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बाखबरः नव नित मंगल मोद बधाए

एक चैनल बताता है कि सात दिन में योगीजी ने पचास फैसले किए हैं! एकदम बुलेट ट्रेन की स्पीड से काम हो रहा है! है कोई सीएम योगीजी की टक्कर का? चैनल मानो पूछते-पूछते रह जाते हैं!

Author April 2, 2017 03:40 am
उत्‍तर प्रदेश विधानसभा में पहली बार अपनी बात रखते सीएम योगी आदित्‍य नाथ। (Source: TV Grab)

त्रेता और द्वापर, वह भी कलयुग में! अहो भाग्य हमारे कि तीन तीन युग एक साथ मिक्स होते दिखते हैं। नित नव मंगल मोद बधाए! योगी योगी योगी… योगी के नारे ने मोदी के नारे को रिप्लेस कर दिया है! दस दिन से सिर्फ योगीजी पहली खबर बना रहे हैं। मोदीजी खबरों से आउट हैं! चैनल योगीजी को ‘डिकोड’ करने के चक्कर में बावले हुए जाते हैं। हिंदी चैनल तो पूरी तरह बौराए लगते हैं। जैसा त्रेता भाव हिंदी चैनलों में बरसता है वैसा अंग्रेजी वालों में कहां? ये फिरंगी चैनल क्या समझें ‘नानापुराणनिगमागम सम्मतम्’ की बातें?

खबर ही मिथक है या मिथक ही खबर है! अपलक नेत्रों से हम दर्शक, प्रभु की लीला निहारते ‘धन्य धन्य’ होते रहते हैं: बड़े भाग मानुष तन पावा/ सुर दुर्लभ सदग्रंथन गावा!
मेरी वाणी गैरिक वसना! अद्भुत सरल सहज वाणी है। भगवा रंग में विनम्रता है। योगीजी योग महोत्सव में बोल रहे हैं। संग में योग गुरु बाबा रामदेव भगवा वेश में पुलकित हैं। अन्य संन्यासी जन भी हुलसित हैं। इस समग्र भगवा दृश्य में योगीजी दिल की बातें कहते हैं: मोदीजी की सोच सकारात्मक है। मोदीजी ने मुझे यूपी सौंप दिया… वही बाबा तुलसी दास के दोहे वाला संकोच: ‘जो संपति सिव रावनहि दीन्ह दिए दस माथ/ सोई संपदा विभीषणहिं सकुच दीन्ह रघुनाथ’!

योगीजी बोलते हैं तो लगता है एक सरल सहज रीयल योगी बोल रहा है। वे बताते हैं कि अमित शाहजी ने जब कहा कि लखनऊ पहुंचना है, तो मेरे पास एक जोड़ी कपड़े थे! यह आत्मश्लाघा नहीं, सहज यथार्थ कथन की तरह प्रसारित हुआ! यह ‘परफारमेंस’ नहीं थी, बल्कि ‘जैसा है वैसा है’ वाला भाव था! योगीजी का यह ‘सहजयोग’ है।
चैनल इसी सहजयोग को कवर करते हुए आश्चर्यचकित हो रहे हैं। एंकर योगीजी के व्यक्तित्व का बखान नहीं कर पा रहे हैं। वे उनके जीवनवृत्त से इतने अभिभूत हैं कि उनको हर बात ‘अद्भुत’ लगती है।

छोटे-छोटे वाक्य बिना गरजे-बरसे ही कहे जाते हैं और दिमाग में देर तक गूंजते रहते हैं: यूपी के गुंडे या तो सुधर जाएं या यूपी छोड़ कर कहीं चले जाएं, नहीं तो वहां भेज देंगे जहां से कोई लौट कर नहीं आता!… अगर दो युवक-युवती अपनी सहमति से बात कर रहे हों तो उनको न छेड़ा जाए!… हम यहां मौज-मस्ती करने नहीं आए हैं। अठारह से बीस घंटे काम करने आए हैं। जो अठारह से बीस घंटे काम करे, वह हमारे साथ आए!… सूर्य नमस्कार में जितनी क्रियाएं है वही नमाज में हैं…
त्रेता में कलयुग एंट्री लेता है। चैनल दिखाते हैं। भाजपा का एक एमएलए कह देता है कि जो गोमाता को मारेंगे हम उनकी टांग तोड़ देंगे। डिबेटिंग प्राइम टाइमों में न डिबेट न बहस! न तर्क न वितर्क। सीधा सटाक दो टूक बूम फटाक संदेश!

एबीपी योगीजी पर पूरे फीचर दे चुका है। इंडिया टुडे ने ‘परसन आॅफ इंटरेस्ट’ में योगीजी पर लंबा फीचर दिया है, लेकिन चैनलों के लिए योगी अब भी अव्याख्येय हैं। लटयंस की दिल्ली वाले योगीजी को देख-देख चकित-थकित दिखते हैं। योगीजी उनकी पकड़ से बाहर हैं।
सीएम तो और भी बने हैं, लेकिन चैनलों का जितना फोकस योगीजी पर है, अन्य किसी पर नहीं। यही योगी-तत्व है! चैनलों के लिए योगीजी किसी चमत्कार से कम नहीं!
लखनऊ का टुंडे कबाब आउट। यूपी में मीट आउट! मीट वालों की हड़ताल और योगीजी से मीटिंग, लाइसेंस शुदा को छूट, बाकी बंद। रोमियो आउट। स्त्रियां सुरक्षित हैं। पान पीक बंद। ये बंद वो बंद! छोटी-छोटी बातें बड़ी-बड़ी खबरें!
एक चैनल बताता है कि सात दिन में योगीजी ने पचास फैसले किए हैं! एकदम बुलेट ट्रेन की स्पीड से काम हो रहा है! है कोई सीएम योगीजी की टक्कर का? चैनल मानो पूछते-पूछते रह जाते हैं!
योगीजी का गो-प्रेम देखें। वे सपा की अपर्णा यादव की गोशाला में जाकर गउओं को अपने हाथ से हरा चारा खिलाते हैं। अपर्णा अपनी प्रसन्नता नहीं छिपातीं। राजनीति के रोगी रिपोर्टर इसमें भी राजनीति बीनने लगते हैं। लेकिन अपर्णा हंसते हुए कहती जाती हैं कि जो होगा, सो भविष्य बताएगा! कट टू गुजरात। मंत्रीजी चैनलों पर नए गोवंश रक्षा कानून के बारे में बताते हैं कि गोहत्या गैरजमानती अपराध है। गोहत्या करने वाले को उम्र कैद होगी! डन जी डन!

संसद लगी है। जीएसटी पर बहस है। जीएसटी पारित है। सपा के नरेश अग्रवालजी कुछ नामित सेलीब्रिटी सांसदों की लंबी अनुपस्थिति को ही मुद्दा बना डालते हैं! चैनल रेखा और सचिन को परमानेंट एब्सेंटी दिखाने लगते हैं। ऐब्सर्ड-सी बहसें होने लगती हैं। जिन गायकवाड़जी ने कह कर पच्चीस सैंडिलें मारीं, उन्हीं को चैनल तमीज सिखाने में लगे रहे। चार दिन तक चैनल एक सांसद को धिक्कार कर लाइम लाइट में लाते रहे, फिर कहते रहे कि बड़े बेशर्म हैं ये लोग!

चैनल को जंतर मंतर का होश तब आता है जब राहुल वहां जाते हैं। वहां तमिलनाडु के गरीब किसान अपनी गोद में खोपड़ियां रखे, हरा कोपीन पहने और माथे पर हरा अंगोछा बांधे अठारह दिन से धरने पर बैठे हैं। एक एंकर एक नेता को ताना मारता है कि अठारह दिन से बैठे हैं और राहुल अब उनके बीच राजनीति करने गए हैं! एंकर से कोई नहीं पूछता कि हम तो अब गए, तुम्हारे कैमरे कहां थे अठारह दिन तक, जो एक बार भी जंतर मंतर न झांके? लेकिन अपने नेता एंकरों से भी डरते हैं!

अंत में तमिल राजनीति ने हिंदी के साथ ‘कोलावेरी डी’ करनी शुरू कर ही दी! डीएमके की दुकान हिंदी को ठोके बिना नहीं चलती, सो आदरणीय स्टालिनजी ने हिंदी को ठोक लिया। राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे लगे मील के पत्थर तमिल, अंग्रेजी, हिंदी में लिखे थे। एक हिंदी-बैरी हिंदी वाले हिस्से पर कोलतार मारता दिखता था। एक अंग्रेजी एंकर ने डीएमके वाले से कहा भी कि जो लिखा है त्रिभाषा फार्मूले के अनुसार ही तो है, तब हिंदी को क्यों मिटाते हो? डीएमके बोला: तमिल पर हिंदी थोपी जा रही है। तमिल पहचान का सवाल है…
श्रीमान जी! हिंदी की भी पहचान का सवाल है! लेकन अंग्रेजी एंकर ने एक भी हिंदी वाले से नहीं बुलवाया। यह है अंग्रेजी चैनलों का हिंदी के प्रति दुराव!

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