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बाखबरः भीड़तंत्र की जय

चैनल और एंकर मस्त थे कि एक भीड़ उपलब्ध थी, जिसे दिखाना था और उस रोमांच से रोमांचित होना था, जो चैनलों को निर्भया आंदोलन के बाद नसीब हुआ! एनडीटीवी पर यही ‘प्रो जल्लीकट््टू सुनामी’ बताया जाने लगा! चैनलों की होड़ाहोड़ी ने इस आंदोलन के भाव बढ़ा दिए!

Author Updated: January 22, 2017 3:50 AM

अपने चैनलों को अपने जिस तहरीर चौक की तलाश थी वह जैसे ही मरीना बीच पर मिला, उसी पल से बावले हो गए। आह मिल गया अपना तहरीर चौक! अब दिखाना है दिन-रात लाइव लाइव, एकदम एक्शन से भरपूर! इस चक्कर में जायरा वसीम और सिद्धू की कहानियां मारी गर्इं। जल्लीकट्टू की बहाली की मांग को लेकर मरीना बीच पर बढ़ती भीड़ से रोमांचित एंकर और रिपोर्टर व्याख्या रिपोर्टिंग में लग लिए। शुरू में जो चैनल जल्लीकट््टू की मांग को सर्वाेच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना बता रहे थे, उन्हींने भीड़ लगते ही लाइन बदल ली। अब वे भीड़ के थे, भीड़ उनकी थी। एंकर बलिहारी जाते थे, रिपोर्टर चरणों में बिछे जाते थे और भीड़ लाइव कैमरों को देखते ही नारे लगाने लगती थी कि ‘वी वांट जल्लीकट्टू’! कहीं-कहीं कुछ नारे लगाते थे: मोदी डाउन डाउन!
सबसे पहले इंडिया टुडे ने बुधवार को लाइन दी: सोशल मीडिया ने ‘जल्लीकट्टू आंदोलन’ को शुरू किया है। उसके बाद चैनल व्याख्या में लग गया: यह ‘अपसर्ज’ है, आंदोलन विराट रूप धाारण करता जा रहा है, अदालत द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को चुनौती दी जा रही है, छात्र और ‘टेची’ शामिल हो रहे हैं।
न्यूज एक्स पर यह ‘जन-आंदोलन’ था, तमिल ‘कल्चर का अभिमान’ था। मांग होने लगी कि केंद्र को जलीकट्टू की बहाली के लिए अध्यादेश जारी करना चाहिए।
टाइम्स नाउ पर यह ‘अपराइजिंग’ थी। एक बाबाजी देर तक समझाते रहे कि किस तरह पश्चिमी मूल्यों ने हमारे मूल्यों को हटाया है, अगर कू्ररता होती है तो उसका इलाज कीजिए, लेकिन पश्चिम वाले क्या जानें कि अपने यहां जानवर का क्या महत्त्व है? एनजीओे ऐसा ही करते हैं। पता नहीं कौन एनजीओ है बैन के पीछे।…
अंधी चर्चाओं का जलवा था। एंकर उत्तेजित होकर भीड़ की भावनाओं की आरती उतारने में लगे थे और भीड़ कैमरों को देखते ही नारे लगाने लगती थी। ये सीन हर चैनल पर थे।
भीड़ दृश्य थी, वक्ता थी, प्रवक्ता थी, नारा थी, हल्ला थी और चैनलों की फीडर थी, उधर चैनल भीड़ के लाइव प्रसारक थे। अपने को कवर होते देख भीड़ उमड़ती थी और चैनल कहने लगते थे कि भीड़ बढ़ रही है, बढ़ती ही जा रही है। फिर कहते कि सोशल मीडिया और वाट्सऐप का कमाल है!
चैनल और भीड़ एक-दूसरे की पूरक थे। भीड़ कैमरों को देख कर आती थी और कैमरे भीड़ को देख बर्बाद थे, क्योंकि यह देसी तहरीर चौक हो रहा था!
एक चैनल पल-पल की घड़ी लगा कर दिखाने लगा कि अब तिरपन घंटे हुए, पचपन घंटे हो गए, कल तमिलनाडु बंद रहेगा! रेल रोकी जाएगी! भीड़तंत्र अपने चरम पर था!
रिपोर्टर अक्सर पूछते: ऐसा कब तक चलेगा? यह जल्लीकट््टू का मामला है या उससे अधिक कुछ और है, तो युवा कहते यह तमिल प्राइड का सवाल है। यहां तब तक जमे रहेंगे जब तक हमारी मांग नहीं मान ली जाती। पीएम को आॅर्डिनेंस लाना चाहिए, हमारे परिवार के सदस्य की तरह होता है सांड़। जल्लीकट््टू परंपरा है हमारी, हम उसे बहाल कराके रहेंगे। पेटा पर प्रतिबंध लगाया जाए। हिंदी थोपना बंद हो…
हर आधे घंटे बाद एंकर बदलते और अपने-अपने स्लॉट पर मरीना बीच की भीड़ की आरती उतारते रहते। भीड़ का अभिमान फूलता रहता कि देखा, हम हैं खबर बनाने वाले और नारे चलते रहते। रिपोर्टर कहते रहते कि यह भीड़ स्वत:स्फूर्त है; (और एकदम शांत है, इसका कोई नेता नहीं है) नेताओं को आने भी नहीं दे रही!
‘तमिल स्वाभिमान’, ‘तमिल पहचान’, ‘तमिल कल्चर’ इतनी बार बरसे कि लगा बाकी कोई और कल्चर है ही नहीं। तमिल वक्ता अर्राकर कहते कि आप तमिल कल्चर को क्या जानें? कई तमिलों ने तो इस चक्कर में हिंदी को भी घसीट लिया जैसे वही अत्याचार कर रही हो! और आश्चर्य कि अंगरेजी के एक भी रिपोर्टर ने नहीं टोका कि हिंदी को क्यों कूटते हो?
सीएनएन न्यूज अठारह ने बताया कि इसके पीछे एनजीओ काम कर रहे हैं। एक वक्ता बोला कि जो प्रदर्शन कर रहे हैं वे जल्लीकट््टू नहीं खेलते! रात तक यही ‘अपराइजिंग’ कुछ देर बाद ‘रिवोल्यूशन’ कही जाने लगी। फिर ‘रिबेलियन’ कहा जाने लगा और फिर तहरीर चौक तारी हो गया।
चैनल और एंकर मस्त थे कि एक भीड़ उपलब्ध थी, जिसे दिखाना था और उस रोमांच से रोमांचित होना था, जो चैनलों को निर्भया आंदोलन के बाद नसीब हुआ! एनडीटीवी पर यही ‘प्रो जल्लीकट््टू सुनामी’ बताया जाने लगा! चैनलों की होड़ाहोड़ी ने इस आंदोलन के भाव बढ़ा दिए!
सिर्फ इंडिया टुडे पर कायदे की एक बहस आई, जिसमें एन. राम ने साफ कहा कि यह आंदोलन ही बोगस है। जल्लीकट््टू जमींदारों का खेल था, वही सांड़ों को खिलाते-पिलाते थे, यह किसानों का खेल नहीं था। राजदीप ने कहा कि अगर इसी तरह परंपरा की जय-जय होती रही, तो कल कोई सती की बहाली की मांग भी करने लगेगा! (सरजी, हिंदी वाले इतने उन्मादी नहीं हैं!)
रात में मोबाइलों को जला कर मोमबत्ती वाले सीन दिखे! भीड़ को भीड़ खींचती है। सब खिंचने लगे। एआर रहमान भूख हड़ताल करेंगे। रजनीकांत रैली में शामिल होंगे। कमल हासन, विजय, धनुष आदि सब आंदोलन के साथ नजर आए। और तो और, सीताराम येचुरी ने आकर कहा कि लोगों की भावनाओं को देखते हुए केंद्र सरकार को निर्णय लेना चाहिए!
तमिल अस्मिता, तमिल जातीयता, तमिल स्वाभिमान, तमिल पहचान का दावा होता रहा! विक्टिमहुड बरसती रही! वक्ता जोश में आते रहे। चैनल अनकट आंदोलन को पोसते और सोशल मीडिया को कोसते रहे! देखते-देखते यह ग्लोबल हो गया और न्यूयार्क, मेलबर्न, मलेशिया, सिंगापुर, श्रीलंका होने लगा। होना ही था!
शुक्रवार का दिन समाधान का श्रेय लेने का रहा। तमिल के बीजपी नेता के आगे आने की खबर रही। मुकुल रोहतगीजी ने कहा, सब विकल्प खुले हैं। दोपहर तक हर चैनल लाइन देने लगा कि केंद्र के आग्रह पर अदालत निर्णय को विलंबित कर सकती है!
इस तरह भीड़तंत्र की जय होती दिखी!

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