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दूसरी पारी-दूसरा बजट: क्या आर्थिक संकट का हल खोज पाएगी मोदी सरकार?

आम बजट से पहले मुनिशंकर (स्वतंत्र पत्रकार और आर्थिक मामलों के जानकार) बता रहे हैं कैसा हैै अर्थव्‍यवस्‍था का हाल और इसके मद्देनजर बजट में सरकार के सामने क्‍या होंगी चुनौत‍ियां।

दूसरी पारी, दूसरा बजट: मंदी से उबरने का रास्ता न‍िकाल पाएगी मोदी सरकार?

हाल ही में विश्व बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक सहित सभी प्रमुख वित्तीय संस्थाओं ने अपनी रिपोर्ट्स में कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था अवसान की स्थिति में है, जो आगामी वित्त वर्ष में लगभग 5 प्रतिशत की विकास दर से ही बढ़ेगी। विभिन्न संस्थानोंं के इन अनुमानों की राह पर ही चलते हुए भारतीय सांख्यिकी संस्थान ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता हैं। अर्थात् एक फरवरी 2020 को सरकार जो बजट पेश करने जा रही है उसमें भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए लीक से हट कर कुछ ऐसा करना होगा जो अर्थव्यवस्था में जान फूंके।

सर्वविदित है कि भारत सरकार को अभी गिरते राजस्व, कर्ज में डूबी औऱ लगातार घाटे में चल रही सरकारी कम्पनियों जैसे एयर इण्डिया, बीएसएनएल का बोझ, लोकलुभावन छूट, जिसमें उद्योगों को दी गई कर रियायत से राजस्व को इस वित्त वर्ष में 20.5 अरब डॉलर के नुकसान का अनुमान है। बढ़ती बेरोजगारी और लगातार बढ़ रही वरिष्ठ नागरिकों की संख्या से दो-चार होना पड़ेगा। कुल मिलाकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को सीमित संसाधन में कुछ बड़ा कर के दिखाना होगा। अगर क्रिकेट की भाषा में कहें तो कम गेंदोंं में ज्यादा रन बनाने होंगे, वो भी चुस्त क्षेत्ररक्षण और कसी हुई गेंदबाजी के सामने।

जरा याद करिये 1929 के दौर की विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी औऱ उसके बाद आये जॉन मेनार्ड कीन्स के रोजगार सिद्धांत और मंदी से निपटने के सरकारी प्रयासों का। इसका जिक्र उन्होंंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक जनरल ‘थ्योरी ऑफ इम्प्लॉयमेंट’ में किया था। देश की अर्थव्यवस्था जिस दौर से गुजर रही है, उसमें एक ओर घनघोर बेरोजगारी है, तो दूसरी ओर सरकार के पास संसाधनों का अभाव। ऐसे में अगर कीन्स की मानेंं तो सरकार को अपना खर्च बढ़ाना होगा। इस प्रकार समग्र व्यय की वृद्धि के द्वारा बेरोजगारी में कमी औऱ अर्थव्यवस्था में मांग का सृजन किया जा सकता है।

ये वो सुझाव हैं, जो सरकार में बैठे लोग लगातार दे रहे हैं, फिर भी मांग में बढ़ोत्तरी की गुंजाइश दिख नहीं रही है। यही कारण है कि विगत नौ जनवरी 2020 को प्रधानमंत्री ने जहां एक ओर नीति आयोग में देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों के साथ बैठक की, तो वित्त मंत्री जमीनी हकीकत की नब्ज समझने के लिए भाजपा से जुड़े अर्थशास्त्र के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों से मिलीं। जो बात निकल कर आयी वो इस बात को पुष्ट करती है कि सभी अर्थव्यवस्था के खराब हालात से वाकिफ हैं औऱ उसे उबारने का सम्भावित उपाय करने को इच्छुक भी।

वर्तमान में ये आर्थिक अवसान इसलिए भी गहरा गया है क्योकि भारतीय गांवों में खपत का स्तर कम हुआ है। कृषि, जिसपर आज भी भारत की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से लगभग 60 प्रतिशत आबादी निर्भर करती है, के जीवन स्तर को बढ़ाने से ही बड़े स्तर पर मांग का सृजन किया जा सकता है। ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री जनधन योजना के अन्तर्गत दिसम्बर 2019 तक 37.70 करोड़ जनधन खाते विभिन्न बैकों में खोले गये हैं। आवश्यकता है इन सभी खाताधारकों को अर्थव्यवस्था के मुख्य धारा में जोड़ने की।

कृषि में अभी भी नवाचार का अभाव है। ज्यादातर किसान गेहूं-चावल औऱ मौसम की मार में उलझे रहते है, जबकि हमें प्याज, फल और कई दलहन का आयात करना पड़ता है। इसका समाधान ऱाष्ट्रीय कृषि नीति के साथ राज्यों द्वारा अपनी स्थानीय अनुकूलता को ध्यान में रखकर फसलों के निर्धारण और लीक से हट कर जैसे- अन्य फसलों को सरकारी समर्थन जैसे कदम उठाने होगें। भारत इस दरम्यान निर्माण क्षेत्र में नवाचार के सन्दर्भ मे विश्व के अन्य देशों से पीछे रह गया था, जिसका खामियाजा बड़े पैमाने पर रोजगार सृजनता के रुप में चुकाना पड़ा है।

आगामी बजट 2020 में इस ओर बड़े पैमाने पर सुधार की आवश्यकता है। यहां तक कि आज भी भारत की कई सरकारी कम्पनियों में 1980 या 90 की तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। एक अनुमान है कि भारत की सबसे बड़ी उर्जा उत्पादन कम्पनी एनटीपीसी के दर्जनो प्लाण्ट दशकों पुराने हो चुके हैं, फिर भी प्रयोग में लाये जा रहे हैं।

इसी तरह एक बड़े पैमाने पर सुधार की गुंजाइश है जहां से हम भारत के विनिर्माण उद्योग में जान फूंक सकते हैं। साथ ही आर्टीफिशियल इण्टेलिजेन्स, स्पेस तकनीक जैसे नवाचारी क्षेत्रों में निवेश की ओर भी हमें बढ़ना होगा, तभी हम विश्व से मुकाबला कर पायेगें। सेवा क्षेत्र, 1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे सुनहरा पक्ष रहा, जिसमें अभी भी अपार सम्भावनाएं हैं। सेवा क्षेत्र का बढ़ना भारतीय अर्थव्यवस्था को तुरन्त संजीवनी उपलब्ध करा सकता है।

विशेष रूप से जब पूरा का पूरा यूरोप औऱ जापान बूढ़े हो रहे हैंं और भारत अपने युवा आबादी के जनसाख्यिकी लाभ के अन्तिम दशक में प्रवेश कर रहा है तो ऐसे में बजट में कुछ ऐसे अनोखे प्रयास करने होगें जो वित्तीय सेवा, फार्मा एंव तकनीक जानकारों, जिरियाट्रिक सेवियों, शोध और पर्यटन विशेषज्ञों जैसे क्षेत्रों में वैदेशिक मांग के अनरूप दक्ष युवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकें। इन प्रयासों के साथ ही वित्त मंत्री को अपने 2020 के बजट में नये भारत में आर्थिक असमानता को कम करने के अनोखे उपाय भी करने होंगे, जिससे क्रोनी कैप‍िटल‍िज्‍म के खिलाफ सरकार के प्रयास को समर्थन मिल सके।

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