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बेबाक बोलः बदलाव का वादा

पिछले पांच सालों में किसान आंदोलन के बाद बने सत्ता विरोधी मंच का फायदा हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में कांग्रेस को मिला। किसी भी तरह के जनांदोलन और क्रांति से दूर रहे कांग्रेस के नेताओं ने पिछले पांच साल में हुए आंदोलनों और उससे उठी मांगों का कोलाज बना क्रांतिकारी घोषणापत्र पेश किया। विधानसभा चुनावों में जनेऊ दिखा मंदिर की परिक्रमा कर रही कांग्रेस आम चुनावों के वक्त न्यूनतम आय योजना के साथ कृषि और आरक्षण के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलावों का वादा कर रही है। मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम जैसे उदारीकरण के योजनाकार आज अपनी ही नाइंसाफियों के खिलाफ ‘न्याय योजना’ की बात कर रहे हैं। कांग्रेस का घोषणापत्र सबसे पहले इस पार्टी की अभी तक की नीतियों के खिलाफ ही खड़ा होता है। सूट-बूट की सरकार और रफाल से छलांग लगा कर ढांचागत बदलाव के वादों का आधार क्या है यही सवाल करता बेबाक बोल।

कांग्रेस का चुनावी घोषणापत्र जारी करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा कि पिछले पांच सालों में नौकरियों में कमी आई और खेती-किसानी का संकट बढ़ा। ये ऐतिहासिक घोषणापत्र देश को और आगे ले जाने का काम करेगा।

‘कांग्रेस ने 1991 में नई औद्योगिक नीति के साथ उदारीकरण की शुरुआत की थी। आज वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए, कांग्रेस एक दूरदर्शी प्रगतिशील औद्योगिक नीति बनाएगी।’ (कांग्रेस घोषणापत्र पृष्ठ संख्या 13)
‘प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि ‘सब कुछ इंतजार कर सकता है कृषि नहीं ’
(कांग्रेस घोषणापत्र पृष्ठ संख्या 17)

हम निभाएंगे’ का घोषणापत्र डॉक्टर मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम के हाथों में था और मीडिया के कैमरे इन्हें एक फ्रेम में कैद कर रहे थे। कांग्रेस का चुनावी घोषणापत्र जारी करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा कि पिछले पांच सालों में नौकरियों में कमी आई और खेती-किसानी का संकट बढ़ा। ये ऐतिहासिक घोषणापत्र देश को और आगे ले जाने का काम करेगा। मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम के हाथों में ‘न्याय योजना’ देखने के साथ यहां एक चेहरे की कमी लग रही थी, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की। आजादी के बाद प्रणब मुखर्जी कांग्रेस का वह चेहरा रहे हैं जिन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को उदारीकरण का अक्षर ज्ञान करवाया था। अर्थव्यवस्था की बात करते वक्त पिछले पांच साल में कांग्रेसी नेताओं के उन दावों का पुनरावलोकन करना होगा जिनमें भाजपा सरकार की हर झंडाबरदार योजना को ‘कांग्रेसी स्कीम’ बता नकल करने की बात होती थी।

इन सबके बीच माकपा के बुजुर्ग नेता अच्युतानंद राहुल गांधी को फिर से ‘अमूल बेबी’ का खिताब दे बैठे। अच्युतानंद का गुस्सा इस बात पर उतरा कि राहुल गांधी ने केरल की वायनाड घाट सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने का पर्चा भरा। यह वह सीट है जहां वाम मोर्चा का मुकाबला भाजपा से है। इसके पहले राहुल गांधी विकल्प-विकल्प का नारा लगा रहे थे। लेकिन सवाल यह भी है कि आप विकल्प निकालेंगे कहां से। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा कांग्रेस के साथ नहीं, बंगाल में तृणमूल खिलाफ और अब कांग्रेस वाम मोर्चे के खिलाफ। नीति वही बनाते हैं जिसकी सरकार होती है। लेकिन कांग्रेस ने विकल्प लागू करने वाली उम्मीदों से इसलिए दूरी बनाई ताकि सीटों की संख्या बढ़े। दिल्ली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अजय माकन चेतावनी दे चुके हैं कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस अलग-अलग लड़े तो सातों सीटें भाजपा की झोली में जा सकती हैं। इसके बावजूद राहुल गांधी ने दिल्ली में अब तक आम आदमी पार्टी से दूरी बना रखी है। मायावती से लेकर ममता बनर्जी तक जो पक्के सहयोगी बन सकते थे, उनके साथ विकल्प छोड़ अपनी सीटों की संख्या बढ़ाने की महत्वाकांक्षा ही दिखाई। कांग्रेस की इसी समझ को अच्युतानंद बचकाना राजनीतिक फैसला कह रहे हैं। कांग्रेस को भाजपा से मुकाबला करना है तो उसे उसी की पिच से नहीं हरा सकती है, बल्कि अपना एक वैकल्पिक पिच बनाना ही होगा।

पिछले पांच सालों में किसान आंदोलन के जरिए वैकल्पिक मैदान बन गया था। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के चुनाव में भोलेनाथ, जनेऊ, गौशाला और मंदिर के खेल में जुटी कांग्रेस को उस आंदोलन का फायदा मिला, जिसके असंतोष की फसल के बीज उसी की नीतियों के कारण बोए गए थे। बिना किसी तरह के आंदोलन का हिस्सा बने कांग्रेस को तीन राज्यों में सफलता मिली। लेकिन आज जब राष्टÑीय स्तर पर चुनाव है तो विकल्प से मुंह मोड़ कर कांग्रेस वैकल्पिक नीति वाला घोषणापत्र पेश कर रही है।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में किसान बजट की बात की है। किसानों के ‘न्याय’ की मांग तो सदियों पुरानी है लेकिन कांग्रेस से मोहभंग के समय में बात भट्टा-पारसौल से उठी थी। प्रणब मुखर्जी, मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम वाली अर्थव्यवस्था में उदारीकरण के राजमार्ग पर किसानों के लिए एक भी पगडंडी नहीं बनाई गई थी। आज जिन दो घरानों पर कांग्रेस अध्यक्ष वार कर रहे हैं वे पिछले पांच साल में नहीं खड़े हुए हैं। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू कह रहे थे कि कृषि इंतजार नहीं कर सकती। लेकिन कांग्रेस ने सत्ता से पूरी तरह उखड़ने तक कृषि को इंतजार करवाया। जब कृषि और आर्थिक क्षेत्र से उपजे असंतोष ने सत्ता से उखाड़ फेंका, तो आज जवाहरलाल नेहरु के उद्धरण की याद आ रही है।

लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस ने जितने चुनाव लड़े वे भाजपा की आलोचना पर केंद्रित थे। नोटबंदी और जीएसटी को गलत बताते हुए या यह हमारी योजना थी का राग अलापते हुए भाजपा को घेरा गया। लेकिन आगामी आम चुनावों में कांग्रेस ने वैकल्पिक नीति को केंद्र बनाया है। न्यूनतम आय से लेकर किसानी तक के मुद्दों पर विकल्प का नारा दिया है। इस बार सिर्फ भाजपा की आलोचना नहीं है बल्कि अपनी अलग राह का भी वादा किया है।
विधानसभा चुनावों तक तो कांग्रेस सिर्फ सूट-बूट जैसे नारे ही लगा पाई थी। उसके बाद रफाल पर एक कदम आगे बढ़ी लेकिन उसे जनता का मुद्दा नहीं बना पाई। सूट-बूट और रफाल के बाद अचानक सालाना 72 हजार की छलांग लगा दी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि एक नारे से दूसरे नारे तक पहुंचने के लिए पार्टी ने रास्ता क्या अपनाया। क्या आप इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच बहस कर पाए थे। अगर कांग्रेस का घोषणापत्र सोची-समझी रणनीति और बहस के बाद आता तो एक उम्मीद बंध सकती थी।

जिस तरह से ऐन चुनाव के मौके पर यह गरीबी हटाओ द्वितीय यानी की अबकी बार 72 हजार आता है उससे पहला सवाल तो यही उठता है कि इस बार भी गरीबी ही क्यों? जिस तरह तुरत-फुरत में कांग्रेस का क्रांतिकारी घोषणापत्र आया है उससे जनता एक बार तो सवाल कर ही ले कि इस वादे को पूरा करने के लिए संसाधन कहां से आएंगे। नारे और वादे जब तक एकतरफा रहेंगे तब तक पूरे नहीं होंगे।
अब वक्त आ गया है कि नारों और वादों को दोतरफा बनाकर जनता पिछले ‘गरीबी हटाओ’ का हिसाब मांग ले। यह अच्छी तरह जान ले कि निभाने की नीयत भी है। हम यह नहीं कहते कि आप गरीबी नहीं हटा पाए तो न्यूनतम आय योजना की बात नहीं करें। लेकिन यह भी बताना होगा कि विधानसभा से निकलते ही आम चुनावों में घुसते ही नीतिगत परिवर्तन कैसे हो गया।

पिछले विधानसभा चुनावों में प्रेस कांफ्रेंस में हाथ में गंगा-जल लेकर कसमें खा रहे कांग्रेसी नेता उन वादों पर मुखर ही नहीं हो पा रहे हैं जो अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को लेकर किए गए हैं। पिछले पांच सालों में केंद्र सरकार के खिलाफ असंतोष के जो भी सुर उभरे उन सभी का कोलाज बना कर कांग्रेस ने अपना घोषणापत्र तैयार कर लिया है। पर जनता कैसे भरोसा करे कि विधानसभा चुनावों में ब्राह्मण का परिचय-पत्र दिखा सवर्ण मतदाताओं को खुश कर रहे लोग आरक्षण के क्षेत्र में किए क्रांतिकारी वादे पूरे कर देंगे।

कांग्रेस का घोषणापत्र पढ़ने लायक और सहेजने लायक है। इसे पढ़ने के बाद कांग्रेस पार्टी से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि पिछले पांच सालों में इन मुद्दों पर उसका क्या रवैया रहा है, इन्हें लेकर वह जनता से कितना जुड़ी, उसकी जमीनी मेहनत क्या रही। इस घोषणापत्र के जरिए कांग्रेस ने खुद के खिलाफ जंग का एलान किया है। परीक्षा के ऐन पहले पाठ्यक्रम बदल कर राहुल गांधी ने छवि-बोध वाली बढ़त तो ली है। लेकिन इस छवि के पाठ से आगे टकराना भी उनको ही है।

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