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बेबाक बोलः किताबगीरी- छापाखाना

डिजिटल गान के बरक्स छापेखाने की जिजीविषा पर इस बार का बेबाक बोल। इस बार दो टिप्पणियां ऐसी हैं जो पहले सोशल मीडिया पर आर्इं और बाद में छापेखाने में गर्इं। तो अखबार के पन्ने पर किताबी कीड़ों की भावुकता की खुशबू सूंघिएगा जरूर।

Author Updated: January 14, 2017 2:21 AM
किताबों के साथ अनजाने में हुई यह लापरवाही उनके बीच तोहमतों की ऐसी दीवार खड़ी करती है जो दोनों के बीच नाकाबिले बर्दाश्त है।

बीसवीं सदी के अंत के साथ उत्तर आधुनिक कहे जाने वाले लोगों ने इतिहास के अंत का शोर मचाया था और इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बाद उत्तर सत्य के युग में छापेखाने की मौत का एलान किया जा रहा है। उत्तर आधुनिक तो जिंदा इतिहास की किताबों में एक अध्याय बन गए हैं और उत्तर सत्यवादियों का इतिहास भी छापाखाना ही लिखेगा। आग और पहिए के आविष्कार के बाद छापेखाने ने इंसान को आदिम से आधुनिक बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। डिजिटल गान के बरक्स छापेखाने की जिजीविषा पर इस बार का बेबाक बोल। इस बार दो टिप्पणियां ऐसी हैं जो पहले सोशल मीडिया पर आर्इं और बाद में छापेखाने में गर्इं। तो अखबार के पन्ने पर किताबी कीड़ों की भावुकता की खुशबू सूंघिएगा जरूर।

ऐन फादिमान अपनी किताब एक्स लिबरिस के एक अध्याय में आत्मकथात्मक रूप से एक ऐसे जोड़े की कहानी बताती हैं जिन्हें किताबों से अप्रतिम लगाव है। घर में किताबें भरी पड़ी हैं। खूब पढ़ते हैं दोनों। इनके बीच वैचारिक बहसें होती हैं। बहसों से इन्हें नए नजरिए मिलते हैं और उनका प्यार उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। इसी बीच कुछ खास कारणों से उनकी कुछ किताबें इधर-उधर हो जाती हैं। किताबों के साथ अनजाने में हुई यह लापरवाही उनके बीच तोहमतों की ऐसी दीवार खड़ी करती है जो दोनों के बीच नाकाबिले बर्दाश्त है। दोनों में मनमुटाव गहराता जाता है। आखिरकार, तमाम विचार हाशिए पर छूट जाते हैं। सारे आदर्श बिखर जाते हैं। और इन दोनों के बीच सुलह तभी होती है जब वे अपनी-अपनी किताबों को अपने मुताबिक रखते हैं। एक शादीशुदा जोड़े की जिंदगी में किताबों के जरिए प्यार और तकरार का मर्मस्पर्शी अध्याय है फादिमान की किताब।

फादिमान की चर्चा का मकसद महज यह ध्यान दिलाना है कि मानव का किताबों के साथ वैसा ही भावनात्मक रिश्ता होता है जैसा उसका अपनी संपत्ति के साथ। जैसे वह अपनी नकदी, अपने जेवर, अपनी जमीन, अपनी जायदाद की विरासत को देखता है वैसे ही वह अपने अक्षर की विरासत को भी देखता और महसूसता है। अगर उसके पास उसकी कोई प्रिय पुस्तक है और उसकी एक ही प्रति उसके पास है तो वह उसे किसी से साझा करना नहीं चाहेगा। बंगाल हो या केरल या हिंदी पट्टी का कोई इलाका, किताबों की आलमारी भी विरासत के तौर पर देखी जाती है। विमुद्रीकरण के दौर में मुझे एक-दो ऐसे लोग भी मिले जो हर दिवाली में देवी लक्ष्मी को रुपए चढ़ाते हैं और हजार के इन नोटों को कभी खरचते नहीं। सालों की अपनी इस आस्था को आरबीआइ के पास जमा करने के बजाए रद्दी के रूप में अपने पास ही रखना पसंद किया। यह रुपए का मोह नहीं बल्कि देवी के प्रति वह आस्था है जिसे वे सहेज कर रखना चाहते हैं। इसी तरह देखता हूं कि कुछ लोगों को किताबों से भी बड़ा लगाव है। जो किताब उन्हें बेहद प्रिय है उसे वे किसी को देना नहीं चाहते। और जो पढ़ने के लिए कोई मांग कर जाए तो उसी क्षण अपनी डायरी में किताब का नाम उस शख्स के नाम के साथ नोट कर लेते हैं ताकि उनकी किताब खो न जाए। कहने का मतलब यह कि हमारे समाज में पुस्तकें संपत्ति और सरोकार व संस्कृति के तौर पर भी देखी गई हैं।

एक सच यह भी है कि डिजिटल होने के इन वर्षों में किताब पढ़ने की आदत में संकुचन आया है। इस संकुचन को लेकर गुलजार की बहुचर्चित नज्म की कुछ पंक्तियां हैं : किताबें झांकती हैं बंद आलमारी के शीशों से/… बड़ी हसरत से तकती हैं/महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं, जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं/अब अक्सर गुजर जाती हैं कंप्यूटर के पर्दों पर/…कभी सीने पर रख के लेट जाते थे, कभी गोदी में लेते थे/…वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी/मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल और महके हुए रुक्के/किताबें मांगने, गिरने, उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे उनका क्या होगा?/वो शायद अब नहीं होंगे। जिस समाज का किताबों के साथ ऐसा भावुक रिश्ता हो, वहां सब-कुछ का डिजिटलीकरण करने की जिद पूरी हो जाए इसमें संदेह है। जो भारतीय समाज अक्षर की विरासत को लेकर, छापेखाने की विरासत को लेकर इतना सजग और संवेदनशील है, वहां सब-कुछ डिजिटल किए जाने की घोषणा या छापेखाने की मौत का एलान अति काल्पनिक लगते हैं।

जिन्हें यह शोर वाजिब लगता है, मैं चाहूंगा कि वे फिलहाल दिल्ली के प्रगति मैदान का मुआयना कर आएं। किताबों की खुशबू लेते बच्चे, जिल्द सहलाते नौजवान और आंखें गड़ाए बुजुर्ग एक साथ नजर आ जाएंगे। पांव रखने की जगह नहीं मिल रही यहां। दाल-रोटी से लेकर कपड़े तक बजट बनाकर खरीदने वाला मध्यम वर्ग आपको दिखेगा जिसकी बजट डायरी में पुस्तक मेले के लिए भी अलग से पैसे रखे गए थे। आपको यहां ऐसी मां मिल जाएगी जिसने बच्चे के बोर्नविटा और हॉर्लिक्स के साथ उसके लिए कहानियों की किताब लेने का भी बजट बनाया था। अपनी प्र्रेमिका या अपने प्रेमी को अक्षरों के जरिए कुछ बेहतर तोहफा ढूंढ़ते हुए युवा मिल जाएंगे। जनपथ से खरीदी गई जींस से काम चलानेवाले कई युवा बिना किसी गुरेज के अपनी पॉकेटमनी मनपसंद किताबों पर खर्च कर रहे हैं। कई लोगों की कार की डिग्गी किताबों से भर गई है तो जिस दंपति को मेट्रो या बस से जाना है वे झगड़ रहे हैं कि किताबें रखने के लिए साथ में मजबूत थैला क्यों नहीं लाए।
ऐसे माहौल के बीच सरकार की ओर से डिजिटल-डिजिटल की गूंज सुनाई पड़ने लगती है। कुछ ऐसा माहौल रचा जाता है कि जैसे जो डिजिटल नहीं वह खत्म। यानी एक तरह से छापेखाने पर संकट। यह महज इत्तफाक है कि इसी बीच अंग्रेजी का एक अखबार अपने कुछ संस्करणों को बंद करने की घोषणा करता है और अंग्रेजी घराने का ही एक दूसरा बड़ा अखबार इस फैसले को सही ठहराता है। लेकिन सब कुछ डिजिटल होने का सपना और कुछ अखबारों का बंद होना-छापेखाने पर संकट के नकली शोर को हवा देता है।
यह सच है कि डिजिटल दुनिया बड़ी तेजी से अपनी जगह बना रही है। महानगरों और शहरों में इसके पाठक बढ़े हैं। पर दूसरा सच यह भी है कि इसका कोई असर छापेखाने पर नहीं पड़ा। ऐसा ही कुछ शोर तब भी मचा था जब दृश्य माध्यम की शुरुआत हुई थी। कहा गया था कि अब रेडियो और छापेखाने के दिन लद गए। पर हश्र आपके सामने है। दृश्य माध्यम ने अपनी जगह बनाई है और रेडियो ने एफएम चैनल पर लाकर खुद को आपके जीवन का हिस्सा बना लिया। और बराक ओबामा से लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक अपनी ‘मन की बात’ कहने के लिए ‘आकाशवाणी’ का ही इस्तेमाल करते हैं। आखिर प्रधानमंत्री ने अपनी बात रखने के लिए रेडियो को ही माध्यम क्यों चुना?
और, दृश्य माध्यम के दफ्तरों में सुबह का दृश्य देखने लायक होता है कि वे किस तरह खबरें तलाशने के लिए छापेखाने के उत्पादों की खाक छानते हैं। किसी छापेखाने की ‘ब्रेकिंग’ पर विद्वजन बहस करते हैं। राजनीतिक दल की निगाह भी छापेखाने को साधने की होती है। प्रधानमंत्री अपना सबसे पहला साक्षात्कार अखबार को ही देते हैं। भारतीय जनता पार्टी का मीडिया प्रकोष्ठ शायद अन्य दलों के मुताबिक सबसे बड़ा है। अन्य दलों के मीडिया प्रकोष्ठ भी अखबार में छपने और उस पर नजर रखने पर अच्छी-खासी ऊर्जा और संसाधन खर्च करते हैं।
सभ्यता के विकास के लिए अहम खोज रही है आग। इस आग ने आज के इंसानों को स्वाद दिया, सुरक्षा दी। इसके बाद इनसानी विकास को गति दी पहिए ने। पहिए के आने के बाद दूरियां सिमट गर्इं। रोजगार और व्यापार के अवसर खुले। इस विकास का तीसरा अहम पाया रहा छापेखाने का आविष्कार। मुद्रण यंत्रों के निर्माण के बाद हमने अपनी वैचारिक विरासत को सहेजना सीखा। विचारों का प्रसार आसानी से और तेजी से करना शुरू किया। पर इस क्रम में मुद्रणालयों ने यह खूब ध्यान रखा कि उनकी बातों की विश्वसनीयता बनी और बची रहे। मनुष्य को आदिम से आधुनिक में प्रवेश कराने में छापेखाने की भूमिका अहम है।
यहां पर, यह बात भी ध्यान में रहती है कि कभी-कभार निजी लाभ के चक्कर में छापेखाने ने भी अपनी गरिमा नष्ट की है, पर अक्सर ऐसे मौकों के बाद उसने खुद को संभाला है और पुरजोर तरीके से वापसी की है। दरअसल, व्यावसायिक दबावों की मजबूरी और नादानी में कई बार वह अवसरों को उत्सवों में बदलने की चूक करता है और किसी उत्सव को फूहड़ तमाशे में भी तब्दील करता रहा है। पर अक्सर वह अपने मिशन पर लौटा है और मजबूत के बयान की जगह पर कमजोर की आवाज ही बनना पसंद किया है।

वैसे, यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जब भी कोई नया माध्यम आता है, वह अपनी थोड़ी-बहुत जगह बनाता है। पर यह कहना या सोचना कि उसने अपनी जगह किसी दूसरे की जगह काट कर बनाई है, बहुत सतही आकलन होता है। डिजिटल माध्यम के साथ भी कुछ ऐसी ही बात है। बेशक उसने अपनी जगह बनाई है। और जो लोग उसकी मौजूदगी को छापेखाने पर संकट के रूप में देख रहे हैं, वे सतहीपन के शिकार हैं।

दरअसल, छापेखाने का या कहें अखबारों का संकट दूसरा है। दृश्य माध्यम या डिजिटल के आने से यह संकट बढ़ा है। आज के अखबार अब भी लीक पकड़ कर चल रहे हैं। कल यह रास्ता जाम था, जैसी सूचना पाठक के काम की नहीं, इसे छापाखाने से जुड़े नीति नियंताओं ने समझ ली और उन्होंने अपने कदम बढ़ाते हुए, आज यह रास्ता जाम रहेगा जैसी खबरें देनी शुरू कीं, पर बात इतने से नहीं बनने वाली।

अब छापेखाने को ऐसी खबरों के साथ विकल्प बताने पर विचार करना होगा। उन्हें बताना होगा कि दाना मांझी अपनी बीवी की लाश को लेकर जिन रास्तों से गुजर रहा था, उन राहों पर उसे कौन सी सरकारी सुविधाएं मिल सकती थीं और उन जिम्मेदारों से सवाल भी पूछेंगे जो दाना का हिस्सा हड़पने के जिम्मेदार थे। अगर छापाखाना दाना मांझी की आवाज बनकर सत्ता से सवाल करेगा तो दाना मांझी और उसकी जैसी जनता ही छापेखाने को बचाएगी। दाना मांझी को जिंदा रखने के लिए छापेखाने का जिंदा रहना जरूरी है।

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