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वक्त की नब्ज़ः विकास के बुलबुले और हकीकत

हमारे राजनेताओं की पुरानी आदत है, दुनिया की रफ्तार को अनदेखा करके अपनी रफ्तार पर चलना।

दक्षिण चीन सागर में अपने पड़ोसियों के साथ चीन के विवाद के मद्देनजर शी जिनपिंग की यह टिप्पणी सामने आई है। (File Photo)

जिस जोश से शी जिनपिंग का स्वागत हुआ दावोस में, वह न होता अगर चीन की आर्थिक अहमियत  विश्व की अर्थव्यवस्था को इतना प्रभावित न कर रही होती। दुनिया की अर्थव्यवस्था पर जो मंदी छाई रही है 2008 के बाद, अब तेजी से हट रही है।

हमारे राजनेताओं की पुरानी आदत है, दुनिया की रफ्तार को अनदेखा करके अपनी रफ्तार पर चलना। सो, जब चीन के देंग शियाओ पिंग ने सत्तर के दशक के आखिरी वर्षों में मार्क्सवादी आर्थिक नीतियों को कूड़ेदान में फेंक कर चीन की आर्थिक दिशा को बदलने का फैसला किया, तो हमारे राजनेताओं ने भारत को उसी समाजवादी दिशा में रखा, जिसने देश को गरीब रखा और हमारे आला अधिकारियों को अमीर बनाया था। क्यों न बनते अमीर, जब देश की अर्थव्यवस्था की सारी चाभियां उनके हाथों में थीं? डबल रोटी और वनस्पति घी से लेकर हवाई जहाज और हथियार बनाने का काम भारत सरकार करती थी। साथ-साथ निजी उद्योगों को इन अधिकारियों ने कुचल कर रखा, ताकि उनकी अपनी नाकामियों का पर्दाफाश न हो। जब तक नब्बे के दशक में प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने लाइसेंस राज खत्म करने का फैसला किया, हमसे आगे निकल गए थे चीन और दक्षिण-पूर्व के तमाम देश, जिन्होंने आर्थिक हवा के बदलते रुख को भांप कर अपनी दिशा बदल ली थी। क्या ऐसा कुछ आज भी हो रहा है?

दावोस आए भारतीय उद्योगपति और आला अधिकारियों के मायूस चेहरों को देख कर मुझे तो ऐसा ही लगा। हम सब थे हॉल में, जब चीन के राष्ट्रपति ने ऐसा शानदार, समझदार भाषण दिया वैश्वीकरण (ग्लोबलाइजेशन) पर कि दुनिया दंग रह गई। बाद में जब हम भारतवासियों ने आपस में बातें की, तो सबकी राय यही थी कि जिस जोश से शी जिनपिंग का स्वागत हुआ दावोस में, वह न होता अगर चीन की आर्थिक अहमियत विश्व की अर्थव्यवस्था को इतना प्रभावित न कर रही होती। दुनिया की अर्थव्यवस्था पर जो मंदी छाई रही है 2008 के बाद, अब तेजी से हट रही है। न सिर्फ एक नई ऊर्जा दिख रही है यूरोप में, अमेरिका में ऐसे परिवर्तन की उम्मीद की जा रही है डोनाल्ड टंÑप के राष्ट्रपति बनने के बाद, जिसकी चर्चा तक नहीं हो रही है भारत में अभी तक।

अमेरिका में निवेश करना आसान करने का काम अगर करते हैं राष्ट्रपति टंÑप, तो विदेशी निवेशक अपना पैसा क्यों भारत लाएंगे? और विदेशी पैसा अगर भारत में आना बंद हो जाता है, तो हमारी अर्थव्यवस्था पर मंदी के बादल छा जाएंगे बहुत जल्दी। इस संभावना को अनदेखा करके दावोस के बाजार में भारत सरकार ने मेक इन इंडिया के बड़े-बड़े बोर्ड लगा रखे थे और आंध्र सरकार ने भी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए दुकान खोल रखी थी। इनको देख कर मुझे ऐसा लगा कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के इस वार्षिक सम्मेलन में जो चर्चा हो रही थी, उसको हमारे अधिकारियों ने सुना तक नहीं। सभागार में दुनिया के सबसे जाने-माने धनवान, विद्वान और वैज्ञानिक बातें कर रहे थे चौथे औद्योगिक क्रांति की, जिसके आने से कई पुराने उद्योग बंद हो सकते हैं। सौर ऊर्जा की बातें कर रहे थे, चिकित्सा में डॉक्टरों की जरूरत कम होने का अंदेशा जता रहे थे और विज्ञान में एक नया दौर आने की बातें कर रहे थे।

हम हैं कि अब भी यह उम्मीद पाले बैठे हैं कि जिस तरह चीन का विकास हुआ विदेशी निवेशकों की बदौलत, उस तरह हम भी आगे बढ़ेंगे। कड़वा सच यह है कि भारत एक बार फिर तब होश में आएगा शायद, जब गाड़ी प्लेटफार्म से निकल चुकी होगी। हमारे प्रधानमंत्री डिजिटल की खूब बातें कर रहे हैं इन दिनों, लेकिन यह नहीं देख रहे कि इसका लाभ तब पहुंचेगा देश के आम आदमी को, जब इंटरनेट की सुविधा गांव-गांव तक पहुंचेगी। यह कैसे होगा, जब देहातों में बिजली पर भरोसा नहीं किया जा सकता? हाल यह है कि महानगरों में भी इंटरनेट हासिल करना बहुत कम लोगों के लिए आसान है।
मेक इन इंडिया की भी बातें अभी हवा में हो रही हैं, क्योंकि जब तक यातायात सेवाओं में सुधार नहीं आएगा, कौन-से विदेशी निवेशक भारत में निवेश करने को तैयार होंगे? मसलन, हमारी सड़कें इतनी टूटी-पुरानी हैं कि जहां अन्य देशों में एक शहर से दूसरे शहर तक जाने में एक घंटा लगता है, हमारे भारत महान में कई घंटे लगते हैं। हमारी रेल सेवाएं भी पुरानी और रद्दी हैं। ऊपर से निवेशकों को हमारे अधिकारी लाल फीताशाही में ऐसे उलझा सकते हैं कि कारखाना लगाने या कोई नया उद्योग शुरू करने में कई महीने बर्बाद हो सकते हैं।

दावोस में इस बार मेरी मुलाकातें हुर्इं ऐसे निवेशकों से, जिन्होंने बताया कि उन्होंने भारत में निवेश किया था कुछ साल पहले, लेकिन दुबारा यह गलती नहीं करने वाले हैं, क्योंकि बिजनेस करना अपने देश में इतना मुश्किल है कि अक्सर नुकसान होता है, मुनाफा नहीं। उनको डर यह भी है कि किसी कारोबार में निवेश करने के बाद सरकारें अपनी नियम-नीतियां इतनी जल्दी बदल लेती हैं कि उनका पैसा अटक जाता है और उसे हासिल करने के लिए उन्हें अदालतों के दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं और मुकदमा कई सालों तक चलता है।

इस बार दावोस से भारत के लिए सिर्फ बुरी खबरें लेकर आई हूं। जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे, तो दुनिया को बहुत उम्मीद थी कि वे तेजी से आर्थिक सुधार लाकर दिखाएंगे। ऐसा किया होता प्रधानमंत्रीजी आपने, तो संभव है कि शी जिनपिंग की जगह आप होते। लेकिन इन सुधारों के न होने से विदेशी ही नहीं, देसी निवेशक भी नहीं दिख रहे हैं। एक अमेरिकी उद्योगपति के शब्दों में, ‘क्या भारतीय उद्योगपति नए उद्योगों में निवेश कर रहे हैं? और अगर ऐसा नहीं कर रहे हैं तो हम क्यों अपना पैसा डालें भारत में।’ यह बात उन्होंने हमारे एक आला अधिकारी से कही।

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