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बेबाक बोलः कुटुंब कलह, परिवार आर-पार

सार्वजनिक मंचों पर कान खींचने वाले हाई कमान पिता के फैसलों के खिलाफ मुख्यमंत्री बेटे ने बगावत की।

सार्वजनिक मंचों पर कान खींचने वाले हाई कमान पिता के फैसलों के खिलाफ मुख्यमंत्री बेटे ने बगावत की। चाचा शिवपाल सिंह यादव के फैसलों को पलटा तो चाचा ने प्रदेश अध्यक्ष पद और मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे डाला जिसे नामंजूर होना ही था। और पारिवारिक महाभारत के अंत में ‘नेताजी’ ने आकर अखिलेश मंत्रिमंडल से गायत्री प्रजापित को बर्खास्त करने की कार्रवाई रद्द करने का एलान किया। कुटुंब की कलह का ठीकरा ‘बाहरी’ पर फोड़ अखिलेश ने कहा कि हम एक हैं। उत्तर प्रदेश में अभी तक ‘शक्तिमान’ मुलायम सिंह यादव के परिवार में खींचतान कोई नई बात नहीं। लेकिन इस बार जो हुआ, उसके मायने अलग हैं। यों यादव परिवार को प्रदेश में भाई-भतीजावाद के संवाहक तौर पर ही देखा जाता है और अब यह चर्चा शायद पुरानी पड़ती जा रही है कि परिवार की विरासत के सिरे से राजनीति हो या न हो। इसकी मुख्य वजह यह है कि एक के बाद एक लगभग सभी राष्टÑीय और राज्यस्तरीय राजनीतिज्ञों ने अपने भाई-भतीजे या किसी नजदीकी संबंधी तक को राजनीति के अखाड़े में उतार दिया है और अब किसी को उस ‘परिवारवाद’ से समस्या नहीं रह गई लगती है, जो कभी भारतीय राजनीति में एक मुद्दा हुआ करता था।

यहां तक कि कभी इस पारिवारिक विरासत की राजनीति के खिलाफ बढ़-चढ़ कर बोलने वाली भारतीय जनता पार्टी में भी अब ऐसे नेताओं की भरमार है। इसलिए अब वह इस मसले पर बहुत तल्ख रुख अख्तियार करने की हालत में नहीं रह गई है। हरियाणा के पिछले विधानसभा चुनाव में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपनी बहन को टिकट दिलवाया तो हिमाचल प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर हमीरपुर से सांसद हैं। ये सिर्फ चंद उदाहरण हैं। ऐसे नामों की एक लंबी फेहरिस्त भाजपा में भी है।
लगभग सभी दलों के इस ‘रोग’ से संक्रमित हो जाने के बाद राजनीतिक दलों में भाई-भतीजे, चाचा, ताऊ, बेटी, बहू का मुद्दा अब पुराना पड़ा चुका है। हालत यह है कि अब इन तमाम दलों में लोकतंत्र की मांग भी शायद ही कभी उठती देखी जाती है। हां, इसमें एक नई प्रवृत्ति यह दिख रही है कि उनके बीच आपसी संघर्ष के कारण कई बार एक ही परिवार की राजनीति में लगे लोग एक-दूसरे के ही मुखालिफ खड़े नजर आते हैं। फिलहाल इसे उत्तर प्रदेश में चुनावी बिसात बिछ जाने के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन कायदे से देखें तो देश भर में जो राजनीतिक हालात पिछले कुछ समय के भीतर बने हैं, उसमें भाजपा का इस बार सब कुछ दांव पर है।

हालांकि, दिल्ली और बिहार की शर्मनाक हार के बाद भाजपा को असम के नतीजों के जरिए थोड़ी राहत जरूर मिली थी, लेकिन यह राहत राष्टÑीय राजनीति में भाजपा को अपने सामने खड़ी हुई या होने वाली चुनौतियों का सामना करने में शायद ही कोई मदद करे। यह इसलिए भी कि पार्टी का वास्तविक भला या बुरा 2017 में होने वाले उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनावों में होना है। लेकिन उप्र में सत्ताधारी सपा के विरोधियों का हमला फिलहाल दो ही मामलों पर केंद्रित है। सपा को नुकसान पहुंचाने के लिए या तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की अपरिपक्वता का हवाला देना और प्रदेश में कई सत्ता-केंद्रों का होना। अखिलेश को बार-बार यह सुनना पड़ता है कि प्रदेश में ‘साढ़े चार मुख्यमंत्री’ हैं। दिलचस्प यह भी है कि इन ‘साढ़े चार’ में जिनकी गिनती ‘आधे’ के तौर पर होती है वे खुद अखिलेश ही हैं। जिन चार की गिनती ‘पूरे मुख्यमंत्री’ के तौर पर होती है उनमें मुलायम सिंह यादव, उनके भाई रामगोपाल यादव, शिवपाल यादव और अति विश्वासपात्र आजम खान शामिल हैं।

सपा के अंदर कई फाड़ हैं और इसे बयान करने के लिए इससे ज्यादा बड़ा कोई और उदाहरण क्या होगा कि उसका शासक परिवार भी अब एकजुट नहीं रह गया है। जिस पार्टी पर नियंत्रण रखने वाला परिवार ही एकमत नहीं हो, उसके एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर संगठित होने पर किसे विश्वास होगा! विडंबना है कि राजनीतिक मुद्दों के बजाय सपा आजकल विश्वसनीयता के इस संकट से दो-चार है। चर्चा और संशय के बीच टकराव के ताजा मुद्दे एक नहीं, बल्कि दो हैं। यह माना जा रहा है कि मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल को अखिलेश यादव की मर्जी के खिलाफ सपा में शामिल किया गया था और इसके पीछे चाचा शिवपाल यादव खड़े थे। मुख्तार अंसारी विभिन्न अपराधों के आरोप में जेल में हैं। राज्य की राजनीति में अखिलेश अपराध के खिलाफ खड़े जिस व्यक्ति और नेता की छवि के साथ उभरे थे, उसमें यह कवायद उनके खिलाफ जाती थी। ऐसे में अखिलेश की इस विलय पर तड़प वाजिब थी। लेकिन चाचा शिवपाल का कहना था कि जो हुआ उस पर ‘नेताजी’ की मुहर थी। इसके बाद राजनीतिक सीमाओं और बाध्यताओं का बस अंदाजा भर लगाया जा सकता है।
लेकिन पहले भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे और सीबीआइ जांच के कसते शिकंजे के बीच पंचायती राज मंत्री राजकिशोर सिंह और खनन मंत्री गायत्री प्रजापति को बर्खास्त करने और फिर मुख्य सचिव को हटाने का फैसला करके अखिलेश ने अपनी मौजूदगी और राजनीतिक हैसियत का अहसास कराने की कोशिश भर की। हालांकि इस रास्ते पार्टी और परिवार के भीतर चल रही खींचतान सार्वजनिक मंच पर आ गई। विपक्षी दलों का यह भी मानना है कि यह टकराव दरअसल ‘मैच फिक्सिंग’ की तरह है, जिसमें सत्ता की कमजोरियों की ओर से जनता का ध्यान बंटाने की कोशिश हो रही है। इस कार्यकाल के दौरान अखिलेश यादव की सरकार पर प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक घालमेल के जिस तरह के आरोप लगे हैं, उसे देखते हुए ये आरोप बेबुनियाद भी नहीं हैं।

बहरहाल, मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के विलय के सवाल पर अखिलेश के सख्त रुख अख्तियार कर लेने के बाद आखिर वह विलय रद्द किया गया। तभी से चाचा शिवपाल खुद को उपेक्षित पा रहे थे। यह स्वाभाविक भी था। राज्य में एक अहम सत्ता केंद्र होने के बावजूद आखिर इसी वजह से उन्हें सार्वजनिक रूप से शर्मिंदगी झेलनी पड़ी।
दूसरी ओर, एक पूर्व भाजपा विधायक की हत्या के आरोप में जेल में बंद बाहुबली मुख्तार अंसारी का भी आहत होना लाजिमी था। आखिर तीन अंसारी बंधुओं की फजीहत सरेआम हुई। ऐसा माना जा रहा है कि इसका बदला लिया जाएगा, वह भी आने वाले चुनाव में ही। जाहिर है, पहले ही राजनीतिक तौर पर कमजोर पड़ते जा रहे अखिलेश के लिए मुख्तार अंसारी का यह रुख सिरदर्द बढ़ाने वाला ही साबित हो सकता है। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि अगर कौमी एकता दल का सपा में विलय रद्द नहीं होता, अगर अखिलेश ने इस विलय को अंजाम देने वाले मंत्री बलराम यादव को अपने मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता नहीं दिखाया होता तो अखिलेश की छवि के लिए यह घातक होता। विवाद बढ़ता देख पिता ने तो पुत्र के साथ बीच का रास्ता निकाल कर बलराम यादव को मंत्रिपद पर फिर से बहाल करवा दिया, लेकिन चाचा शिवपाल को गहरी राजनीतिक और निजी चोट देकर आपसी दुर्भाव को और हवा दे दी। अब यह तय माना जा रहा है कि चाचा-भतीजा के बीच बढ़ती यह दूरी निश्चित रूप से चुनाव तक कोई गुल खिलाएगी।

दरअसल, मुलायम सिंह के पुत्र के सक्रिय राजनीति में आने के बाद उनके भाई का कम होता प्रभाव परिवार के वरिष्ठजनों के गले नहीं उतर रहा। पहले यही माना जा रहा था कि मुलायम ने अपने अड़तीस वर्षीय पुत्र को प्रदेश की कमान तो दे दी है, पर असल सरकार वे ही चलाएंगे। लेकिन धीरे-धीरे अखिलेश ने अपना प्रभाव बढ़ाते हुए अपने स्तर पर फैसले करने शुरू किए और पार्टी में भी अपना रुतबा बढ़ाना शुरू किया। यह बात परिवार के बड़ों को नागवार गुजरी है, लेकिन इस पर आक्रोश अभी फूटा नहीं है। यह देखना होगा कि मुलायम सिंह के शांति के एलान के बाद यह स्थिति चुनाव तक बनी रहती है या नहीं। आज्ञाकारी बेटे का खुदमुख्तार हो जाना शायद ही पिता को ज्यादा दिन रास आए, जो अभी सक्रिय राजनीति में हैं और गाहे-बगाहे देश के प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब भी पाल लेते हैं। खासतौर पर तब जबकि उसके कारण सपा के चुनावी गणित पर कोई असर पड़ता हो। खास बात यह भी है कि भाई शिवपाल ने अपनी राजनीतिक हैसियत बचाने की गरज से या फिर किसी भी वजह से एक बार फिर ‘नेताजी’ के फैसले में आस्था जताई है। लेकिन पहले भी वे हमेशा ही मुलायम के अंग-संग रहे हैं और पार्टी के कई अहम फैसले अपने स्तर पर लेने के लिए अधिकृत थे। अखिलेश के राजनीतिक पटल पर सशक्त तरीके से आने के बाद उनकी स्थिति कमजोर पड़ गई। अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव को लोकसभा टिकट देने के बाद तो अखिलेश और मुलायम परिवार और भी मजबूत हो गया।

इधर, छह साल के निष्कासन के बाद अमर सिंह की ‘घर वापसी’ पर उभरा परिवारिवाक मतभेद सुर्खियों में है। अमर सिंह की ‘फिक्सर’ वाली छवि के कारण अखिलेश के इस मामले में रजामंदी पर सबको संदेह है। यह माना जा रहा है कि इस वापसी पर उनकी सहमति नहीं थी। इस मामले में भी खास बात यही है कि अमर सिंह असल में शिवपाल यादव के ही ज्यादा नजदीकी हैं और उनके पार्टी में लौटने के पीछे भी उन्हीं की जोरदार पैरोकारी रही। इन सबके बावजूद सच यह है कि पार्टी में मुलायम का रुतबा आज भी इतना बुलंद है कि उस पर कोई सवाल नहीं उठाए जाते। लेकिन यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि अमर सिंह का पार्टी में आना कमजोर पड़ते शिवपाल को ताकत देगा। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अखिलेश ने जब अमर सिंह के पार्टी में आने पर परोक्ष रूप से विरोध जताया तो उस पर किसी ने कान तक नहीं दिया। अमर सिंह के खिलाफ तर्क यही था कि आखिर इससे पार्टी को जनमानस के स्तर पर क्या फायदा होगा। हालांकि यह दीगर है कि यह फायदा पार्टी के बड़ों को ही बेहतर मालूम है।

समाजवादी पार्टी को नियंत्रित करने वाले परिवार में इससे पहले जो विवाद होते रहे हैं, उन्हें छोड़ भी दें तो इस बार सतह पर निकल आए टकराव चुनाव के मौके पर सपा के लिए घातक साबित हो सकते हैं। इससे पहले पिता-पुत्र के भी आपस में विवाद हुए हैं, लेकिन तब सरकार नई थी और उसके पास पांच वर्ष थे। और तब इस तरह के विवादों को आपसी समझदारी के साथ राजनीति करने के तौर पर भी देखा गया था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। चुनाव में महज एक वर्ष है। पांच साल तक चली सरकार के खिलाफ रोष की संभावना रहती है। भारतीय जनता पार्टी असम से उत्साहित होकर मैदान में है, जबकि कांग्रेस भी अपने नए रणनीतिकार प्रशांत किशोर के सहारे सपा को ललकारने के लिए तैयार है। और बसपा भी मुख्य चुनौती की शक्ल में सामने है। ऐसे में अखिलेश के लिए प्रदेश में कोई उत्साहवर्धक हालात नहीं हैं।
अखिलेश ने तो कुटुंब की इस कलह का ठीकरा ‘बाहरी’ पर फोड़ दिया है। लेकिन शुक्रवार को लखनऊ में सपा मुख्यालय के बाहर पार्टी जिस तरह बंटी हुई नजर आई उसे राजनीति के शब्दकोश में लोकतंत्र का नाम दिया जाता है। पार्टी मुख्यालय के बाहर अखिलेश और शिवपाल समर्थकों के नारों में अलग-अलग नामों की जयकार थी। इन अलग-अलग फूटे बोलों को विधानसभा चुनाव तक एक सुर में लाना फिलहाल समाजवादी परिवार के मुखिया की सबसे बड़ी चुनौती होगी।

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