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प्रयागराज में बुलडोजर ने संविधान को दी चुनौती, पत्नी के नाम था घर तो जावेद को क्यों भेजा गया नोटिस?

मोहम्मद जावेद का घर गिराना न सिर्फ उनके लिए बल्कि उनके पूरे समुदाय के लिए एक संदेश था। इस कड़ी में अगला नंबर किसका होगा, यह कोई नहीं जानता।

Bulldozer | constitution | Prayagraj
मोहम्मद जावेद के साथ जो हुआ है वह अकेला मामला नहीं है। जिला पुलिस 10 जून की घटना में शामिल 85 प्रमुख आरोपियों के नाम इसी तरह की कार्रवाई के लिए नगर निगम के अधिकारियों को भेज रही है। (Photo Credit – PTI)

रेखा शर्मा

प्रयागराज में 12 जून को जो हुआ उसे संविधान और कानूनों का उल्लंघन कहा जा सकता है। उस दिन प्रयागराज के कराला इलाके में एक दो मंजिला घर (39सी/2ए/1) को प्रयागराज नगर प्राधिकरण (PMA) ने बुलडोजर से ढाह दिया। इस घर में मोहम्मद जावेद अपने परिवार के साथ रहते थे। अधिकारियों से निर्माण संबंधित आवश्यक मंजूरी न लेने के आधार पर घर को मलबे में बदल दिया गया।

हालांकि मामला इतना आसान नहीं है, जितना बताया जा रहा है। जाहिरा तौर पर जावेद को जीवन भर का सबक सिखाने के लिए उनका घर गिराया गया। यूपी पुलिस के लिए जावेद 10 जून को हुई हिंसा के मास्टरमाइंड हैं, जो नूपुर शर्मा की टिप्पणी के खिलाफ शुक्रवार के विरोध प्रदर्शन के बाद भड़की थी। ऐसा लगता है इस पूरे प्रकरण की पटकथा न केवल जावेद को बल्कि उनके समुदाय को संदेश देने के लिए लिखी गई थी। राज्य प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया कि अगर कोई भी उन्हें बदनाम करेगा, चाहे वह सोशल मीडिया पर एक ट्वीट के माध्यम से हो या धरना या विरोध मार्च के माध्यम से… उसका यही अंजाम होगा।

मकान पर बुलडोजर चलाए जाने से एक दिन पहले जावेद को 10 जून की हिंसा में कथित संलिप्तता के लिए हिरासत में लिया गया था। उसी दिन PMA ने घर के गेट पर एक नोटिस चस्पा किया था, जिसमें कहा गया था कि 25×60 फीट का निर्माण संबंधित अधिकारियों की अनुमति के बिना जमीन और पहली मंजिल पर किया गया है। जावेद की छोटी बेटी सुमैया के मुताबिक, घर पर मालिकाना हक उनकी मां परवीन फातिमा का था। यह फातिमा को उनके पिता ने दो दशक पहले उपहार में दी थी। सुमैया बताती हैं कि घर के दरवाजे पर चिपकाया गया नोटिस पिता के नाम पर था, न की माता के नाम पर। नोटिस में 12 जून की सुबह 11:00 बजे तक घर खाली करने का आदेश था। सुमैया का कहना है कि किसी भी सरकारी एजेंसी ने उन्हें कभी नहीं बताया था कि उनका घर अवैध रूप से बना है। घर का हाउस टैक्स, वाटर टैक्स और बिजली बिल समय पर भरा जा रहा था।

अधिकारियों ने सुमैया के दावों का खंडन नहीं किया है, लेकिन उन्होंने कहा है कि 5 मई को मोहम्मद जावेद को कारण बताओ नोटिस भेजा गया था और उन्होंने उसका जवाब नहीं दिया। परिवार ने ऐसा कोई नोटिस मिलने से इनकार किया है। बात जो भी हो लेकिन यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि नोटिस जावेद को क्यों भेजा गया, जब वो संपत्ति के मालिक ही नहीं थे। घर पर मालिकाना हक जावेद की पत्नी का था, जिनकी अपनी स्वतंत्र पहचान है। इस प्रकार वह कानून के संरक्षण और निर्धारित प्रक्रिया की हकदार थी, जिसका पालन उनकी संपत्ति के संबंध में कोई कार्रवाई करने से पहले किया जाना चाहिए था। उदाहरण के लिए संपत्ति के सही मालिक को उचित नोटिस देना, उसका जवाब देने के लिए पर्याप्त समय देना, नोटिस का जवाब न मिलने पर आमने-सामने बातचीत, एक अंतिम नोटिस देना जिसमें कार्रवाई की जानकारी दी गई है।

ये प्रिंसिपल जस्टिस का सिद्धांत हैं जो कानून के शासन के मूल में हैं और एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार इसका पालन करने के लिए बाध्य है। लेकिन दुर्भाग्य से इन सिद्धांतों को यूपी सरकार ने हवा में उड़ा दिया, जो अब जज, जूरी और जल्लाद के रूप में काम कर रही है।

आइए एक पल के लिए मान लें कि यूपी सरकार जो कह रही है वह सच है। लेकिन सरकार को अभी भी बहुत कुछ समझाने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, सरकार को यह खुलासा करना चाहिए कि भवन का निर्माण कब शुरू हुआ, क्या उस स्तर पर मालिक को यह सूचित करने के लिए कोई नोटिस जारी किया गया था कि निर्माण अनधिकृत है, क्या इसे रोकने की आवश्यकता पड़ी थी, क्या उस स्तर पर कोई कार्रवाई की गई थी, यदि हाँ, तो क्या? यदि नहीं, तो क्यों नहीं? निर्माण कब पूरा हुआ और इसके पूरा होने के कितने समय बाद जावेद को कथित नोटिस भेजा गया, जिसका वह कथित रूप से जवाब देने में विफल रहे। मोहल्ले में कितने भवनों का निर्माण बिना कानूनी स्वीकृति के किया गया है और यदि वे अनाधिकृत हैं तो उन भवनों के विरुद्ध क्या कार्यवाही की गई है। यदि निर्माण के दौरान ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया था, तो क्या ऐसे अवैध निर्माण की अनुमति देने वाले सरकारी पदाधिकारियों की पहचान नहीं की जानी चाहिए? चूंकि यूपी सरकार कथित अपराधियों के घरों को गिराने में विश्वास रखती है, भले ही इस तरह की सजा कानून के दायरे से बाहर है और भले ही कानून की अदालत में अपराध साबित होना बाकी हो, तो क्या ऐसे में दोषी अधिकारियों के घरों को भी नहीं गिराया जाना चाहिए?

मोहम्मद जावेद के साथ जो हुआ है वह अकेला मामला नहीं है। जिला पुलिस 10 जून की घटना में शामिल 85 प्रमुख आरोपियों के नाम इसी तरह की कार्रवाई के लिए नगर निगम के अधिकारियों को भेज रही है। अगला नंबर किसका होगा ये कोई नहीं जानता। हिरासत में लिए गए लोगों के परिजन दहशत में हैं। वे अपने घरों के विध्वंस को रोकने दस्तावेज इकट्ठा कर रहे हैं। क्या यह विडम्बना नहीं है कि नुपुर शर्मा, जिनकी बातों से देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा और जिन्हें भाजपा ने भी खुद निलंबित कर दिया है, वो आज़ाद घूम रही हैं। जबकि उनकी टिप्पणी से आहत लोग हिरासत में हैं। साथ ही विध्वंस का खतरा भी झेल रहे हैं। इस स्थिति में पीड़ितों के पास इसे रोकने के लिए उच्च न्यायालयों और विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय की ओर देखने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। यही संस्थाएं मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता की संरक्षक हैं। खुशी की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर संज्ञान लिया है।

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