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बेबाक बोलः आप को श्रद्धांजलि

दिल्ली में अभी सबसे पहली जरूरत शांति और सौहार्द की है। और उसके लिए जो बन पड़े हम सबको करना है। कौन जिम्मेदार है, किसकी खता है, कहां चूक हुई यह सब दर्ज करने के लिए इतिहास के पास ढेर सारा समय, पन्ना और कई रंगों की स्याही होगी। लेकिन वर्तमान में पहली जरूरत यही कि एक-दूसरे की आलोचना के औजार छोड़ उम्मीदों का मरहम उठाएं।

राजघाट के बजाए केजरीवाल बस्तियों में जाते तो अपनी पार्टी के पार्षद का घर भी देखते और उन्हें पार्टी से निलंबित करने का कदम नहीं उठाते।

दंगे के माहौल में शांति बहाली की जो सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रिया होनी चाहिए थी दिल्ली को वह नहीं मिली। जब लोगों की जान जा रही थी तब आम आदमी पार्टी के विधायक भगवान हनुमान के नाम पर शपथ ले रहे थे। प्रचंड बहुमत लाने वाली पार्टी के अगुआ जलती और मदद की गुहार लगाती बस्तियों को छोड़ राजघाट पर जाकर मौन हो गए। गांधी की समाधि चीख सकती तो कहती कि वे राजघाट नहीं नोआखली हैं। ‘आप’ के 62 विधायक जनता के भरोसे की दीवार बन जाते तो आज यह नौबत नहीं आती। राजघाट के बजाए केजरीवाल बस्तियों में जाते तो अपनी पार्टी के पार्षद का घर भी देखते और उन्हें पार्टी से निलंबित करने का कदम नहीं उठाते। कांग्रेस जैसी धर्मनिरपेक्षता की राजनीति के खत्म होते इस दौर में आम आदमी पार्टी जब सांप्रदायिक वोट बैंक के सामने आत्मसमर्पण करती है तो फिर विकल्प के मैदान में उसे श्रद्धांजलि ही दी जा सकती है। दिल्ली में इंसानियत की वापसी कैसे हो इस पर बात करता बेबाक बोल।

दिल्ली में अभी सबसे पहली जरूरत शांति और सौहार्द की है। और उसके लिए जो बन पड़े हम सबको करना है। कौन जिम्मेदार है, किसकी खता है, कहां चूक हुई यह सब दर्ज करने के लिए इतिहास के पास ढेर सारा समय, पन्ना और कई रंगों की स्याही होगी। लेकिन वर्तमान में पहली जरूरत यही कि एक-दूसरे की आलोचना के औजार छोड़ उम्मीदों का मरहम उठाएं। अभी संवाद के हर मंच को भी कलम तोड़ नहीं दिलों को जोड़ने वाले शब्दों की जरूरत है। इंसानों का इतना खून न बह जाए कि इंसानियत की वापसी मुश्किल हो जाए।
ये जिम्मेदार, वो जिम्मेदार। मेरे पास यह वीडियो, उसके पास यह, उसने ऐसा किया तब वह उकसाया गया, तुमने इसका नाम लिया तो उसका क्यों नहीं लिया, यह वीडियो सही तो वह वाला गलत। फिलहाल इस बहस में न पड़ कर एक-दूसरे के प्रति डर और नफरत को कैसे कम किया जाए, इस पर बात हो। पूरी तरह शांति बहाली के बाद ही किसी और तरह की बहस का रास्ता तैयार होगा।

शांति बहाली की प्रक्रिया दो तरह से हो सकती है जिसकी देर से शुरुआत हुई है। पुलिस और प्रशासन की मुस्तैदी ही हालात पर काबू पा सकती है। खास कर जब पुलिसवाले भी शहीद हो गए हैं तो भयावह स्थिति को समझा जा सकता है। पुलिस और नागरिक के बीच टकराव खत्म हो, भरोसे का भाव जगे। पुलिस और नागरिकों के बीच सामंजस्य टूटने के बाद ही दंगे जैसे हालात पैदा होते हैं। शांति बहाली की पहली कड़ी यही है कि पुलिस पूरी मुस्तैदी के साथ नागरिकों के पक्ष में खड़ी दिखे।

दूसरी प्रक्रिया है नागरिक समाज के अगुआ अपनी भूमिका समझें। भरोसे का जो ताना-बाना टूटा है उसे फिर से जोड़ने में इस तबके की अहमियत है। हिंसक माहौल में आमने-सामने संवाद से कारगर कुछ नहीं होता है। जनता के टूटे दिलों को जोड़ने के लिए जितनी तरह की अपील हो की जाए। गणमान्य लोग आम जन तक पहुंचें और उनके कंधों पर प्यार से हाथ रखें। जिनके अपनों का खून बहा है, गृहस्थी उजड़ गई है उनके साथ वक्त बिताएं। दुख और क्षोभ के समय में सामूहिकता से बड़ा कोई समाधान नहीं होता है।

पिछले एक हफ्ते में दिल्ली ने इसी राजनीतिक और सामाजिक प्रक्रिया का घोर अभाव देखा। ‘इंसान का इंसान से हो भाईचारा’ के हस्ताक्षर गीत वाली आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता जलती हुई दिल्ली में अचानक कहां गायब हो गए? पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री निकले भी तो जिंदा रो रहे लोगों के बीच नहीं महात्मा गांधी की समाधि पर। समाधि पर लिखा ‘हे राम’ का मतलब वो समझते तो शायद हिंसा की चीख से गूंजती बस्ती में पहुंचते न कि शांत और सुरक्षित राजघाट पर। भारत में हर दिन गांधी के सिद्धांतों की हत्या होती है और उस दिन केजरीवाल ने एक बार फिर गांधीपथ पर अवसरवादिता की कालीन बिछा दी थी।

अगर गांधी की समाधि चीख सकती तो कहती कि मुख्यमंत्री जी, दंगों के समय में मैं निहत्था, नंगे पांव नोआखली में था। आपको खजूरी खास या करावल नगर में होना चाहिए था। अगर आपके 62 विधायक अपने-अपने क्षेत्र में अपने लोगों के लिए खड़े हो जाते तो आज दिल्ली की तस्वीर कुछ और होती और यहां मेरी समाधि पर एक बार और मेरे मूल्यों की हत्या नहीं हो रही होती। अगर आप समय पर जनता के बीच पहुंचते तो अपने पार्षद के घर भी जाते और नौबत यहां तक नहीं आती। आम आदमी पार्टी की सरकार ने उस जनता के घरों को जलने के लिए छोड़ दिया जो कुछ समय पहले ही उसे वोट देने के लिए घरों से निकली थी।

कल तक केजरीवाल के बगलगीर जब पुलिस को इंसाफ का अल्टीमेटम दे रहे थे तो क्या मुख्यमंत्री को उस आदमी के आधार का पता नहीं था। क्या उन्हें पता नहीं था कि आम आदमी पार्टी वाली भारत माता की जय के समय इस व्यक्ति का राजनीतिक और सामाजिक औजार क्या था। चुनाव हारने के बाद वह अपनी राजनीति को चमकाने के लिए क्या करेगा। केजरीवाल साहब से बेहतर यह बात और कौन जान सकता है कि कपिल मिश्रा अपनी राजनीति के लिए कौन सा कदम उठा सकते हैं क्योंकि एक समय फायदा भी उन्होंने ही उठाया था। ताहिर हुसैन की बुनियाद के बारे में क्या आपको जानकारी नहीं थी? मिश्रा और हुसैन जिस सांप्रदायिक औजार का इस्तेमाल करते हैं क्या उसे पैना होते आपने नहीं देखा था।
आम आदमी पार्टी जिस संजीदगी से राजनीति में आई थी उससे वह पूरी तरह मुंह फेर चुकी है।

विधानसभा चुनाव में उसने अर्द्ध-सांप्रदायिकता को जो नमन किया था चुनावों के बाद उसके सामने जय हनुमान के नारे के साथ नतमस्तक हो गई। जब दिल्ली को नफरत की आग से जलाया जा रहा था तो विधानसभा में आम आदमी पार्टी के कुछ नेता संविधान नहीं, भगवान हनुमान के नाम पर शपथ ले रहे थे। मुफ्त बिजली-पानी वाले दिल्लीवालों को सांप्रदायिकता से सुरक्षा के लिए क्या कीमत अदा करनी होगी इसका कोई जिक्र तो चुनावी वादे में किया नहीं गया था तो सदन में इस पर चिंता जताने की क्या जरूरत थी। विकल्प के नाम पर आई आम आदमी पार्टी पूरी तरह चुनाव जीतने के कारखाने में बदल गई है। वोटों के कारखाने में सांप्रदायिकता के र्इंधन का इस्तेमाल करने में अनुभवी हो चुकी है। पीड़ित के पक्ष में बोल कर वह कारखाने से वोटों के उत्पादन को कम करना नहीं चाहती है।

दंगों के खिलाफ और पीड़ित के पक्ष में सही राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल सिर्फ कांग्रेस ने किया, लेकिन वह भी लोगों की मरहम-पट्टी करने में नाकाम रही। जब दिल्ली जल रही थी तो महसूस हुआ कि कांग्रेस वाली राजनीति जिसे तुष्टीकरण का नाम दे दिया गया था उसके लिए अब कोई जगह नहीं बची है। कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता को तुष्टीकरण का नाम दे उसकी नकारात्मक राजनीतिक ब्रांडिंग कर दी गई थी। कांग्रेस जैसी आवाज कि सांप्रदायिकता के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा खत्म होती जा रही है। यह खुद कांग्रेस के अंदर भी खत्म हो रही है क्योंकि उसे लगता है कि वह इसी पक्षधरता की शिकार हुई है।

दंगों पर आम आदमी पार्टी की चुप्पी ने साबित कर दिया कि सांप्रदायिकता के साथ समझौता नहीं वाली राजनीति का दौर खत्म हो चुका है। आम आदमी पार्टी के लिए भी सबसे बड़ा मूल्य अवसरवादिता ही है। केजरीवाल साहब भी बजरंग बली के जयकारों के बीच संविधान के धर्मनिरपेक्षता वाले हिस्से को दबा ही देना चाहते हैं। धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता की पहचान पर हमला होने के बाद कांग्रेस अपनी इस विरासत पर टिकी नहीं रह सकी। इस मोर्चे पर कांग्रेस को कमजोर कर ही भाजपा का उभार हुआ था और आम आदमी पार्टी भी ‘कांग्रेस होने’ से बचना चाह रही है। वह जान चुकी है कि सिर्फ ईमानदारी के भरोसे कांग्रेस की पूरी जमीन पर काबिज नहीं हुआ जा सकता है, थोड़ी भाजपा भी बनना होगा। फिलहाल तो वह राजघाट पर अवसरवादिता को लेकर अपने प्रयोग को ही सफल मान रही है।

दिल्ली के लोगों ने एक बार और यह अनुभव कर लिया है कि सांप्रदायिकता इंसानियत की सबसे बड़ी दुश्मन है। और आम आदमी पार्टी इसी तरह अवसरवादी राजनीति करती रहेगी तो जनता का आजमाया हुआ प्रयोग है कि उसकी भी जरूरत ज्यादा दिनों तक नहीं रहेगी। दिल्ली के जलने के बाद आज पूरे देश को इस बात की चिंता हो रही है कि हमें धर्मनिरपेक्षता की जरूरत है भी या नहीं। इतनी विविधता वाले देश में जहां इतने धार्मिक पहचान हैं उसमें सांप्रदायिकता के खिलाफ मूल्यों की रक्षा नहीं होगी तो इस देश का क्या स्वरूप होगा यह चिंता उभर कर सामने आई है। भारत की बात होगी तो उसमें गांधी होंगे और उसमें होगी कमजोर के पक्ष में खड़ी होने वाली राजनीति। केजरीवाल साहब, गांधी राजघाट नहीं नोआखली हैं। एक बार फिर से इस स्तंभ में अपनी बात दुहराता हूं कि इस देश को कई नोआखली मिले लेकिन दूसरे गांधी नहीं मिले। गांधी की समाधि पर गांधीवाद की हत्या करने वाली आम आदमी पार्टी को श्रद्धांजलि। जनता के कारखाने से जनता के लिए वाला विकल्प कब निकल जाता है यह तो वक्त ही बताता है।

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