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कांग्रेस और राहुल गांधी को पता ही नहीं क‍ि उन्‍हें क्‍यों संघर्ष करना पड़ रहा?

राहुल गांधी को लेकर ब्लॉग।

दिल्ली के रामलीला मैदान पर रैली में बोलते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी। (फोटो- पीटीआई)

प्रताप भानु मेहता

हो सकता है कि नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ा रहा है, लेकिन विपक्ष अभी भी इस स्थिति का लाभ उठाने की हालत में नहीं है। विपक्ष को इस मामले में बहुत कुछ करने की जरूरत है। उन्हें अपने को एक दिखाना होगा, वैकल्पिक नीति तैयार करनी होगी और फिर उसके मुताबिक संगठन को धार देनी होगी। लेकिन इन सबके बीच कांग्रेस के लिए सबसे जरूरी काम अतीत के कुछ हिस्सों से खुद को अलग करने का होना चाहिए। इसके लिए सबसे सही शुरुआत खुद से यह सवाल पूछ कर हो सकती है कि क्या जिस पार्टी ने आजादी की लड़ाई लड़ी वह उदारवादी लोकतंत्र में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अधिकतम रक्षा की लड़ाई लड़ने को तैयार है?

क्या कांग्रेस खुद को कानूनी और संस्थागत मामले में बीजेपी से अलग करते हुए स्वतंत्रता के नए घोषणापत्र का ऐलान करेगी, जो नागरिकों को ज्यादा अधिकार देता है। इसके लिए किताबों में मौजूद उन कानूनों पर गौर किया जाना जरूरी है, जो किसी उदारवादी लोकतंत्र के चरित्र पर धब्बे की तरह हैं। देशद्रोह का कानून, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, धर्मांतरण विरोधी कानून, सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून, बोलने और लिखने की राह में बाधा डालने वाला आपराधिक मानहानि का कानून और गौरक्षा कानून जो राज्य को किसी व्यक्ति के निजी अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण का असीमिति अधिकार देते हैं। ऐसे कानूनों की सूची बेहद लंबी है। इन कानूनों को खत्म किया जाना जरूरी है या फिर इनके खिलाफ लोगों को ज्यादा बचाव के तरीके मिलने चाहिए।

दूसरे क्षेत्रों से भी ऐसे कानूनों का उदाहरण दिया जा सकता है। देश में ऐसे कानूनों की सूची बेहद लंबी है, जिनका इस्तेमाल पुलिस धड़ल्ले से करती है। वह पुलिस जिसकी पूरी व्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार किए जाने की जरूरत है। जब कभी भी राज्य या सरकारें इन कानूनों का इस्तेमाल करती है, विपक्षी दल केस के हिसाब से इसका विरोध करते हैं। फिर हमें यह पता चलता है कि इन कानूनों में क्या गलत है। ये कानून राज्य को हमारे अधिकारों पर अंकुश लगाने की असीमित ताकत देते हैं।

यहां पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच एक अहम फर्क उभरकर सामने आता है। बीजेपी को जब कभी भी स्टेट कंट्रोल बढ़ाना होता है तो उसे ऐसा करने के लिए किसी नए कानून को बनाने की जरूरत महसूस नहीं होती है। पूर्वोत्तर के राज्यों को ही अगर उदाहरण के तौर पर लिया जाए तो वह खुद को अफ्स्पा के पक्ष में खड़ा कर लेती है। ऐसे में जब कोई केस खुद को सूट करे तो केस के हिसाब से स्टेट ऐक्शन पर आवाज उठाना और बाद में राज्य हस्तक्षेप की कानूनी संरचना को बरकरार रहने देना ठीक बात नहीं।

ऐसा ही यूएपीए के हालिया इस्तेमाल को लेकर देखने को मिला, जिसे वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ यूज किया गया। स्वतंत्रता के नए घोषणापत्र का ऐलान कांग्रेस के लिए क्यों जरूरी है? पहला, इससे यह संदेश जाएगा कि कांग्रेस अपनी अतीत की गलतियों को सुधारना चाहती है और वह उनसे मुक्ति पाना चाहती है। शायद यह विभाजन के बाद की अनिवार्यता हो लेकिन तथ्य यही है कि नागरिक स्वतंत्रता के मुद्दे पर कांग्रेस अनिश्चित रूप से स्थिर रही। यह सबकुछ पहले संशोधन पर बहस के साथ शुरू हुआ जहां जवाहरलाल नेहरू इतिहास के गलत पक्ष में खड़े दिखे। कांग्रेस के लिए यह बहुत जरूरी है कि वह सर्वाधिकारवाद की तीखी आलोचक के रूप में सामने आए। यह बात केवल नागरिक स्वतंत्रता पर नहीं बल्कि दूसरे संस्थानों पर भी लागू होती है।

उदाहरण के लिए जो भी उच्च शिक्षा के इतिहास से परिचित हैं, स्पष्ट रूप से विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर कांग्रेस के विरोध को स्वीकार नहीं कर सकते। दूसरा, कांग्रेस और राहुल गांधी को वास्तव में पता ही नहीं है कि उन्हें क्यों संघर्ष करना पड़ रहा है? समस्या यह नहीं है कि उनकी पहचान ऐंटी हिंदू की हो गई। यह समस्या दोगुनी है। वे समुदायों के बीच में व्यक्तिगत अधिकारों के मानकों को ठीक से लागू नहीं करा पाए। इसके उलट समुदायों के बीच इन्हें लेकर प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई। हालांकि सबसे गंभीर समस्या नागरिक स्वतंत्रता को बचाने के मुद्दे पर साहस की कमी है। राहुल के लिए खुद की लीडरशिप को प्रोजेक्ट करने की मुख्य चुनौती निजी विशिष्टता या उदारता नहीं है। राहुल गांधी के पास मंत्री या मुख्यमंत्री के तौर पर शासन का इतिहास भी नहीं है। राहुल गांधी के लिए जरूरी है कि वह अपने को ऐसे पेश करें जिससे यह संदेश जाए कि उनके पास सामने से नेतृत्व करने की क्षमता है।

हालांकि ताजातरीन हासिल की गई ऊर्जा के बावजूद सामने से लीडरशिप देने की उनकी क्वॉलिटी पर अभी भी सवाल है। क्या उनकी पार्टी की आतंरिक कार्यशैली में सुधार हुआ है? अगर उनकी पार्टी साहस दिखाकर स्वतंत्रता के नए चार्टर के पक्ष में आई तो यह दृढ़ विश्वास का साहस दिखाएगा। यह नौजवान लोगों पर असरदार होगा। इस दिशा में देखें तो पंजाब में ‘ईश निंदा’ कानून की कवायद इसे चोट पहुंचा रही है। इससे केवल यही संदेश नहीं जा रहा कि कांग्रेस आजादी के पक्ष में नहीं और एक खतरनाक उदाहरण पेश कर रही है। इससे यह भी संदेह खड़ा हो रहा है कि राहुल पार्टी को स्वतंत्रता की तरफ ले जाने में सक्षम साबित नहीं हो रहे हैं।

तीसरा, नरेंद्र मोदी अगर दूसरी बार सत्ता में आते हैं तो संस्थानों पर इसके असर को लेकर चिंता जताई जा रही है। इसके विरोध का एक हिस्सा यह हो सकता है कि विपक्ष नए सांस्थानिक नैरेटिव के लिए तैयार है। यह कि विपक्ष भय की राजनीति को हावी नहीं होने देगा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में नहीं पड़ेगी।

यह कहना पड़ेगा कि मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिम गवर्नेंस महज एक जुमला है। क्योंकि इसका असल में कुछ मायने है तो यह कि व्यक्तिगत और नागरिक स्वतंत्रता सर्वोच्च रूप में हो। सुप्रीम कोर्ट ने नवतेज जौहर के मामले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक जज्बा जगाया है। कांग्रेस ने इस निर्णय का स्वागत किया और यह क्रेडिट जाता है कि वह सत्ताधारी पार्टी की चुप्पी के पीछे छिपी नहीं। हालांकि निजी स्वतंत्रता की व्यापक अवधारणाओं, बोलने की आजादी, धर्म चुनने की आाजादी, खाने की आजादी, आंदोलन की आजादी, बिना किसी आरोप के छह महीने तक हिरासत में रखने से आजादी, इन सभी के लिए एक मजबूत कानूनी सुरक्षा की जरूरत है।

यह मानना एक भूल है कि एक मजबूत कानूनी व्यवस्था और बेहतर पुलिसिंग केवल अभिजात्य मुद्दे हैं। इसके उलट गरीबों को ज्यादा झेलना पड़ता है। गांधी और नेहरू से आगे बढ़कर अब कल के भारत को आजादी के नए चार्टर की जरूरत है। क्या ऐसी कोई पार्टी है जो इस खाली पड़े स्पेस को भरने के लिए सामने आकर न्याय करेगी?

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