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एक मुसलमान होने के अलावा भी मैं कुछ हूं, मानवता को इस देश की नागरिकता है या नहीं?

राजस्थान के राजसमंद का वह दारुण वीडियो देखने के बाद हालत कुछ भी लिख पाने की नहीं थी। क्या लिख सकते हैं, जिससे इस घटना की भयावहता ठीक-ठीक अभिव्यक्त हो पाए?

क्या ये धरती पर इंसान और इंसानियत से ज्यादा जरूरत रखते हैं। धर्म-पंथ-मजहब अपनी परिणति में ऐसी दुर्घटनाएं रखते हैं तो इस विश्व को उतना खतरा गोले-बारूद-आतंक-भूख-नरभक्षीपन से नहीं है जितना धर्म से है।

राजस्थान के राजसमंद का वह दारुण वीडियो देखने के बाद हालत कुछ भी लिख पाने की नहीं थी। क्या लिख सकते हैं, जिससे इस घटना की भयावहता ठीक-ठीक अभिव्यक्त हो पाए? ऐसा कौन सा शब्द कहाँ से ढूंढें जो उस निर्दोष की मौत पर रो सकता हो, जो इस ग़लतफ़हमी में था कि इस देश में पंथनिरपेक्ष लोकतंत्र है, जहाँ कानूनी अनुशासन उसके जान-माल की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। वह कौन सा वाक्य होगा जो कलकत्ता से 325 किलोमीटर दूर उसके गाँव में अपने पिता की इस पशुवत मृत्यु पर चीख रही दसवीं की छात्रा के आंसू पोछ सके और ढांढस बंधा सके! मैं तो नहीं ढूंढ पा रहा हूं ये सब। शायद आज लेखन, शब्द और वाक्य सब कुछ उन्माद के एक भयानक थपेड़े से हार ही गए लगते हैं।

क्या है लव जिहाद? क्या ये धरती पर इंसान और इंसानियत से ज्यादा जरूरत रखते हैं। धर्म-पंथ-मजहब अपनी परिणति में ऐसी दुर्घटनाएं रखते हैं तो इस विश्व को उतना खतरा गोले-बारूद-आतंक-भूख-नरभक्षीपन से नहीं है जितना धर्म से है। ये वो हथियार है जो हर घर में विथ लाइसेंस उपलब्ध है। ये भी बारूद का वह ढेर है जिस पर दुनिया के बैठे होने की चिंता विद्वान और तमाम चिंतक, विचारक जता चुके हैं। हमारे देश में आस्थाओं ने राजनीति का दामन थाम लिया है और ऐसे में यह उन दो रसायनों के मिश्रण की तरह लगता है जिनका सम्मिलन एक भयानक ज़हर का अविष्कार होता है। साम्राज्याकांक्षा इंसान से नरभक्षी होने की कीमत मांग रही है और लोग यह कीमत अब दे भी रहे हैं। एक निहत्थे बुज़ुर्ग गरीब मजदूर को हथियार के साथ ऐसे अपराधों को समझाना और उसकी सजा देना जो न तो उसने किया हो और न ऐसा कुछ करने में अपरोक्ष रूप से उसका कोई हाथ हो, ऐसा किस तरह की मानसिकता से किया जा सकता है ये सोच सोचकर माथे की नसें फटने लगी हैं। वीडियो देखकर दिल दहल उठता है, आँखें फटी रह जाती हैं, माथे पर शिकन गहरी होती जाती है। गुस्सा इस स्तर पर होता है कि वह अपराधी सामने पड़ जाए तो उसके साथ भी वही सुलूक करें और अफ़सोस भी न करें, लेकिन इतनी हैवानियत भी तो नही हो सकती न! मैं एक बार ही वह वीडियो देख पाया। दूसरी बार हिम्मत नहीं कर पाया। लेकिन एक बार ही देखकर भीतर से शून्य हो गया। दिन भर मेरे दिमाग में वह चित्र यूं घूमता रहा जैसे कोई बार बार उसे मेरे सामने जबर्दस्ती चला रहा हो। जैसे ये दुर्घटना मेरे साथ हुयी हो।

मैं इस घटना की कल्पना में अफरज़ुल की जगह खुद को रखकर सोच पाने से नहीं रोक पाया। मैंने सोचा कि अगर मोहम्मद अफरज़ुल की जगह मैं किसी के हाथों सबक सिखाने की प्रक्रिया का शिकार हो जाता तो मेरी तड़प क्या होती, मेरी प्रतिक्रिया क्या होती, मेरे परिवार की प्रतिक्रिया क्या होती? मेरे घर, गाँव का माहौल कैसा होता? ऐसा सोचना भर ही था कि मेरी धड़कनें तेज हो गईं और तुरन्त मन में प्रश्नों की बौछार शुरू हो गयी कि मैंने क्या किया था, दोस्त! मुझ पर इतना क्रोध और निरंकुशता क्यों! मेरी जान की कीमत भी समझो! एक मुसलमान होने के अलावा भी मैं कुछ हूँ। मेरा परिवार है। किसी माँ का बेटा हूँ, मेरे बाप हैं, मेरे दोस्त हैं! एक ऐसी गलती के लिए मुझे जान से मार रहे हो जो मैंने की ही नहीं! क्या मेरी जान ले लेने से सबक ठीक तरह से सीख जाएंगे वो लोग, जिन्हें तुम सिखाना चाहते हो? अगर नहीं सीख पाए तो मेरी बलि का क्या होगा? क्या मेरी जान लौटा पाओगे? अगर तुम्हें मुझे मारने के बाद प्रायश्चित का भी मन हुआ तो भी तुम मुझे ज़िंदा नहीं कर पाओगे भाई!

वीडियो में इतनी बातें सुनने का वक़्त ही कहाँ था उस ‘धर्मरक्षक’ के पास! उसे तो अफरज़ुल का वो दर्दनाक निवेदन भी सुनायी नहीं पड़ रहा था जिसमें वो बार बार कह रहा था कि ‘ मैं मर गया, बाबू, बचाओ मुझे।’ अपने हत्यारे से ही रक्षा की गुहार कर रहा था वो। उस समय उसके दिमाग में ज़रूर उसकी तीनों बेटियों के चेहरे घूम रहे होंगे। अपनी पत्नी की संगत का दृश्य उभर रहा होगा। माँ-बाप के बिलखते चेहरे से अपनी कल्पना को कहाँ दूर रख पाया होगा वो। क्या उन्माद इंसान को इतना बुद्धिशून्य बना देता है? राजनीति इस दुर्घटना को बेचने से भी नहीं चूकने वाली है। सोशल मीडिया पर कुछ संवेदनाओं से भिखमंगे लोगों के ओछे सवाल थूकदान बना देने लायक हैं। इस मामले में किसी हिन्दू की प्रतिक्रिया नहीं चाहिए, किसी मुसलमान की प्रतिक्रिया नहीं चाहिए, इस मामले पर किसी ‘इंसान’ से बात करिये कि वह अब क्या चाहता है? कि अब वह क्या करने वाला है?

नयी सरकारों पर दोषारोपण करना इसलिए भी बेकार है क्योंकि इस पाप का बीज-वपन 4 या 5 सालों की करामात नहीं है। यह एक प्राचीन अभियान है जो अब प्रयोगिकता की ओर कदम बढ़ा चुका है। धार्मिक मस्तिष्क राजनैतिक कचरों का वह कूड़ेदान बन गया है जिसमें कुकर्मी-अपराधी अपनी कुप्रवृत्तियों को फेंककर राजनेता बन जाते हैं और जनता आदमखोर होती जाती है। सहिष्णुता-असहिष्णुता अभी तक विमर्श-कौशल की प्रतिस्पर्धा जैसी थीं जो अब मंच से नीचे उतर रही हैं, जमीन पर आ रही हैं, और जैसे जैसे ये विमर्श जमीन पर आ रहा है असहिष्णुता साकार रूप में प्रत्यक्ष हो रही है। इस घटना पर संवेदनाएं रखने वाले लोगों पर पक्षपात का आवरण लगाकर कुछ सवाल जरूर फेंके जाएंगे। उन्हें ऐसे सवालों को इग्नोर करना है जैसे सुना ही न हो। कि अब हमें नए सवाल लाने हैं, कि हमें असल जवाब चाहिए, कि हिन्दू धर्म के तथाकथित ठेकेदारों! बताओ, यही हिंदुत्व है क्या? कि हिंदुस्तान के तथाकथित ‘राष्ट्रभक्तों’ बताओ, हर हिंदुस्तानी का यही कर्तव्य है क्या, जैसा कि वीडियो में वह विक्षिप्त बता रहा है? कि देश के शासकों! बताओ, इस जंग को सरकारी वैधता है? कि देश के कानून-रक्षकों, ये बताओ, मानवता को इस देश की नागरिकता है या नहीं?

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