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आत्मनिर्भर भारत: छल था गांधी का ट्रस्टीशिप सिद्धान्त, औद्योगीकरण से बचना आज मुमकिन नहीं

जस्टिस (रि.) मार्कण्‍डेय काटजू ने अपने इस ब्‍लॉग में कहा है कि गांधी चरखा का गुणगान करते थे और वे अक्सर औद्योगिकीकरण (Industrialization) के खिलाफ बोलते थे, लेकिन आज की दुनिया में यह कहना मूर्खता है कि कपड़ा हाथ से बनाया जाना चाहिए, मिलों में नहीं।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कन्डेय काटजू ने इस आलेख में कहा है कि आज की दुनिया में यह कहना मूर्खता है कि कपड़ा हाथ से बनाया जाना चाहिए, मिलों में नहीं। (फोटोः नरेंद्र कुमार/जनसत्ता ऑनलाइन)

शेषाद्रि चारी का लेख (द प्रिंंट में छपा) ‘मोदी जी के भारतीय आत्मनिर्भरता’ का विचार वही है जो गांधीजी के आधुनिकीकरण का था- हाँ, पश्चिमी निर्भरता नहीं’ (Modi’s idea of self reliant India same as Gandhi’s modernisation- yes, Western dependence no), अर्थशास्त्र में उनकी बुद्धिहीनता का परिचय देता है। चारी ने खोखली और अर्थहीन बातें कही हैं, जिससे प्रतीत होता है कि उन्हें अर्थशास्त्र का कोई ज्ञान नहीं है।

उन्होंने कहा कि “स्वदेशी को मजबूत स्थानीयकरण (robust localisation) और अपरिहार्य वैश्वीकरण (inevitable globalisation ) के बीच एक पुल के रूप में देखा जाना चाहिए, क्योंकि ये एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं” और “आत्मनिर्भरता का मतलब अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से कट जाना नहीं है। भारत को देशीय क्षेत्रोँ का खयाल रखते हुए दुनिया के साथ भी गंभीरता से जुड़ना होगा, ऐसे में भारतीय शासन प्रणाली को सुव्यवस्थित करके अपने घरेलू उद्योग को मजबूत करना आवश्यक है। स्वदेशी को अलगाव नहीं समझा जाना चाहिए।”

चारी ने अंत में आडंबरी, निरर्थक अस्पष्ट शब्दों और मुंबो-जंबो (mumbo-jumbo) का इस्तेमाल करते हुए कहा, “स्थानीय लोगों के लिए मुखर होना, भारतीय उद्यमिता की आंतरिक ताकत की पहचानऔर संवर्धन है, जो भूमि, श्रम, तरलता और कानूनों के विकट उलझनों से बंधन-मुक्त होने की प्रतीक्षा कर रहा है- जैसा मोदी जी ने कहा था।” (India Lockdown 4.0 Guidelines LIVE)

अब, इस शब्दाडंबर (bombast) का कोई क्या मतलब निकाले और क्या समझे? चारी ने बार-बार गांधी का उल्लेख किया है, तो मैं यह बताना चाहता हूँ कि गांधी के आर्थिक विचार पूरी तरह से प्रतिक्रियावादी (Reactionary) थे। वह आत्मनिर्भर ‘ ग्राम अर्थव्यवस्थाओं ‘ (Self Reliant Village Economies) का समर्थन करते थे, जैसे यह करना आज की आधुनिक दुनिया के अनुकूल या संभव है!

गांधी चरखा का गुणगान करते थे और वे अक्सर औद्योगिकीकरण (Industrialization) के खिलाफ बोलते थे, लेकिन आज की दुनिया में यह कहना मूर्खता है कि कपड़ा हाथ से बनाया जाना चाहिए, मिलों में नहीं। उनका ‘ट्रस्टीशिप सिद्धांत’ (Trusteeship Theory ) भी छल था। आज भारत के केवल 7 लोगों के पास ही उतनी दौलत है, जितनी  130 करोड़ की आबादी में से निचले पायदान के कुल 50 फीसदी लोगों के पास है! क्या ये 7 ‘ट्रस्टी’ जनता कल्याण के लिए काम कर रहे हैं?

इसके अलावा, यह जानना भी आवश्यक है कि केवल विकसित देश ही आत्मनिर्भर हो सकते हैं भारत की तरह अविकसित देश नहीं। उदाहरण के लिए, भारत को अपनी सेना के लिए लगभग सभी भारी हथियार जैसे कि टैंकों, तोपखाने, विमानों, पनडुब्बियों आदि को विदेशों से भारी कीमत पर खरीदने पड़ते हैं । पिछले साल, भारत ने अमेरिकी फर्म सिग सॉयर (Sig Sauer) से 700 करोड़ रुपये में 72,400 असॉल्ट राइफलें (Assault Rifles) खरीदी थीं।  (COVID-19 in India LIVE Updates)

इसलिए, वास्तव मेंआत्मनिर्भर बनने के लिए, हमें भारत को एक अविकसित देश से अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, जापान या चीन जैसे विकसित देश में बदलना होगा।

हम यह कैसे करें? मेरे विचार में समाधान तीव्र औद्योगिकीकरण (rapid industrialization) है, जो आधुनिक दिमाग वाले देशभक्त नेताओं के नेतृत्व में ही संभव है। यह केवल व्यापक और बड़े पैमाने पर परिचालन करने वाले उद्योग हैं जो गरीबी को खत्म कर सकते हैं , लाखों नौकरियां पैदा कर सकते हैं और हमारे लोगों के कल्याण के लिए आवश्यक धन उत्पन्न कर सकते हैं। लेकिन इस तरह के व्यापक औद्योगीकरण को कैसे संभव किया जा सकता है?

कोई संदेह नहीं कि स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरू के नेतृत्व में औद्योगीकरण कुछ हद तक बढ़ा था।कई स्टील प्लांटस स्थापित किए गए, आई.आई.टी और अन्य तकनीकी संस्थान खोले गए, लेकिन फिर भी आगे चलकर अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ठप हो गई। क्यों?

मेरे विचार में ऐसी कई शक्तिशाली बाहरी और आंतरिक ताकतें हैं जो हमें इससे आगे किसी भी तरह का औद्योगिकीकरण करने नहीं देंगी, और अगर हम प्रगति करना चाहते हैं तो हमें इनसे मुकाबला करना होगा।

मैं आपको समझाता हूं। श्रम की लागत (cost of labour) उत्पादन की कुल लागत (cost of production) का एक बड़ा हिस्सा है। इसलिए यदि श्रम की लागत और उत्पादन की लागत दोनों ही कम हैं तो, कोई भी अपने व्यापार प्रतिद्वंद्वी की अपेक्षा में वस्तु सस्ती कीमत पर बेच सकता है। बाजार में सभी एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी हैं और एक व्यापारी बंदूक या बम के इस्तेमाल से नहीं बल्कि अपनी वस्तुएं दूसरे के मुकाबले कम दाम पर बेच कर नष्ट करता है।

1949 में चीन में एक क्रांति हुई, जिसके बाद चीनी नेताओं ने तेजी से औद्योगीकरण किया और बड़े पैमाने पर औद्योगिक आधार (industrial base) स्थापित किया। यह विशाल औद्योगिक आधार और उपलब्ध सस्ते श्रम के इसी मिश्रण ने मिलकर, चीन को पूरी दुनिया में उपभोक्ता वस्तुओं (consumer goods) (और अब कई लग्ज़री सामान भी) का सबसे बड़ा उत्त्पादक बना दिया है। पश्चिमी सुपरमार्केट चीनी सामानों से भरे रहते हैं, क्योंकि ये अक्सर पश्चिमी देशों द्वारा निर्मित सामान की कीमत से आधे से भी कम कीमत पर बिकते हैं (क्योंकि पश्चिमी श्रम महंगा है)।

भारतीय श्रम चीनी श्रम से भी सस्ता है! इसलिए अगर हम एक विशाल औद्योगिक आधार स्थापित करें , तो हम चीनियों को भी पीछे छोड़ सकते हैं। फिर औद्योगिक देशों का महंगा माल कौन खरीदेगा?

इसलिए औद्योगिक देशों का अलिखित, अवर्णित नियम है: किसी भी कीमत पर भारत को किसी भी तरह का औद्योगीकरण करने न दें और इसे रोकने के लिए जो बन पड़ता है वो करें! भारतीयों में जाति, धर्म , या क्षेत्रों के आधार पर दरारें पैदा करें और लड़ायें।

यही कारण था कि अंग्रेज़ों ने गांधी और जिन्ना को अपने एजेंट की तरह इस्तेमाल कर बनावटी ‘दो राष्ट्र सिद्धांत’ (two nation theory) (हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग राष्ट्र हैं) का प्रतिपादन किया। विभाजन ‘दोहरे’ उद्देश्य से किया गया था (1) भारत को एक शक्तिशाली औद्योगिक विशाल देश के रूप में उभरने न दिया जाए , और इसके लिए हिंदू और मुसलमानों का एक दूसरे से लड़ते रहना ज़रूरी था (2) भारतीय उपमहाद्वीप (Indian subcontinent) विदेशी हथियार उद्योग (foreign arms industry) के लिए हमेशा एक बड़ा बाजार बना रहना चाहिए (भारत दुनिया में विदेशी हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार है, उन पर अरबों डॉलर खर्च करता है,वह पैसा जो हमारे गरीब लोगों के कल्याण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था)।

दुनिया के सभी औद्योगिक राष्ट्र जैसे इंग्लैंड, जर्मनी, अमेरिका, जापान, रूस, आदि ने ऐसे राजनीतिक नेताओं के नेतृत्व में अपना औद्योगीकरण किया, जो उद्योग के महत्व को समझते थे और अपने देश का तेजी से औद्योगिकीकरण करने के लिए दृढ़ संकल्पित थे। उदाहरण के लिए, 1868 में मीजी बहाली (Meiji Restoration) के बाद सत्ता में आए नेताओं ने जापान को तेजी से औद्योगिक बनाया (पश्चिमी देशों के तकनीकी विशेषज्ञों को काम पर रखा, अपने युवाओं को पश्चिमी तकनीकी संस्थानों आदि में भेजा ) । इसका परिणाम यह हुआ कि 15-20 वर्षों में जापान एक पिछड़े, सामंती (feudal) देश से एक आधुनिक औद्योगिक देश में बदल गया।

दूसरी ओर, भारत में हमने लोकतंत्र की संसदीय प्रणाली (parliamentary system of democracy) को अपनाया जो काफी हद तक जाति और सांप्रदायिक वोट बैंक (caste and communal vote bank) पर आधारित है। जातिवाद और सांप्रदायिकता सामंती ताकतें हैं, जिन्हें नष्ट करना होगा यदि भारत को प्रगति करनी है, लेकिन संसदीय लोकतंत्र इन्हें और मज़बूत करता है हमारे राजनीतिक नेताओं को देश में तेजी से औद्योगिकीकरण करने में कोई वास्तविक रुचि नहीं है, उनका उद्देश्य धन प्राप्त करना और चुनाव जीतना है। जिसके लिए उन्होंने जनता को ध्रुवीकृत (polarize) करने और जाति और सांप्रदायिक घृणा फैलाने की कला में महारत हासिल की है। फिर भारत उनके नेतृत्व में कैसे आगे बढ़ सकता है?

हमें अपनी सभी रचनात्मकता का उपयोग करना होगा और संसदीय लोकतंत्र का विकल्प बनाना होगा, एक राजनीतिक प्रणाली जो भारत को तेजी से औद्योगिकीकरण की ओर लेजाए। इसके लिए भारत में किसी प्रकार की क्रांति अनिवार्य है, हालांकि ऐसा कब होगा और यह किस रूप में होगा, इसका अनुमान लगाना असंभव है।

लेकिन जो बात निश्चित रूप से कही जा सकती है वह यह है कि यह क्रांति आधुनिक दिमाग, धर्मनिरपेक्ष और निस्वार्थ देशभक्त नेताओं के नेतृत्व में एक ऐतिहासिक एकजुट जनता के संघर्ष के माध्यम से ही होगी, जो सदियों से चले आ रहे संचित सामंतवाद और सामंती विचारों की गंदगी को दूर करने के लिए और राष्ट्र का तेजी से औद्योगिकीकरण करने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं! तभी भारत आत्म निर्भर बनेगा।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं। यहाँ व्यक्त विचार पूरी तरह उनके निजी है।)

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