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तीरंदाजः यादों की बारात

रिश्तों की राजनीति नायब होती है। उसके दांव-पेच ठीक हसीना की जुल्फ के खमो-पेच की तरह होते हैं, जिनको कभी सुलझाया नहीं जा सकता है। जब भी, जैसे भी वे बिखर जाएं उनको बिखर जाने देना चाहिए। यह रिश्तों की अदा है- इस अदा पर मर मिट कर ही हम रिवाजों से अपनी आशिकी का सबूत दे सकते हैं।

Author July 14, 2019 2:16 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अश्वनी भट्नागर

यादें बरातों जैसी होती हैं। जब आती हैं तो बड़े धूम-धड़ाके के साथ आती हैं। वे शोर भी करती हैं और रोमांचित भी। हर याद का एक दूल्हा होता है और उसके इर्दगिर्द नागिन डांस करते हुए कुछ हमसाये होते हैं। बरात का माहौल उन्हीं से बनता है। उनका काम दूल्हे को वेदी तक पहुंचाना होता है। फिर वे रात के अंधेरे में गायब हो जाते हैं। दूल्हा वहीं फंस जाता है और वह सुबह का तारा देख कर ही वेदी से उठ पाता है। यादों की बरात और भी लंबी हो जाती है, जब जिंदगी का बड़ा हिस्सा सार्वजनिक जीवन की चश्मदीदगी में बीता हो। ऐसे में अक्सर बरात बिन बुलाए मेहमान की तरह ड्योढ़ी पर आकर खड़ी होती है और अगर उसकी खातिर तवज्जो में कोई कमी-बेशी रह जाती है, तो उसमें मौजूद तमाम फूफा और सलहजें मुंह फुला कर फुंकार मारने लगते हैं। वैसे उनका नाराज होना वाजिब भी है। आखिर रिश्तों का मतलब ही क्या, अगर उन्हें एहसान बना कर दूसरे पर लादा न जा सके।

रिश्तों की राजनीति नायब होती है। उसके दांव-पेच ठीक हसीना की जुल्फ के खमो-पेच की तरह होते हैं, जिनको कभी सुलझाया नहीं जा सकता है। जब भी, जैसे भी वे बिखर जाएं उनको बिखर जाने देना चाहिए। यह रिश्तों की अदा है- इस अदा पर मर मिट कर ही हम रिवाजों से अपनी आशिकी का सबूत दे सकते हैं। वैसे भी आशिक का जनाजा धूम से निकलता है। बरात की धूम उससे अलग नहीं होती है। बरातें कांड भी कर देती हैं। वे माहौल बिगाड़ देती हैं, स्वाद को बेस्वाद कर देती हैं। अच्छे-भले लोगों का वह रूप दिखा जाती हैं, जिस पर वक्त मिट्टी डाल चुका होता है। अभी एकाध दिन पहले ही एक पूर्व प्रधानमंत्री, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश के बेहद गरीब इलाके से थे, के बारे में सोशल मीडिया पर फोटो के साथ टिप्पणी थी। उसमें लिखा था कि वे खेतों तक में जाने से नहीं हिचकते थे। बताया गया था कि उनका जीवन समाजवाद के आदर्शों के प्रति समर्पित था। वे पूरी तरह जमीन से जुड़े हुए थे और उन्हें गैर-स्वदेशी जीवन-शैली से बेहद परहेज था।

पर 1984 के चुनाव अभियान के दौरान एक शाम गांव में स्थित उनके घर पर जाने का संयोग हो गया था, जिसकी याद टिप्पणी पढ़ते ही एकाएक दिमाग खाने लगी। नेताजी अपना दिन भर का चुनावी कार्यक्रम खत्म कर के अपने दो सहयोगियों के साथ जाड़े की शाम को बैठे हुए थे। वे एक सहयोगी से बेहद खफा थे। ‘तुम क्या चाहते हो?’ उन्होंने ऊंची आवाज में पूछा, ‘मैं अपनी कमर तुड़वा लंू? तुम्हारी इस खचड़ा एंबेसडर में बैठ कर क्षेत्र की सड़कों के हर गड्ढे में गोते लगाऊं?’

‘नहीं नेताजी’, सहयोगी हमारी उपस्थिति की वजह से उनकी डांट पर कुछ हड़बड़ा गए थे। ‘तो फिर, क्या करोगे?’ नेताजी जारी रहे, ‘अभी तक तो कुछ किया नहीं तुमने! तुम्हारी नजर में तो हम सिर्फ एंबेसडर के ही लायक हैं। क्या हुआ उस मर्सिडीज का? जब हम आए थे तभी कहा था कि दिल्ली से मंगवा लो, पर तुम तो बस…’ नेताजी ने अपने को थोड़ा संभाला था।

‘मैंने आज ही टैक्सी वाले से बात की है। आपकी पसंदवाली मर्सिडीज कल सुबह दिल्ली से निकल लेगी।’ नेताजी ने लंबी सांस भरी। ‘चलो देखते हैं… वैसे तुम्हारी मंशा ठीक नहीं है।’ सहयोगी मुस्करा रहे थे। उन्होंने चुहल की, ‘हमने सोचा था कि आपकी छवि के साथ एंबेसडर ठीक चलेगी।’ ‘तुम ज्यादा मत सोचा करो… और सुन लो, वोट हनक पर पड़ते हैं। हमारी क्षेत्र में हनक है, इसलिए एंबेसडर नहीं चलेगी। ये गरीब गुरबा मर्सिडीज पर टूटते हैं, समझे… अगर तुम ठीक से उगाही किए होते तो हम हेलीकॉप्टर मंगाते… पर चलो, अब मर्सिडीज ही सही… कुछ आराम तो मिलेगा, नहीं तो ये गांव-देहात हमें तोड़ देगा।’
अपनी बात करते-करते उन्होंने अपने भतीजे को पुकार लगाई और अंग्रेजी में कहा, ‘हैव यू ड्रान माय बाथ। इज द वाटर वार्म एनफ? ऐंड पुट माय बाथिंग साल्ट्स इन इट… ज्यादा से… आॅयम वेरी टायर्ड।’

हम अवाक सब सुन रहे थे। बेहद गरीब परिवार से उपजा, गरीबों का मसीहा, समाजवादी क्रांति का सतत संघर्षशील सिपाही, अंग्रेजों के महंगे नमक से नहाने की तैयारी कर रहा था। गरीबों की राजनीति ने उसे इतना मोहताज कर दिया था कि हेलीकॉप्टर की जगह उसे मर्सिडीज से काम चलाना पड़ रहा था। हमारे अंदर का वोटर उनकी दशा पर बेहद शर्मिंदा हुआ था।
एक याद अभी अपना नागिन डांस पूरा भी नहीं कर पाई थी कि दूसरी रुदाली की तरह फूट पड़ी। तत्कालीन प्रधानमंत्री के साथ हम जापान के दौरे पर थे। ओसाका होते हुए तोक्यो पहुंचे थे। उस शाम प्रधानमंत्री का कोई निर्धारित कार्यक्रम नहीं था। विदेश मंत्रालय के अफसरों ने पत्रकार दल को सुझाव दिया कि अगर वे तोक्यो की रंगीनियां देखना चाहते हैं, तो रूपानगी इलाके में घूम आएं।
टैक्सी ने हमको वहां के मुख्य चौराहे पर उतार दिया। हम लोग रूपानगी के रूप को निहारने की तैयारी भी नहीं कर पाए थे कि सड़क के पार से किसी ने हमारा नाम पुकारा। दूर एक आदमी जोर से हाथ हिला रहा था और हमें सड़क पार अपने पास बुला रहा था। हमें हैरत हुई। तोक्यो के हम किसी को नहीं जानते थे। पर हमने सड़क पार कर ली।
उस आदमी ने लपक कर प्रणाम किया और खैरियत पूछी। हमने उसका चेहरा गौर से देखा, पर कुछ याद नहीं आया। वह समझ गया। ‘मैं आपको दूर से पहचान गया था… मैं कई बार आपके घर आया हूं, मालवीय नगर में।’ ‘किस वजह से?’ हमने कुरेदा। ‘सर आपको प्रेस नोट देने आता था। आपको याद नहीं है… मेरा घर आपके घर के पास ही था, इसलिए बजाय आपके आॅफिस जाने के, वहीं दे देता था।’
‘किसके प्रेस नोट?’ हमने फिर पूछा। ‘सर, मैं मुख्यमंत्री का निजी पीआरओ था।’ कौन से मुख्यमंत्री?’ ‘वही चाल चरित चेहरे वाले’, उसने हंसते हुए कहा। ‘पर, तुम दिल्ली छोड़ कर यहां कैसे? करते क्या हो?’

‘वेश्याओं का दल्ला हूं।’
‘क्या?’ हम चौंक गए।
उसकी बेबाकी ने हमें हतप्रभ कर दिया था। अपनी बात कह कर वह बेहद संजीदा हो गया था। ‘सर, एक दिन मैंने फैसला किया कि मैं घटिया दंड फंद नहीं करूंगा। जो करूंगा ईमानदारी का करूंगा… नेताओं की दलाली छोड़ दी, यहां की पकड़ ली। साफ सुथरा धंधा है ये। कम से कम इनका कोई ईमान धर्म तो है। इनके साथ खुश हूं। मैं तो दिल्ली में बर्बाद ही हो जाता… शुक्र है भगवान का, वक्त रहते अक्ल आ गई और नेताओं का साथ छोड़ इनको अपना लिया।’

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