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बेबाक बोलः जंग के पार- युद्ध और शांति

उड़ी पर आतंकी हमले के बाद सीनाजोरी दिखाते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने संयुक्त राष्टÑ के मंच पर कश्मीर के स्वयंभू आतंकवादी कमांडर को स्वतंत्रता सेनानी बता कर वहां के आतंकी संघर्ष को फिलस्तिनियों के संघर्ष की बराबरी पर ला खड़ा करने की कोशिश की। पाक की सभी तरह की सीमा पार कर लेने के बाद आखिर मोदी सरकार ने इस बार सीमा पार जाकर करारा जवाब दे ही दिया। पाक आतंकी ठिकानों पर भारत के लक्षित सैन्य हमले के बाद मोदी ने वह किया जो 2001 में संसद पर आतंकवादी हमले के बाद मांग की जा रही थी। सरहद से लेकर घरेलू मोर्चों पर युद्धरत भाजपा के लिए क्या यह हमला थोड़ी शांति लेकर आएगा यही बताने की कोशिश करता इस बार का बेबाक बोल।
उरी में तैनात भारतीय सेना का जवान। (Photo- PTI/File)

सिंधु जल संधि पर कड़ा रुख और उसके बाद दक्षेस सम्मेलन का बहिष्कार कर पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर अलग-थलग किया। इसके साथ ही सीमा पार जाकर मौजूद आतंकवादी ठिकानों पर लक्षित सैन्य हमला। भारत यह भी इरादा जता चुका है कि वह पाकिस्तान को दिया चहेते देश का तमगा भी छीनेगा। भारत के लक्षित सैन्य हमले के बाद अमेरिका के शीर्ष थिंक टैंक कार्नेगी एनडाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के एश्ले टेलिस ने कहा, ‘भारत की यह प्रतिक्रिया आनी ही थी। यह पाकिस्तान के लिए एक संकेत है और भारत के लोगों के लिए एक आश्वासन। मोदी उड़ी हमले को लेकर पैदा हुए गुस्से को अनुत्तरित नहीं रहने दे सकते’। पाकिस्तान के नापाक इरादों से मची अशांति को शांत करने के लिए यह हल्का हमला जायज था। सिंधु नदी के किनारे जब सबसे पुरातन हड़प्पा सभ्यता विकसित हो रही थी तब न भारत था, न पाकिस्तान। पर आज एक ही सभ्यता की पैदाइश ये दोनों देश आमने-सामने हैं अलग-अलग लक्ष्यों के साथ। ऐसा नहीं कि यह पहली बार था कि सिंधु नदी के जल को अविरल पाकिस्तान की ओर प्रवाहित होने से रोक कर पाकिस्तान को गैरयुद्धीय तरीके से सबक सिखाने की मांग हुई हो। वैश्विक मंचों पर भारत के नेता आतंकवाद के खिलाफ लगातार आवाज उठा रहे थे। लेकिन सैन्य और देशवासियों का मनोबल बनाए रखने के लिए सरहद पर भी वाजिब कदम उठाना जरूरी था जो मोदी सरकार ने संतुलित तरीके से उठा लिया।


विश्व में इस समय ऐसे हालात नहीं कि कोई भी देश आसानी से युद्ध शुरू करने का जोखिम ले सके। हालांकि पाकिस्तान अपवाद है। अतीत में जिस तरह से पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच युद्ध की शुरुआत की उसे देखते हुए भी एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र से ऐसी अपेक्षा नहीं कि वह आसानी से अपनी तरफ से युद्ध का रास्ता अख्तियार करेगा। ऐसे में एक आतंकपरस्त देश को सबक सिखाने के गैरजंगी तरीकों को अपनाना जरूरी है। मोदी सरकार की मुश्किल यह हो गई थी कि उसने सरकार में आते ही एक खास वर्ग को खुश करने के लिए खुद ही उग्र राष्टÑवादी रवैए का ठप्पा अपने माथे पर लगा लिया था। राष्टÑवादी जंगी आलाप के बीच पाकिस्तान की करतूतों ने मोदी सरकार के लिए अपने घर में भी युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी थी। विपक्ष 56 इंच के सीने पर सवाल उठा रहा था और देशभक्ति का प्रमाण मांग रहा था। इस लक्षित सैन्य हमले के बाद मोदी ने घरेलू स्तर पर शांति तो कायम कर ही ली। धुर विपक्ष वामपंथ चुप है, कांग्रेस सेना को सलाम कर रही है और सीमा पर हमले के बाद अरविंद केजरीवाल ने भी मोदी पर किया जाने वाला घोषित ‘हमला’ टाल दिया है।

पाकिस्तान के लिए ये सारे कदम अप्रत्याशित थे। सिंधु जल समझौता अभी तक युद्धों और सरहदी मुठभेड़ों व पाकिस्तान के नापाक इरादों पर भारी पड़ता रहा है। आखिर 56 वर्ष से यह समझौता ही पाकिस्तान के समूचे पंजाब प्रांत समेत कई हिस्सों का पोषक है। यहां की अर्थव्यवस्था व नागरिक सुविधाएं इस समझौते के आधार पर फल-फूल रही हैं। लेकिन फौजी इशारों पर नाचने वाली एक कमजोर हुकूमत से यह तवक्का बेकार है कि वह अपनी अवाम के लिए खून के बदले पानी को चुनेगा। फिलहाल सिंधु समझौते को लेकर दोनों पक्ष विश्व बैंक पहुंच भी चुके हैं और इसे लेकर पाकिस्तान भारी दबाव में है। संयुक्त राष्टÑ की आम महासभा में ‘शीशे के घर में रहकर दूसरों के घर पर पत्थर फेंकने वाले’ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के भाषण को जैसी ठंडी व उत्साहहीन प्रतिक्रिया मिली, उसके विपरीत विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने तालियां बटोरीं। तब भी शरीफ ने शराफत दिखाना गवारा नहीं समझा। भारत के लक्षित सैन्य हमले को खारिज कर अपना बड़बोलापन दिखाते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने फिर कश्मीर को ‘विभाजन का अधूरा एजंडा’ बताने के साथ कहा कि पाकिस्तान आत्म-निर्णय का अधिकार हासिल करने के संघर्ष में कश्मीरियों का समर्थन करता रहेगा। पुराना राग अलापते हुए ‘कश्मीरी भाइयों के संघर्ष’ में साथ देने की बात दुहराते रहे।

बहरहाल, भारत सरकार ने बेहतरीन कूटनीति का परिचय देते हुए अभी तक एक के बाद एक अपने पत्ते बड़े तरीके से चले हैं। संयुक्त राष्टÑ में पाकिस्तान को अलग-थलग करने के बाद दक्षेस देशों की बैठक में हिस्सा न लेने का मोदी का फैसला गर्म लोहे पर चोट करने जैसा था। भारत के साथ ही दक्षेस की बैठक का महत्त्व है और मोदी के किनारा करते ही बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, अफगानिस्तान ने भी पैर खींच लिए। मुंबई हमले में कसाब और उसके बाद कई सबूतों के बाद भी पाकिस्तान ने ऐसी कोई कोशिश नहीं की कि वह भारत की शांति व्यवस्था को भंग करने के लिए पाकिस्तान की धरती पर प्रशिक्षित आतंकवादियों की बेखौफ आवाजाही की सहूलियत पर रोक लगाए। विश्व भर में सिंधु जल समझौता दोनों देशों के बीच सद्भाव के आदर्श की तरह देखा जाता है। इस पर समीक्षा के लिए दोनों देशों ने आयुक्तों की नियुक्ति भी कर रखी है। दोनों देशों में संबंध कैसे भी कड़वे रहे हों लेकिन इस मुद्दे पर तालमेल बदस्तूर रहा। शायद इसी वजह से पाकिस्तान इस मुद्दे पर जरूरत से ज्यादा आश्वस्त रहा है। लेकिन अब उसका यह विश्वास डगमगा रहा है। इस समझौते का सबसे दुखद पहलू यही है कि पाकिस्तान इसे अपने अधिकार की तरह ले रहा है। इससे पहले युद्धों की वजह से तो इस पर असर नहीं हुआ लेकिन 2001 के संसद पर हमले के बाद भारत ने इस पर बैठकों का सिलसिला बाधित कर दिया था। लेकिन पानी के प्रवाह को रोकने की दिशा में कोई समीक्षा फिर भी नहीं की।

मोदी की ‘हैपी बर्थ डे’ कूटनीति भी जब पाकिस्तान की ‘फौजी हुकूमत’ को देश में हालात खराब करने से रोक नहीं पाई और उसके जवाब में पहले पठानकोट और अब उड़ी में जो हुआ वह दोनों देशों में युद्ध जैसे हालात बनाने में सक्षम था। पाकिस्तानी हुकूमत की आंखों पर सेना का चश्मा और जुबान पर राहिल शरीफ की भाषा जिसमें पाकिस्तान की धरती पर सरकार को शांतिपूर्ण तरीके से चुनौती देने वाला अवाम तो आतंकवादी लेकिन हथियार लेकर सोशल मीडिया पर हिंदुस्तान की हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र व हिंसक आंदोलन का पैरोकार बुरहान वानी इंतिफादा (स्वतंत्रता सेनानी)। बुरहान वानी को अपना नायक बनाने के साथ ही पाकिस्तान ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी और वैश्विक मंचों पर उसके साथ दोस्ती का हाथ मिलाने वाले देशों ने भी अपने हाथ खींच लिए।

पाकिस्तान तो गिलगित, बाल्टिस्तान, पेशावर और बलूचिस्तान में जुल्मो-सितम की इंतहा करते हुए मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ा दे तो भी ठीक और कश्मीर की घाटी में एक आतंकवादी की मौत से भड़की भीड़ कानूनपरस्तों पर पत्थरों की बौछार करे तो उसे तितर-बितर करने की कोशिश भी गलत। क्या पाक हुकूमत को इल्म है कि जिन गाड़ियों और घरों-दुकानों को वे लोग आग लगा रहे थे वे उसी इलाके के बाशिंदे थे। इसके बावजूद भीड़ को तितर-बितर करने के तरीकों पर सरकार को सिर्फ पुनर्विचार करके पैलेट गन के इस्तेमाल को रोकने की बात कहनी पड़ी। दीगर है कि जम्मू कश्मीर हाई कोर्ट को यह कहना पड़ा कि हिंसा पर उतारू भीड़ पर पैलेट गन के इस्तेमाल से रोका नहीं जा सकता।
उड़ी हमले के बाद लक्षित सैन्य हमले का विकल्प चुनने के लिए भारत ने पिछले 11 दिनों में जो कूटनीतिक तैयारी की उससे यह तो संदेश गया कि भारत शांति का विकल्प खत्म होने के बाद ही युद्ध की बात करेगा। संयुक्त राष्टÑ महासभा में भारत की स्थाई मिशन में प्रथम सचिव ऐनम गंभीर हों, विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर या विदेश मंत्री सुषमा स्वराज सभी ने सतत विकास के लिए आतंकवाद के खात्मे की बात की। शांति की वकालत करते हुए ही नॉर्थ ब्लॉक के ‘युद्ध गृह’ में गलती के अनुपात में सजा देने की तैयारी हुई।
पाक ठिकानों पर भारत के वार को पाकिस्तान ने खारिज कर महज सामान्य गोलीबारी कहा है। पाकिस्तान का इनकार यह बताने के लिए काफी है कि इस बार कूटनीतिक रूप से भारत का पलड़ा भारी पड़ चुका है। फिलहाल तो अमेरिका और चीन भी शांति की बात कह पाकिस्तान का पक्ष लेने से परहेज कर रहे हैं।

भारत की कूटनीतिक बढ़त को देखते हुए ही अमेरिका के रक्षा मंत्री एश्टन कार्टर ने कहा है कि भारत और अमेरिका के मौजूदा सैन्य संबंध अब तक के सबसे अधिक करीबी संबंध हैं और दोनों देश पहली बार जल, थल एवं नभ में एक साथ सैन्य अभ्यास कर रहे हैं। कार्टर ने जोर देकर कहा कि दोनों महान प्रजातांत्रिक देशों ने सामरिक एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र में एक-दूसरे से सहयोग करने के लिए हाथ मिलाया है। अमेरिका खुल कर बताना चाह रहा है कि भारत उसका ‘चहेता’ हो रहा है। कुल मिला कर सरकार को अपना यह गैरजंगी विकल्पों का अभियान जारी रखना होगा। दोनों देशों के तनाव के बीच पाकिस्तान के नेताओं की ओर से परमाणु बम की धौंस दिखाना गीदड़भभकी बन चुका है। जहां तक युद्ध का सवाल है तो भारत की पाकिस्तान की बनिस्बत दोगुनी ताकत का इल्म खुद पाक हुक्मरानों को भी है। जो नदियां पाकिस्तान की जीवनरेखा हैं वे उसी कश्मीर से बह कर जाती हैं जहां पाकिस्तान के फौजी व हुक्मरान खून की होली खेल रहे हैं। लिहाजा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक ही कहा था कि खून और पानी साथ-साथ नहीं बह सकते।

लोकसभा चुनाव के बाद ढाई साल की स्थिति भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार के लिए ठीक नहीं रही। दिल्ली, बिहार जैसे राज्यों में चुनाव हारने के साथ ही उसे असहिष्णुता, महंगाई और सरहद की सुरक्षा में नाकामी जैसे सवालों से जूझना पड़ रहा था। सरकार के सारे वादे जुमले साबित होने के साथ अच्छे दिन का नारा भाजपा के गले की हड्डी बन गया था। पाकिस्तान को करारा जवाब देने के साथ मोदी ने अपना खोया जादू तो वापस पा ही लिया है। सीमा की सुरक्षा के साथ घर में उत्तर प्रदेश और पंजाब की जंग तो है ही। पंजाब के कई प्रांत सरहद को छूते हैं, इसलिए वहां इसका सकारात्मक असर तो होना ही है। तो देखते हैं कि युद्धरत समय से निकाली यह शांति मोदी सरकार कितने समय तक कायम रख पाती है।

सिंधु जलसंधि करार में दरार

1960 के सिंधु जल समझौते के तहत क्षेत्र की तीन नदियों के पानी पर भारत का नियंत्रण होगा, जबकि तीन नदियों-सिंधु, झेलम और चेनाब के बहाव पर पाकिस्तान का नियंत्रण होगा। इन नदियों का पानी प्राकृतिक रूप से पाकिस्तान की ओर ही बहता है। 56 साल पहले भारत और पाकिस्तान ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। दोनों देशों के बीच अब तक आए बड़े तनावों के बीच भी यह संधि कायम है। सिंधु नदी का इलाका करीब 11.2 लाख किलोमीटर में है। जिसमें पाकिस्तान का 47 फीसद, भारत का 39 फीसद, चीन 8 फीसद और अफगानिस्तान 6 फीसद में है। करीब 30 करोड़ लोग सिंधु नदी की धारा के आस-पास रहते हैं। करीब एक दशक तक विश्व बैंक की मध्यस्थता में बातचीत के बाद भारत और पाक के बची 19 सितंबर 1960 को समझौता सिंधु जल समझौता हुआ। संधि पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्टÑपति जनरल अयूब खान ने हस्ताक्षर किए। इसके तहत सिंधु घाटी की 6 नदियों का जल बंटवारा हुआ था। सिंधु घाटी की नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया था, पूर्वी और पश्चिमी। भारत इन नदियों के उद्गम के ज्यादा करीब है। ये नदियां भारत से पाकिस्तान की ओर जाती हैं। पूर्वी पाकिस्तान की 3 नदियों का नियंत्रण भारत के पास है। इनमें व्यास, रावी और सतलज आती हैं। वहीं पश्चिम पाकिस्तान की 3 नदियों का नियंत्रण पाकिस्तान के पास है। इनमें सिंधु, चिनाब और झेलम आती हैं। पश्चिमी नदियों पर भारत का सीमित अधिकार है। भारत अपनी 6 नदियों का 80 फीसद पानी पाकिस्तान को देता है और भारत के हिस्से आता है करीब 20 फीसद पानी।

पाकिस्तान के लिए यह समझौता इसलिए अहम रखता है क्योंकि पाकिस्तान के दो-तिहाई हिस्से में सिंधु और उसकी सहायक नदियां आती हैं। पाकिस्तान की 2.6 करोड़ एकड़ ज़मीन की सिंचाई इन नदियों पर निर्भर है। अगर भारत पानी रोक दे तो पाक में पानी संकट पैदा हो जाएगा, खेती, पानी और बिजली का घोर संकट हो जाएगा। गौरतलब है कि सिंधु नदी का उद्गम स्थल चीन में है और भारत-पाकिस्तान की तरह उसने जल बंटवारे की कोई अंतरराष्टÑीय संधि नहीं की है। अगर चीन ने सिंधु नदी के बहाव को मोड़ने का फैसला ले लिया तो भारत को नदी के पानी का 36 फीसद हिस्सा गंवाना पड़ेगा। अंतरराष्टÑीय संधि होने के कारण कोई अकेला पक्ष इसे तोड़ नहीं सकता।

विश्व बैंक पहुंचे दोनों देश : सिंधु जल संधि में मध्यस्थता कर चुके विश्व बैंक ने 29 सितंबर को कहा है कि भारत एवं पाकिस्तान ने इस समझौते को लेकर इस वित्तीय संस्था से संपर्क किया है और वह संधि में तय की गई अपनी सीमित, प्रक्रियागत भूमिका के अंतर्गत इसका समाधान कर रहा है। विश्व बैंक के एक प्रवक्ता ने कहा, ‘भारत एवं पाकिस्तान ने विश्व बैंक को सूचित किया है कि प्रत्येक ने सिंघु जल संधि 1960 के तहत प्रक्रिया शुरू की है। विश्व बैंक समूह संंधि में तय की गई उसकी सीमित एवं प्रक्रियागत भूमिका के तहत समाधान कर रहा है। सिंघु जल संधि 1960 के तहत आने वाली प्रक्रिया के बारे में आगे के ब्योरे के लिए आप सदस्य सरकारों (देश) से पूछ सकते हैं। इसके पहले भारत तय कर चुका है कि वह झेलम सहित पाकिस्तान की ओर बहने वाली नदियों के अधिकतम जल का प्रयोग करेगा। इसके बाद पाकिस्तान विश्व बैंक चला गया और उसके अधिकारियों ने वहां यह मुद्दा उठाया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा कि सिंघु जल संधि भारत एवं पाकिस्तान के बीच आपसी सहमति के आधार पर बनी थी और इसकी मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी। किसी भी देश को इस संधि से एकपक्षीय ढंग से अलग हटने का अधिकार नहीं है।

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