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संकट में हिंदू धर्म!

आख‍िर ऐसा कैसे हुआ कि हिन्दू धर्म की प्रतीक गोमाता अचानक खलनायिका बन गई? पढ़ें शंभूनाथ शुक्‍ल के व‍िचार।

हर बच्चा, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान अथवा ईसाई इसका जवाब इसी लाइन से शुरू करता था कि गाय हमारी माता है।

शंभूनाथ शुक्ल

अभी कुछ वर्षों पहले तक दसवीं बोर्ड की हिंदी की परीक्षा में एक प्रश्न अनिवार्य रूप से आता था, कि गाय पर निबंध लिखो। हर बच्चा, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान अथवा ईसाई इसका जवाब इसी लाइन से शुरू करता था कि गाय हमारी माता है। वह हमें दूध देती है, जिससे हम हृष्ट-पुष्ट होते हैं। उसके बछड़े हमारे खेतों में काम आते हैं। लेकिन आज जब इसका जवाब पूछा जाए तो हर बच्चा यही कहेगा कि गाय एक ऐसा पशु है, जो रोज़ दंगा कराता है। गाय वही है, लेकिन आज वह माता से एक ऐसे पशु के रूप में उभरी है, जो दंगा कराती है। हिन्दू-मुस्लिम द्वेष पैदा करती है। सच तो यह है कि कुछ कथित गोरक्षकों ने माहौल इतना बिगाड़ दिया है कि गाय एक हिंसक पशु बनती जा रही है। लोग गाय से ही चिढ़ने लगे हैं, यह उन श्रद्धावान वैष्णव हिन्दुओं का अपमान है, जो भोजन के पूर्व पहली रोटी गाय के नाम पर निकालते थे। गाय की यह स्थिति किसने की, यह सवाल जब भी उठेगा, तब भगवा पार्टी के ये कथित गोरक्षक गुंडा वाहिनी दल जैसे प्रतीत होंगे। आखिर ऐसा कैसे हुआ कि हिन्दू धर्म की प्रतीक गोमाता अचानक खलनायिका बन गई, इस पर सोचना पड़ेगा।

इसी तरह हिन्दू धर्म भी आज अराजकता, गुंडई और लंपटई का पर्याय बनता जा रहा है, पहले हम लोग अखबारों में पढ़ते थे कि पश्चिम और मध्य एशिया में धर्मांध लोग अपनी-अपनी सेनाएं बनाकर लूट-पाट किया करते हैं। अफगानिस्तान, ईरान, ईराक़, सीरिया और कुर्द आदि कितने ही देशवासी इसे आज तक भुगत रहे हैं, अगर बताया जाए कि मात्र 45 साल पहले तक अफगानिस्तान में पूर्ण शान्ति बहाल थी। अफगान लोग अपने देश के मेवे लाते और खूब ईमानदारी से व्यापार करते। काबुल देश में औरतों पर कोई पाबंदी नहीं थी, लेकिन उसी मुल्क में एक हिन्दू ब्याहता सुष्मिता बनर्जी की इसलिए हत्या कर दी गई, क्योंकि उसने हिज़ाब पहनने से मना कर दिया था। इसी तरह ईरान में जब शाह रज़ा पहलवी का शासन था तब ईरान की महिलाओं का खुलापन वहां की पहचान थी। लेकिन एक धर्मांध अयातुल्लाह खुमैनी ने सब ख़त्म कर दिया। धर्मांध लोग महिलाओं की आज़ादी को बर्दाश्त नहीं कर पाते। ऐसे लोग पीड़ितों, वंचितों के विरोधी होते हैं तथा अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगाते हैं।

ग्यारहवीं सदी में महमूद ग़ज़नवी भारत में लूट-पाट के मक़सद से आया, तब उसके साथ अल-बरूनी नाम का एक विद्वान भी आया था। उसने बड़ी मेहनत से संस्कृत सीखी और हिन्दुओं के सभी ग्रंथों का अध्ययन किया। उसने लिखा है कि ‘सुल्तान महमूद की आँधी में हिंदू धूल के कणों की तरह उड़ गए, मगर उनका मज़हब यथावत बना रहा’। लेकिन आज हज़ार वर्ष बाद स्थिति यह है कि हिंदू तो खूब हैं, लेकिन उनका धर्म नष्ट हो रहा है, उनके प्रतीक नष्ट हो रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से हम देख रहे हैं कि हिंदू धर्म और संस्कृति के नाम पर जिस तरह से अराजक तत्त्व उत्पात मचाए हैं, उससे हिन्दू धर्म की अपनी पहचान- उदारता, उदात्तता और सहिष्णुता नष्ट होती जा रही है। मालूम हो कि हिन्दुओं के इन्हीं गुणों के चलते सेमेटिक धर्मों के अनुयायी भी हिन्दुओं के समक्ष लज़्ज़ित होते हैं, लेकिन भगवा ब्रिगेड के नए सिपहसालारों ने पूरे हिन्दू समाज को ही शर्मिंदा कर दिया है।

दुर्भाग्य से आज अपने देश में भी धर्मांध लोग सिर उठाने लगे हैं, इसमें भी कड़वा तथ्य यह है कि हिन्दुओं में यह कट्टरता आती जा रही है, जिनकी छवि ही उदार और सहिष्णु की थी। हिन्दू समाज ने कभी भी धर्म के नाम पर रक्त-पात नहीं किया लेकिन आज यह स्थिति हो गई है कि हिन्दुओं की भगवा ब्रिगेड इसी धर्मान्धता की पर्याय बन गई है। हिन्दुओं के लिए यह शर्म की बात है कि उनकी सांस्कृतिक पहचान खत्म हो रही है, और उनकी डायवर्सिटी के प्रतीकों पर भी चोट पहुँच रही है। चूंकि गंगा-यमुना का पूरा दोआबा कृषि के मामले में अव्वल रहा है, इसलिए गाय और उसके बछड़े यहाँ पर कृषि संपदा को बढ़ाने वाले पशु थे, इसलिए उनकी पूजा शुरू हुई। लेकिन जैसे-जैसे मशीनों का असर बढ़ता है, पशुओं पर निर्भरता कम होती जाती है। ट्रैक्टर, हारवेस्टर ने यही किया। बैलों को चलन से बाहर कर दिया, कृषि में उनकी उपयोगिता समाप्त हो गयी। ऐसे में बछड़े और बैलों के अन्य उपयोग सोचे गए। कुछ लोग उन्हें कसाइयों को बेचने लगे, जो उनके मांस का निर्यात खाड़ी देशों में करने लगे। इसी तरह बुढ़ाती गायें भी बोझ बनती गईं और स्वयं हिन्दू ही इन्हें कसाइयों को बेचने लगे, लेकिन इसका और कोई हल सोचा नहीं गया, इसलिए किसान क्या करता! उसके समक्ष एक ही विकल्प था कि बोझ बन रहे गोवंश को बेच दिया जाए, वर्ना वह इनके भोजन का जुगाड़ कैसे करता? मगर गोरक्षक तो धर्मांध हैं, उन्होंने और उनके आकाओं ने इसका हल खोजने की बजाय वृहद हिन्दू समाज के मन में मुस्लिम घृणा का पौधा रोपा, ताकि वे इसके बूते अपना वोट बैंक पुख्ता कर सकें, नतीजा क्या निकला वो सबके सामने है!

लेकिन वोट बैंक की इस कुटिल नीति ने किसी का भला नहीं किया। गाय को बचाए रखने की कोई जुगत तलाशी नहीं गई और उसे एक ऐसा दुष्ट पशु बना दिया गया, जो मानव रक्त पीता है। शहरीकरण ने कृषि योग्य भूमि का दायरा कम किया है और जर्सी गायों ने आर्गेनिक दूध को छीन लिया है। भाजपा सरकार को यदि वाक़ई गायों की चिंता है तो वह गायों के आर्गेनिक दूध को बढ़ावा दे। सच तो यह है कि साहीवाल गाय (एक देसी नस्ल) का दूध सौ रुपये किलो से लेकर डेढ़ सौ रुपये किलो तक है। इसी तरह गुजरात और महाराष्ट्र की ‘गीर’ गाय का घी तीन हज़ार रुपये किलो तक। सरकार इस तरह गायों को उपयोगी बनाती तो ये तथाकथित गोरक्षक उत्पात न मचा पाते, लेकिन सरकार को हिन्दू-मुस्लिम घृणा की नीति पर चलना है, गायों को कटने से बचाना उसका मक़सद नहीं। अब हिन्दू धर्म अगर दुनिया में बदनाम होता हो तो इससे सरकार की सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन एक आस्थावान हिन्दू के लिए यह दुखद है, कि जिस हिन्दू धर्म का आधार ही समरसता, सहिष्णुता और उदारता हो, उसी में ये भगवा गुंडे ज़हर घोलें, और दुनिया भर में हिन्दुओं की छवि खराब करें।

(यह लेख Pebble के सौजन्‍य से है और इसमें ल‍िखी बातें लेखक के न‍िजी व‍िचार हैं।)

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