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COVID-19: अफसरशाही ने बढ़ाईं महामारी में मुश्किलें

विपिन वीटिल और आकाश कुमार ने यह लेख लिखा है। विपिन IIT मद्रास में सहायक प्रोफेसर हैं। आकाश IIT मद्रास में चौथे वर्ष के छात्र हैं। इनका कहना है कि कोरोना वायरस की यह महामारी लाइसेंस राज के उस नुकसान को दर्शाती है जिसकी चर्चा हम कदापि ही कभी करते हैं। अगर हमें सफलतापूर्वक महामारियों से लड़ने की तैयारी करनी है तो नियामक सुधार बेहद ज़रूरी हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर

अंग्रेजी में एक कहावत है कि नरक का रास्ता अच्छे इरादों के अवांछित परिणामों से भरा हुआ है। एक मायने में यह बात भारत की कोरोनावायरस से लड़ाई में सच साबित होती दिख रही है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) इस बात का कड़ाई से नियंत्रण करता है कि कौन से निजी लैब्स वायरस का परीक्षण करने के लिया अधिकृत हैं और कौन नहीं। हालांकि, इन आईसीएमआर लाइसेंसिंग नियमों का उद्देश्य उपभोक्ताओं को फ्रॉड से बचाना है। परन्तु, इन नियमों का प्रभाव विपरीत ही पड़ा है। आईसीएमआर के इन नियमों ने महामारी के शुरुआती चरण में निजी कंपनियों के टेस्टिंग किट्स को मंजूरी देने में काफ़ी ज़रूरी समय बरबाद किया। इससे हमारी मरीजों के पता लगाने, इलाज करने और उनको क्वारंटाइन करने की क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

किसी महामारी के खिलाफ लड़ाई में यह ज़रूरी है कि परीक्षण का बाजार अफ़सरशाही के नियंत्रण से मुक्त हो। आईसीएमआर के नियम इस सोच पर आधारित हैं कि चिकित्सा परीक्षण का बाजार एजेंसी द्वारा निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अभाव में विफल हो जाएगा। आखिरकार, अधिकांश उपभोक्ता चिकित्सा विज्ञान के बारे में कम जानते हैं। उपभोक्ताओं के लिए सही-गलत का भेद करना मुश्किल है। उनको बेवकूफ बनाने की इस संभावना के कारण नकली निजी टेस्टिंग किट्स बाज़ार में आ जाएँगी। ये नकली किट्स असली किट्स की तुलना में ज़्यादा पैसे बनाएंगी, क्योंकि नकली परीक्षणों में पैसे की लागत भी ना के बराबर होगी।

कुल मिलाकर हमें यह बताने कि कोशिश है कि सरकारी अफ़सरशाही के बिना बाज़ार में नकली परीक्षणों की बाढ़ आ जाएगी। फिर असली परीक्षणों के अभाव में तर्कसंगत उपभोक्ताओं को परीक्षणों के लिए भुगतान करने का कोई मतलब नहीं होगा। जब परीक्षणों के उपभोक्ता ही नहीं रहेंगे तो परिणामस्वरूप लैब्स किसी भी परीक्षण को बेचेंगी ही नहीं।
अर्थशास्त्र की भाषा में हम ऐसे बाज़ार जो सरकार कि अनुपस्थिति में बैठ जाएँ उनको असममित या विषम सूचना (असिमेट्रिक इन्फॉर्मेशन) वाले बाजार कहते हैं। इसका पहला वर्णन जॉर्ज अकरलोफ ने अपने पेपर “द मार्केट फॉर लेमंस” में किया था।

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अधिकांश नियामक एजेंसियां एक या दूसरे रूप में बाजार की इस विफलता की कहानी से अवगत हैं। हालांकि, कम लोगों को ज्ञात है कि अकरलोफ आगे अपने उसी पेपर में ऐसे बाजार तंत्र की चर्चा करते हैं जो सूचना विषमता द्वारा बनाई गई समस्याओं का सामना कर सकते हैं। यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि उत्पादकों और उपभोक्ताओं के बीच सूचना विषमता की यह समस्या चिकित्सा परीक्षण के बाजार तक ही सीमित नहीं है। यह कहीं न कहीं सभी वस्तुओं और सेवाओं के बाजारों में लागू होती है।

सूचना की इस विषमता का मूल कारण श्रम का विभाजन (डिवीज़न ऑफ़ लेबर) है। रॉबिन्सन क्रूसो यानि एक अकेले आदमी वाली अर्थव्यवस्था में कोई सूचना विषमता नहीं है, जहां एक अकेला आदमी केवल वहीँ चीज़ें इस्तेमाल करता है जिसका उत्पादन उसने किया होता है। श्रम और लेन-देन के विभाजन वाली एक आधुनिक अर्थव्यवस्था में लोग केवल उन वस्तुओं का इस्तेमाल नहीं करते जिसका उत्पादन उन्होंने किया होता है।

असल में आधुनिक अर्थव्यवस्था की उत्पादकता में इस बड़ी वृद्धि का कारण ये है कि, श्रम के विभाजन के साथ आदमी अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं के बारे में विशेष ज्ञान विकसित करता है। पर इस सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि उसी आदमी को अपने द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सामान के बारे में कम से कम पता होता है। अधिकांश लोग अपने द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कंप्यूटर या गाड़ी-घोड़े की मरम्मत नहीं कर सकते हैं, उसके उत्पादन की बात तो दूर की है।

तो हर जगह विषम जानकारी के बावजूद बाजार कैसे काम करते हैं? यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम बाजारों से क्या समझते हैं। यदि हम बाजारों को बस वस्तुओं के व्यापार के स्थान की भांति देखते हैं, तो हमें लगेगा कि कड़े सरकारी नियमों के अभाव में बाजार विफल हो जाएंगे। लेकिन अगर हम बाजारों को उन स्थानों के रूप में सोचते हैं जहां लोग अपने उत्पादन और आदान-प्रदान से जुड़ी प्रतिदिन की समस्याओं को हल करने के लिए एक साथ आते हैं, तो हमें कई तरह की संभावनाएं दिखने लगती हैं।

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बाजार में ब्रांड वैल्यू और कंपनी के नाम और प्रतिष्ठा का महत्व बहुत है। कुछ निजी कंपनियों को यह समझ आता है कि उपभोक्ताओं को कुछ समय के लिए धोखा देने की बजाय लम्बी अवधि में अच्छी गुणवत्ता मुहैया कराने का अधिक लाभ होता है। आखिरकार, उपभोक्ताओं को हमेशा के लिए धोखा नहीं दिया जा सकता। जिन लोगों को खरीदी गई कार की कमतर गुणवत्ता का पता चलता है या जिस लैब के नकली चिकित्सा परीक्षणों की जानकारी मिलती है, भविष्य में वे ऐसी कंपनी से कुछ खरीदने वाले तो बिल्कुल नहीं हैं। उससे बड़ी बात यह है कि उनके द्वारा अपने जान-पहचान के लोगों को भी इस सन्दर्भ में सलाह देने की प्रबल संभावना रहती है।

मुनाफे के लिए बाजार में प्रतिष्ठा मायने रखती है और यहीं कारण है कि कम्पनियाँ अक्सर प्रतियोगियों द्वारा बेचे जाने वाले उत्पादों की खराब गुणवत्ता को उजागर करने की इच्छुक रहती हैं। कुछ समय पहले ही भारत में डिटर्जेंट निर्माता अपने सर्फ और साबुन के प्रदर्शन को प्रतियोगी कंपनियों से बेहतर साबित करने के लिए फ्री वॉश का आयोजन करते थे।

गुणवत्ता की इसी प्रतियोगिता के संशोधित तत्व हमें वाइन फेस्टिवल्स और फॉर्मूला वन रेस के रूप में देखने को मिलते हैं। केवल यह मायने नहीं रखता है कि उपभोक्ता अपने द्वारा खरीदे जाने वाले सामान के बारे में कितना ज़्यादा जानते हैं, पर यह भी मायने रखता है कि प्रतिस्पर्धी विक्रेता एक-दूसरे की कमतर गुणवत्ता को उजागर करने के लिए तैयार बैठे हैं।

कंपनियों के बीच प्रतिद्वंद्विता उन कई तरीकों में से एक है जिससे बाजार विषम जानकारी की समस्या का समाधान करते हैं। कुछ बाजारों में ऐसी विशेष एजेंसियां खुद उभर कर आती हैं जो कंपनियों द्वारा बेचे जाने वाले उत्पादों की गुणवत्ता को रेट करती हैं। वित्तीय बाजारों में उन्हें रेटिंग एजेंसियों के रूप में जाना जाता है। कुछ बाजारों में ये प्रमाणीकरण फ्रेंचाइज़िंग का भी रूप ले लेता है।

आज की डिजिटल दुनिया में तो इंटरनेट पर ऐसी वेबसाइट्स भी हैं जिनका काम ग्राहकों को किसी प्रोडक्ट या कंपनी से जुडी समीक्षाओं और शिकायतों से अवगत कराना है। गुणवत्ता का पता लगाने के भिन्न-भिन्न तरीकों से हमें ये पता चलता है कि बाजार का जितना मूल्य और मात्रा से लेना-देना है, उतना ही गुणवत्ता और दीर्घकालिक संबंधों से भी है।


वास्तविकता तो यह है कि आईसीएमआर के कड़े नियंत्रण के बिना चिकित्सा परीक्षण के बाजार न केवल काम करेंगे, बल्कि उनके बेहतर काम करने की संभावना है। कोरोनावायरस के केस को लें तो महामारी के शुरुआती चरणों में, आईसीएमआर ने जांच के लिए किसी निजी किट या लैब को अधिकृत नहीं किया और आदेश जारी किया कि केवल अमेरिका के FDA और यूरोपियन संघ के नियामक से अधिकृत किट्स ही उपयोग की जाएंगी।

चूंकि भारत में केवल एक कंपनी के पास ऐसा लाइसेंस था तो इससे पूरा बाजार ही निषिद्ध हो गया, और फिर कीमती समय निकल जाने के बाद आईसीएमआर ने अपने भारत स्थित केंद्रों से जांच कर कुछ किट्स और लैब्स को अनुमति दी। इस आपाधापी में सरकारों ने परीक्षण करने के लिए चीन से काफी निम्न स्तर के रैपिड एंटीबाडी टेस्ट किट्स को आयात किया।

आईसीएमआर के इस कड़े नियंत्रण की अनुपस्थिति में, भारतीय कंपनियों को महामारी के मद्देनजर परीक्षण सुविधाओं का विस्तार करके लाभ कमाने का अवसर मिला होता और सरकारी जांच के लिए भी राज्य सरकारें आसानी से सस्ते दामों पर परीक्षण के लिए किट्स खरीद पातीं। इस प्रकार टेस्ट किट के निर्माता कंपनियों के बीच ऐसी प्रतिस्पर्धा में लागत कम और गुणवत्ता बेहतर होने की भी संभावना रहती।
जैसे एम्बेसडर के बाद के इस युग में कार निर्माताओं के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण कार की कीमतों में गिरावट आई है। इस प्रकार के कड़े अफ़सरशाही से लदे नियम कम लागत वाले संभावित समाधानों को बहुत लंबे समय तक बाजार से बाहर रखने का कार्य करते हैं। बड़े पैमाने पर परीक्षण के लिए यह ज़रूरी है कि कम लागत के साथ बड़े पैमाने पर टेस्ट किट्स का उत्पादन हो पाए।

इस विषय में जर्मनी की सफलता हमें एक सीख देती है। जर्मनी फरवरी के अंत से हर हफ्ते एक लाख और अप्रैल की शुरुआत से करीब हर हफ्ते साढ़े तीन लाख से भी अधिक लोगों का परीक्षण कर रहा है। 20 अप्रैल तक जर्मनी की परीक्षण की दर पच्चीस टेस्ट प्रति हजार व्यक्ति के करीब थी। अगर इसकी तुलना भारत से करें तो हमारे यहाँ यह दर एक टेस्ट प्रति हजार व्यक्ति से भी कम है।

जर्मनी की सफलता का एक कारण भारत की तुलना में चिकित्सा परीक्षण के लिए एक अपेक्षाकृत स्वतंत्र बाजार है। जर्मनी में निजी कंपनियां टेस्टिंग किट्स का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने में सक्षम थीं, क्योंकि वहां आईसीएमआर की भांति किसी केंद्रीय नियामक संस्था का बोझ नहीं है। भारत सरकार ने टेस्टिंग किट्स और उपकरणों की कमी के साथ संघर्ष किया है। लेकिन टेस्टिंग किट्स की कमी कोई अपरिवर्तनीय नहीं है।

टेस्टिंग किट्स कुछ और नहीं बल्कि विभिन्न संस्थागत व्यवस्थाओं के तहत लोगों द्वारा बनाए गए संसाधन हैं। कुछ संस्थागत व्यवस्थाएं हमें अपने साथी मनुष्यों की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं, जबकि कुछ अन्य व्यवस्थाएं ख़राब और घातक व्यवहार उत्पन्न करती हैं।

जर्मनी का अनुभव हमें बताता है कि, पारंपरिक समझ के विपरीत, केंद्रीय निर्देशों पर निर्भर प्रणालियों की तुलना में एक विकेंद्रीकृत प्रणाली महामारी के लिए अधिक प्रभावी ढंग से काम करती है।
कोरोनावायरस की यह महामारी लाइसेंस राज के उस नुकसान को दर्शाती है जिसकी चर्चा हम कदापि ही कभी करते हैं। ऐसी लालफीताशाही तेजी से उभरती नई सामाजिक आवश्यकताओं के लिए बाजार के विकास में बाधा डालती है। सरकारी नियम अक्सर अतीत से संदर्भित होते हैं, थोड़ा-बहुत वर्तमान से भी उनका लेना-देना होता है पर भविष्य से जूझने की क्षमता उनमें बिलकुल नहीं होती। ये नियम अप्रत्याशित परिस्थितियों में सहायक कम और बाधा ज़्यादा होते हैं।

सरकारी नौकरशाहों के विपरीत निजी उद्यमियों के पास ऐसी महामारियों का समाधान निकालने का संभावित लाभ, उनके लिए एक प्रोत्साहन है। बिलकुल उसी प्रकार जैसे हेजफंड, स्टॉक की कीमतों और ऑटोमोबाइल निर्माता, कारों की मांग का अनुमान लगाते हैं। ऐसे अग्रगामी व्यवहार से हमें नए महामारियों से उचित समय-सीमा के भीतर लड़ने में सहायता मिलेगी। अगर हमें सफलतापूर्वक महामारियों से लड़ने की तैयारी करनी है तो नियामक सुधार बेहद ज़रूरी हैं। क्या पता, अगली महामारी हमें कोरोनावायरस जितना समय भी ना दे।

(लेख में व्‍यक्‍त विचार लेखकों के निजी हैं)

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