन मिलता है–
सर्वदुष्टापहो होमः सर्वरोगोपशान्तये ।
क्रियतेऽस्यां द्विजैः पार्थ तेन सा होलिका स्मृता ।।
–इससे पता चलता है कि ‘होम’ से सम्बन्धित होने के कारण ‘होलिका’ अस्तित्व में आया। कालांतर में इस ‘होलिका’ से संबद्ध होने के कारण अग्नि में सेंके गये चने, गेहूँ, यव आदि अन्नों का नाम भी ‘होला’ हो गया।

होलिका की एक अन्य व्याख्या भी है। पुराणों में वर्णन मिलता है कि चक्रवर्ती सम्राट रघु के शासन काल में ‘दुंढा’ नामक एक भयावहा राक्षसी ने बालकों को उत्पीडित कर दिया था। ऐसे में, नारद जी ने भगवान् से इस उपद्रव से परित्राण हेतु पूछा। भगवान् ने कहा–
‘ढुण्ढा नाश का एकमात्र उपाय ‘होलिका’ नामक अग्नि ही है। इसमें ‘होम’ करना आवश्यक है।’

इस व्याख्या के अनुसार ‘ढुंढा’ राक्षसी के भय से बाल-बन्धुओं का परित्राण करने के लिये ही ‘होलिका-महोत्सव’ का आरंभ हुआ। भाषा-वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो यह ‘ढुंढा’ ‘धुंध’ का ही रूप है। ऐसे में मानना होगा कि ‘अज्ञानता का धुँध’ ही ‘ढुंढा राक्षस’ है। बालकों के अज्ञान को मिटाने वाला और उन्हें ‘प्रह्लाद’ बनाने वाली अग्नि ही ‘होलिका’ है।

रंगोत्सव से एक दिन पूर्व जो ‘होलिका-दहन’ का विधान है, उससे मिलता जुलता एक वर्णन यजुर्वेद में मिलता है–
‘ऊँ रक्षोहणं वलगहनं वष्णवीमिदमहं तं वलगमुत्किरामि स्वाहा।’ अर्थात्
रक्षोघ्न अग्निदेवता हैं, यही रक्षा भी करते हैं, जिन्हें आहुती प्रदान करने के लिये शुष्क काष्ट, तृण आदि एकत्रित किये जाते हैं। यह होम वाली होलिका-दहन की प्रक्रिया ही है और कुछ नहीं।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें, तो आदिकाल से अधुनातन पर्यन्त होली का त्योहार भारतीय जन-जीवन को उद्वेलित करता रहा है। कई संस्कृत ग्रंथों में ‘रंग’ नामक उत्सव का वर्णन मिलता है जिनमें हर्ष की ‘प्रियदर्शिका’ एवं ‘रत्नावली’ तथा कालिदास की ‘कुमारसंभवम्’ तथा ‘मालविकाग्निमित्रम्’ शामिल हैं। कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक सर्ग ही ‘वसन्तोत्सव’ को अर्पित है। मध्यकाल में चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में भी ‘होली’ का वर्णन है।

ध्यातव्य है कि अलग-अलग प्रांतों में होली के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व को भी प्रतिपादित करते अलग-अलग वर्णन मिलते हैं, ब्रज में राधा और कृष्ण के होली खेलने का वर्णन अगर अति-चर्चित है; तो अवध में राम और सीता को होली खेलते वर्णित किया जाता है– ‘होली खेलें रघुवीरा अवध में, होली खेलें रघुबीरा।’ इसी तरह शैव सम्प्रदाय के क्षेत्रों में –’दिगंबर खेले मसाने में होली’ जैसे गीत से शिव द्वारा श्मशान में होली खेलने का लोक-वर्णन मिलता है।

यह भी कम रोचक नहीं है कि अजमेर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गाई जाने वाले एक गीत में होली का चटक रंग मौजूँ है– ‘आज रंग है री मन रंग है, अपने महबूब के घर रंग है री।’

भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में भी होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है! ‘चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर’ आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं।’ इसी तरह ध्रुपद में एक चर्चित गीत है– ‘खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी।’ ‘सिलसिला’ के गीत –’रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे’ की अपार लोकप्रियता या ‘नवरंग’ के ‘आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार’ की थिरकन इस बात का प्रमाण है कि होली भारतीय जनजीवन को कितना उद्वेलित और रोमांचित करता है।

भाषा-विज्ञान की दृष्टि से देखें, तो रंग शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत धातु ‘रंज्’ से हुई है, जिसका अर्थ है – ‘लाल-रंग’ या ‘रंगे जाने योग्य’। लाल चेहरे की लालिमा है, आभा है, सूर्य का रंग है, तो वैराग्य का भी रंग है। मनोरंजन में यह रंज या रंग मन को रंगता है, वहीं अनुरंजन में भक्ति के रंग में रंग जाने का बोध है। होली के अवसर पर प्रियतम या प्रियतमा के चेहरे को रंगीन-मिजाज होकर रंगें या शरारत में किसी और के… यह होगी रंगबाजी या रंगदारी ही।

रंज् कुल का ही शब्द है राग। यह राग आया संस्कृत के राग: से। देखिए कि राग अधिक तो रंग भी अधिक, राग ख़त्म हुआ कि विरागी, बैरागी, बीतरागी हुए। हाँ, तब भी एक रंग रहेगा। जी हाँ। लाल तब भी बचेगा– डूबते सूर्य का बैरागी रंग, अग्नि का रंग, परिपाक का रंग।

होली की कोई भी चर्चा ब्रज के बिना अधूरी है। ब्रज भगवान् श्रीकृष्ण के राग-रंग और रास की भूमि है। आध्यात्मिकता के रसधार की भूमि है। भाषिक रूप से देखें, तो ‘रस’ से ही तो रास बना है। जहाँ रस का प्राचुर्य है, वहाँ ‘रास’ है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह के रूप में ‘रास’ का वर्णन है। कृष्ण के आकर्षण में जब गोपियाँ ब्रज में आती हैं, तो रस-धार बहती है, जो रास है। तो, रास में रस की धारा बहती है।

राधा क्या है? राधा ‘धारा’ का विलोम है, विपर्यय है। राधा-धारा-राधा। जो धारा के विपरीत बहे, वह राधा है। राधा अति-विशिष्ट है। उसका प्रेम विशिष्ट है। राधा कृष्ण के कर्षण में कर्षित होती है, खिंचती है, लेकिन बाँधना या माँगना नहीं जानती। राधा केवल कृष्ण की हुई जबकि कृष्ण सबके हुए। राधा के हृदय का विस्तार अपार है क्योंकि उसका प्रेम ससीम नहीं, असीम है। वह कृष्ण को नहीं बाँधती। वह प्रेम को नहीं बाँधती, उसे मुक्त कर देती है। राधा की कोई माँग नहीं, कोई बंधन नहीं, इसलिए विराट् हो गई। प्रेम में विराट् होने का प्रतिदान देखिए कि प्रेमी 64 कलाओं से पूर्ण योगिरज कृष्ण हुए, लेकिन राधा उनसे भी पहले स्मरण में आती है– ‘राधे-कृष्ण’। होली के संदर्भ में ही देखें, तो राधा के कारण ही बरसाने वाली होली का अन्य होलियों से श्रेष्ठ स्थान है।

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