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ब‍िहार चुनाव पर‍िणाम नहीं है भारतीय राजनीत‍ि में बदलाव का प्रमाण

वास्तव में जो हो रहा है वह कुछ यूं है कि जाति और धार्मिक गठजोड़ (CRA ) कभी-कभी बदल जाते हैं, लेकिन फिर भी चुनाव में प्रासंगिक कारक जाति और धर्म ही हैं, न कि बेरोजगारी, मूल्य वृद्धि, स्वास्थ्य देखभाल की कमी, भ्रष्टाचार, आदि जैसे कि सुधा पाई ने बताया ।

Bihar Election Results, Bihar Election, Bihar Results, BJPBihar Assembly Polls में बहुमत हासिल करने के बाद 11 नवंबर को नई दिल्ली में एक जन सभा के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते पीएम मोदी। (फोटोः PTI)

Bihar Election Results के बाद कई जानकार और व‍िश्‍‍‍‍‍‍‍‍लेषकों का कहना है कि भारतीय राजनीति में अब केवल जातिगत संरक्षण मायने नहीं रखता है, बल्‍कि बरोजगारी, मूल्य वृद्धि आदि कारक भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। लेक‍िन, मेरी राय में ऐसी तमाम राय जमीनी हकीकत से दूर हैं।

भारत अभी भी एक अर्ध सामंती देश है। यहाँ ज्यादातर लोग अभी भी पिछड़ी सामंती मानसिकता के साथ जी रहे हैं, जातिवाद और सांप्रदायिकता से भरे हुए हैं। अधिकांश राज्यों में भारतीय चुनाव अभी भी काफी हद तक जाति और धर्म के आधार पर होते हैं। अधिकांश मतदाता अब भी केवल जाति और धर्म को देखते हैं जब वे वोट देने जाते हैं। गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, उचित स्वास्थ्य देखभाल की कमी और जनता के लिए अच्छी शिक्षा, मूल्य वृद्धि, भ्रष्टाचार, आदि के प्रति पूर्ण तरह से उदासीन होते हैं।

अधिकांश भारतीय चुनावों में जो प्रासंगिक कारक है, उसे जाति धर्म गठबंधन (CRA – Caste Religion Alliance ) कहा जा सकता है। क्योंकि राज्य की आबादी की कोई भी जाति अपने आप में 10-12% से अधिक नहीं है और चुनाव जीतने के लिए 30% से अधिक वोटों की ज़रूरत होती है जो केवल कई जातियों के गठबंधन से प्राप्त हो सकता है जो अक्सर मुसलमानों के साथ मिलकर संभव होता है (भाजपा को छोड़कर , जिसे मुसलमान वोट प्राप्त नहीं होते)।

उदाहरण के लिए 1947 में आज़ादी के बाद उच्च जातियों (कई उत्तर भारतीय राज्यों में लगभग 16-17%), मुसलमानों (यूपी में लगभग 16% और बिहार), अनुसूचित जातियों (लगभग 20%) के CRA पर आश्रित कांग्रेस ने दशकों तक चुनाव जीते। बाद में SCs ने अपनी पार्टी (BSP) बनाई और दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, अधिकांश मुसलमान कांग्रेस छोड़कर यूपी और बिहार में RJD में शामिल हो गए और उच्च जातियां भाजपा में चली गईं। इसलिए कांग्रेस बहुत कम मतों के साथ बची है, जिसके कारण कांग्रेस का बिहार में इस बार खराब प्रदर्शन रहा है।

वास्तव में जो हो रहा है वह कुछ यूं है कि जाति और धार्मिक गठजोड़ (CRA ) कभी-कभी बदल जाते हैं, लेकिन फिर भी चुनाव में प्रासंगिक कारक जाति और धर्म ही हैं। न कि बेरोजगारी, मूल्य वृद्धि, स्वास्थ्य देखभाल की कमी, भ्रष्टाचार, आदि जैसे कि सुधा पाई ने बताया।

बिहार चुनाव में उच्च जाति के हिंदुओं (आबादी का लगभग 16%) ने NDA (जो स्वयं को हिंदुओं का प्रतिनिधि कहते हैं ) को वोट दिया, साथ ही गैर यादव OBC (जो लगभग 40% आबादी का एक बड़ा वर्ग है) इस बात से पीड़ित थे की एक यादव मुख्यमंत्री के तहत केवल यादव जाती ( जो लगभग 12% होते हैं ) वाले अधिकारियों को ही अच्छी जगह तबादला मिलता है बाकियों को नहीं , जबकि अन्य OBC लोगों की अनदेखी होती है)।

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महागठबंधन को 12% यादव वोट मिले, और शायद कुछ अन्य OBC वोट। अगर उन्हें 17% मुस्लिम वोट मिले होते तो वे चुनाव जीत सकते थे, लेकिन ओवैसी के AIMIM ने मुस्लिम वोटों को विभाजित कर दिया (एआईएमआईएम को 5 सीटें मिलीं और अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में सेंध लगाई)।

इसलिए यह विचार ग़लत है कि भारतीय चुनावों में बेरोजगारी और ऐसे अन्य कारक मायने रखते हैं। जब तक भारत अर्ध सामंती देश बना रहेगा तब तक यह स्थिति बनी रहेगी, और बेरोजगारी, मूल्य वृद्धि आदि अप्रासंगिक रहेंगे।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं और यहां व्‍यक्‍त व‍िचार उनके नि‍जी हैं।)

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