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बेबाक बोलः क्या समझे आप

आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने कहा कि उन्होंने लोगों से अपील की थी कि राष्ट्र निर्माण के नाम पर मिस्ड कॉल देकर आम आदमी पार्टी से जुड़ें। उन्होंने आंकड़ा भी दिया कि नंबर जारी होने के चौबीस घंटे के अंदर ग्यारह लाख लोग पार्टी से जुड़ गए। जीत के पहले और बाद भी केजरीवाल शाहीन बाग से दूर रहे। चुनाव में धार्मिक धु्रवीकरण हुआ मगर शाहीन बाग पर मुंह नहीं खोलने वाली आम आदमी पार्टी की तरफ। नागरिकता कानून और मुसलमानों पर खुल कर पक्ष रखने वाली कांग्रेस का लोप हो गया। राष्ट्रवाद और धर्म से इतर दिल्ली की जनता ने संदेश दिया है कि वह जनहितकारी योजनाओं को खोना नहीं चाहती है। यूपीए-दो की तरह ही राजग-दो ने निजी-निजी कर जनता के पांव के नीचे से सरकारी सुरक्षा की कालीन खींचनी शुरू कर दी। दिल्ली चुनाव में आम आदमी पार्टी की रियायती योजनाओं का मजाक उड़ाना महंगा पड़ा। दिल्ली में जनता के संदेश पर बेबाक बोल।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल।

‘दिल के दुकनदार हैं दूसरे भी
हम थोड़ा अच्छे हैं वो हैं फरेबी…
आज बाजार ही बिक गया रे…
दिल मेरा मुफ्त का…’
दी फिल्म ‘एजेंट विनोद’ के इस मुजरे की पंक्तियों को चुनावी संदेशों से जोड़ कर देखें तो 2014 के आम चुनावों में राष्टÑवाद का जो बाजार तैयार हुआ था वह 2020 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी हिट है। जीत यहां भी राष्ट्रवाद की ही हुई है पर इस बार डिब्बाबंदी अलग है। 2014 में जो भाजपा के रणनीतिकार थे उनकी कंपनी के साथ छवि प्रबंधन का करार अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली आम आदमी पार्टी की सरकार ने किया। भारत में चुनावी प्रबंधन वाली कंपनी का बाजार 2014 में भारी मुनाफे वाला साबित हुआ। राष्ट्रवाद और धु्रवीकरण का प्रयोग महज संयोग नहीं था, भारत के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पर्यावरण के गहन विश्लेषण के साथ रचा गया था।

इस प्रयोग का परिणाम था एक दल के पक्ष में प्रचंड बहुमत और विपक्ष पस्त। पस्त विपक्ष ने इस धु्रवीकरण की काट बिहार में खोजी और इसी भाषा में वहां विजय रथ रोका भी गया था। ‘दिल के खुश रखने को गालिब ये ख्याल अच्छा है’ वाले तर्ज पर राजग की हार में खुश होने वाले विश्लेषक कह रहे हैं कि राष्ट्रवाद और धु्रवीकरण की काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती और दिल्ली में राष्ट्रवाद नहीं बिजली-पानी जैसे जनता के मूल मुद्दे की जीत हुई है। और यही तर्क उस चुनावी प्रबंधन कंपनी का सबसे बड़ा मुनाफा है जो पुरानी शराब को नई बोतल में बेच कर उसे सबसे बेहतर उत्पाद बताती है।

काम नहीं करने देते हैं जी वाले अरविंद केजरीवाल के लिए चुनावी प्रबंधन कंपनी की सबसे पहली सलाह यही थी कि केंद्र को खलनायक बनाकर आप नायक नहीं बन सकते हैं। आपकी भाषा होनी चाहिए कि हमने ऐसा-ऐसा कर डाला। भाजपा के खिलाफ भाजपा सा सुर, राष्ट्रवाद के सामने राष्ट्रवाद तो भक्तों के जय श्रीराम के बरअक्स राम भक्त हनुमान। सबसे अहम, जो केंद्र के उलट थी वह जनकल्याणकारी योजना। लोकसभा चुनावों में रियायती योजनाओं की खेप खत्म कर राजग द्वितीय निजी-निजी के माल को अपनी दुकान पर सजा चुका था।

दिल्ली के तीसरी बार मुख्यमंत्री बने केजरीवाल ने ‘आय लव यू’ बोलने के साथ कहा कि यह भारत माता की जीत है। और भगवान जी तो पहले ही ‘शोले’ के बीरू की तरह बसंती को बोल चुके थे कि भक्त तुमने अपना काम कर दिया है और अब प्रसन्न होकर जाओ। अरविंद केजरीवाल ने भगवान जी के साथ अपने इस संवाद को ट्वीट भी किया पर शायद किसी ने उनसे यह नहीं पूछा कि जब भगवान जी से आवाज आई तो आपने बसंती की तरह अचरज में ये तो नहीं पूछा-यूं कि ये कौन बोला। नहीं, उन्हें अचरज नहीं हुआ होगा। यह ऐसी चुनावी पटकथा थी जिसके संवाद एक कंपनी लिख रही थी।

नायक को तो संवाद याद भर करना होता है। और, जीत के बाद वही भगवान, लाल चुनरी और दूसरी तरफ शाहीन बाग की प्रदर्शनकारी महिलाओं का मौन व्रत बता रहा था कि जीता वही जो शाहीन बाग से दूर था। आम आदमी पार्टी के संजय सिंह मिस्ड कॉल से राष्ट्र निर्माण की खातिर लोगों को पार्टी से जुड़ने की अपील कर रहे थे और यह आंकड़ा भी प्रस्तुत किया कि महज चौबीस घंटे के अंदर ग्यारह लाख लोग पार्टी से जुड़ गए। इसी तरह मिस्ड कॉल से कार्यकर्ता बनाने के दावे भारतीय जनता पार्टी भी करती रही है।

2014 की चुनावी कंपनी का प्रयोग था धु्रवीकरण। और, इस बार भी धु्रवीकरण हुआ लेकिन उस मुसलमान का जो कह रहे थे कि केंद्र के नागरिकता कानून ने उनके अस्तित्व पर सवाल उठा दिया है। भाजपा ने शाहीन बाग पर मुखर ध्रुवीकरण करने की कोशिश की लेकिन सफल हुई अरविंद केजरीवाल की चुप्पी। वो तीखा बोल रहे थे और ये मुंह नहीं खोल रहे थे। अपने अस्तित्व के मुद्दे पर नाराज और आहत जनता का केंद्र उस धुरी पर केंद्रित हो गया। तो क्या चुनाव के बाद अरविंद केजरीवाल ओखला विधानसभा के उन लोगों की उम्मीदों को पूरा करेंगे जिन्होंने ‘आप’ को एक लाख तीस हजार से ज्यादा वोट दिए। भाजपा के उम्मीदवार से इस जीत का अंतर 71, 827 वोटों का था। तो क्या अब वे उन लोगों का रास्ता खुलवाएंगे जिन्होंने इन्हें एकध्रुवीय वोट दिया। जीत के बाद ‘आप’ के रोड शो ने शाहीन बाग का रुख क्यों नहीं किया?

भाजपा ने अपनी दो नीतियों को मिश्रित किया था। पहला धर्म के आधार पर धु्रवीकरण का और दूसरा नवउदारवादी नीति को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने का। भाजपा सरकार ने खुद ही लोकसभा चुनाव में गैस सिलेंडर, शौचालय और मकान को एजंडा बनाया था। लेकिन दिल्ली में उन्हीं जनकल्याणकारी योनाओं के खिलाफ शाहीन बाग के जरिए माहौल बनाने की कोशिश की। धार्मिक ध्रुवीकरण में नवउदारवाद का मिश्रण इनकी केंद्रीय थीम थी।

आर्थिक मोर्चे पर एअर इंडिया को देखें या भारतीय जीवन बीमा निगम, भाजपा ने नवउदारवाद का प्रचंड रूप धर लिया। दूसरी पारी आते ही भाजपा आर्थिक मोर्चे पर इतनी निर्ममता से कैसे आगे बढ़ने लगी और उसका हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों पर क्या असर है? इसके बरअक्स यूपीए-दो को याद करें। यूपीए-एक में कांग्रेस की सीटें कम थीं। वामपंथी और अन्य पार्टियों के दबाव में उसे जनकल्याणकारी योजनाओं पर जोर देना पड़ा। मनरेगा से लेकर सूचना कानून तक। इन जनकल्याणकारी योजनाओं का अगले चुनाव में कांग्रेस को जबर्दस्त फायदा मिला। लेकिन बहुमत लेकर लौटते ही कांग्रेस ने जनवादी नीतियों से पल्ला झाड़ तेजी से नवदारवाद की राह पकड़ी। बड़े वैश्विक बाजार के पक्ष में जाते ही जनता का उससे मोहभंग हुआ और महंगाई व भ्रष्टाचार से त्रस्त होकर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल भी कर दिया।

पहली पारी में जनकल्याणकारी योजनाओं के सहारे राजग ने दूसरी पारी के लिए बंपर बहुमत बटोरा। लेकिन दूसरी बहुमत वाली पारी मिलते ही उसने भी यूपीए-दो की तरह आक्रामक रुख अपनाया और रियायती संस्थाओं व योजनाओं को समेटना शुरू किया। अनुच्छेद 370 व अयोध्या जैसे मजबूत राजनीतिक फैसलों की आड़ में कमजोर तबके के पांव के नीचे से सरकारी सुरक्षा की कालीन खींचने लगा। धार्मिक ध्रुवीकरण और राष्ट्रवाद के जरिए भाजपा को जनता के एक बड़े तबके को अपने साथ रखने में खासी मुश्किल नहीं हुई। ध्यान देने की बात है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कुछ खोया तो नहीं, पाया जरूर है और यह उसके आगे बढ़ने का रास्ता तो तैयार करता है।

धर्म और राष्ट्रवाद के नाम पर भाजपा की जीत अन्य दलों के सूपड़ा साफ में भी दर्ज होती है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी और भाजपा के अलावा कोई नहीं है। मुसलमानों के पक्ष में और नागरिकता संशोधन कानून की मुखालफत पर सीधा रुख तय करने वाली कांग्रेस गायब हो गई है। शाहीन बाग के नाम पर अगर ध्रुवीकरण को माना जाए तो कांग्रेस का खात्मा इस राजनीतिक लड़ाई को आगे किस राह पर ले जाएगी यह भी सोचने की बात है। कांग्रेस के खत्म होने का मतलब प्रशांत किशोर के उस प्रयोग का सफल होना है कि मुसलमान के खिलाफ या पक्ष में बोलने के बजाए चुप्पी साध लो। 2014 लोकसभा चुनाव में राजग ने उत्तर प्रदेश में एक भी मुसलिम चेहरे को टिकट नहीं दिया था। वहीं बिहार विधानसभा चुनाव में महागठबंधन ने मुसलिम चेहरों को केंद्र में लाने से परहेज किया था।

दिल्ली का संदेश वही है जो 2014 में देश का संदेश था। रियायती योजनाओं की राजनीति को जनता बचाना चाहती है। भाजपा ने आम आदमी पार्टी की जनकल्याणकारी योजनाओं पर कड़ा हमला किया। रियायती सुविधाओं को मुफ्तखोरी बता बाजार का रास्ता अख्तियार किया। दिल्ली ने फिर संदेश दिया है कि धर्म और बाजार के बीच वैकल्पिक रास्ता हो सकता है। जिस रास्ते को आधार बनाकर भाजपा आई थी अब मजबूरी में उसे छोड़ना पड़ रहा है। मुफ्तखोरी और सब कुछ बेच देंगे वाली भाषा के खिलाफ जनकल्याणकारी योजनाओं को बचाने के लिए जनता का इकट्ठा होना ही आवाम का पैगाम है। यहीं से भविष्य की राजनीति भी दिखाई देती है। आम आदमी पार्टी यथावत, भाजपा आगे बढ़ी है और कांग्रेस कहीं भी नहीं खड़ी है।

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