ताज़ा खबर
 

दांव पर लगी यूरोप की एकता

यूरोपीय संसद ने हंगरी पर यूरोपीय संघ के मौलिक मूल्यों का उल्लंघन करने के आरोप में उसके खिलाफ यूरोपीय संधि के आर्टिकल 7 को सक्रिय कर दिया।

हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान देश को जिस रास्ते पर ले जा रहे हैं, उस पर भी यूरोपीय संघ आंखें नहीं मूंद सकता. यूरोप में धुर दक्षिणपंथी सियासत के सितारे के तौर पर उभर रहे ओरबान 2010 से हंगरी में सत्ता संभाले हुए हैं. इसी साल अप्रैल में उन्होंने लगातार तीसरी बार चुनाव जीता है।

अशोक कुमार, डॉयचे वेले, बॉन, जर्मनी
पिछले दिनों फ्रांस के शहर स्ट्रासबुर्ग में यूरोपीय संसद की बैठक में वह हुआ, जो अब से पहले कभी नहीं हुआ था। 28 देशों के प्रतिनिधियों वाली इस संसद ने अपने ही एक सदस्य देश को सजा देने की तरफ पहला कदम बढ़ाया। यह देश है हंगरी जिसके प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान कई साल से यूरोपीय संघ की नाक में दम किए हुए हैं। यूरोपीय संसद ने हंगरी पर यूरोपीय संघ के मौलिक मूल्यों का उल्लंघन करने के आरोप में उसके खिलाफ यूरोपीय संधि के आर्टिकल 7 को सक्रिय कर दिया। इसका मतलब है कि अगर हंगरी की सरकार पर मनमाने तरीके से जजों को हटाने, मीडिया और नागरिक आजादी को दबाने और गैर सरकारी संगठनों को निशाना बनाने जैसे आरोप जांच में सही पाए गए तो उस पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं और उसे यूरोपीय संघ में वोटिंग का अधिकार भी गंवाना पड़ सकता है।

सवाल यह है कि अपने ही एक सदस्य देश के खिलाफ यूरोपीय संघ इस हद तक जाने के लिए क्यों मजबूर हुआ है। बेशक इस कदम से खुद यूरोपीय संघ की एकता दांव पर लगती है, लेकिन हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान देश को जिस रास्ते पर ले जा रहे हैं, उस पर भी यूरोपीय संघ आंखें नहीं मूंद सकता। यूरोप में धुर दक्षिणपंथी सियासत के सितारे के तौर पर उभर रहे ओरबान 2010 से हंगरी में सत्ता संभाले हुए हैं. इसी साल अप्रैल में उन्होंने लगातार तीसरी बार चुनाव जीता है।

HOT DEALS
  • Honor 7X 64 GB Blue
    ₹ 15398 MRP ₹ 17999 -14%
    ₹0 Cashback
  • Lenovo Phab 2 Plus 32GB Gunmetal Grey
    ₹ 17999 MRP ₹ 17999 -0%
    ₹0 Cashback

शरणार्थियों से उनकी नफरत जगजाहिर है और वह हंगरी में अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों को शांत कर देना चाहते हैं।  वे उदारवादी नहीं बल्कि अनुदारवादी लोकतंत्र की
वकालत करते हैं। यूरोपीय संघ के नीति निर्माता अगर सीरिया और इराक जैसे देशों से आए लाखों शरणार्थियों पर कोई व्यापक नीति नहीं तय कर पाए हैं तो इसकी एक बड़ी वजह विक्टर ओरबान हैं। वह 2015 के शरणार्थी संकट के दौरान यूरोप में आए शरणार्थियों को अपने देश में जगह देने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं। उनकी सरकार ने तो ऐसा कानून बनाया है कि अगर कोई वकील या सामाजिक कार्यकर्ता शरणार्थियों की मदद करता है तो उसे आपराधिक मामले में गिरफ्तार कर लिया जाए. ओरबान सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच हंगरी से ऐसी खबरें भी लगातार आती रही हैं कि सरकार अदालतों और चुनावी प्रणाली पर भी दबाव डाल रही है।

इसीलिए यूरोपीय संघ को चिंता है कि उसके एक सदस्य में कानून का राज है या नहीं। यूरोपीय संसद में 197 के मुकाबले 448 सांसदों ने हंगरी के खिलाफ जांच शुरू करने के लिए आर्टिकल 7 सक्रिय करने के लिए वोट दिया और इनमें उनकी अपनी पार्टी के यूरोपीय सहयोगी दलों के सदस्य भी शामिल थे। विक्टर ओरबान सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। यूरोपीय संसद में मिली हार को वह बड़ी जीत के तौर पर पेश करने में कमी नहीं छोड़ेंगे। अपने देश के लोगों से उन्होंने कहा कि आर्टिकल 7 से कोई प्रतिबंध नहीं लगेगा और इसीलिए खतरे वाली कोई बात नहीं है।

उन्होंने 2013 की एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया जिसमें यूरोपीय संघ ने हंगरी के संविधान में किए गए विवादास्पद बदलावों की निंदा की थी. ओरबान के मुताबिक, तब भी कुछ नहीं हुआ था और अब भी कुछ नहीं होगा। अगले साल यूरोपीय संसद के चुनाव होने हैं। उससे पहले हंगरी के खिलाफ आर्टिकल 7 को सक्रिय करने के यूरोपीय संसद के फैसले ने ओरबान को राष्ट्रीय संप्रभुता का चैंपियन बना दिया है।  वह खुद को ऐसे नेता के तौर पर पेश करने में कसर नहीं छोड़ेंगे जो अपने राष्ट्रीय हितों के लिए कहीं भी नहीं झुकता है और ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के रिमोट कंट्रोल से नियंत्रित होने को तैयार नहीं है। घरेलू राजनीति में ही नहीं, यूरोप भर की दक्षिणपंथी सियासत में भी उनका कद बढ़ेगा। यूरोप के जिस भी देश में चुनाव हो रहे हैं, वहां शरणार्थियों और विदेशियों का विरोध करने वाली पार्टियों का समर्थन बढ़ रहा है। अगले साल जब नई यूरोपीय संसद अस्तित्व में आएगी तो उसमें भी बड़ी संख्या में दक्षिणपंथी पहुंचेंगे।  ऐसे में हो सकता है कि नई यूरोपीय संसद हंगरी के खिलाफ जांच ही बंद करने का फैसला ले ले। पोलैंड और चेक रिपब्लिक जैसे देश पहले ही हंगरी के पाले में खड़े हैं. उन्होंने कहा है कि वे हंगरी के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कदम उठाने पर वीटो करेंगे। पोलैंड के खिलाफ भी पिछले साल विवादित न्यायपालिका सुधारों को लेकर यूरोपीय आयोग ने आर्टिकल 7 सक्रिय किया था।

लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब यूरोपीय संसद में वोटिंग के जरिए हंगरी के खिलाफ आर्टिकल 7 सक्रिय किया गया है। यूरोपीय संघ के किसी सदस्य की वोटिंग के अधिकार को तभी खत्म किया जा सकता है, जब बाकी सदस्य देश एकमत से यह फैसला करें. ऐसे में पोलैंड और चेक रिपब्लिक का वीटो करने का फैसला ओरबान की बात को सही साबित करता है कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन यूरोपीय संघ के नीति निर्माता जरूर इस पूरे हालात से घबराए हुए हैं। इससे ना सिर्फ यूरोपीय एकता का सपना तार तार हो रहा है, बल्कि कई जानकार इसके आर्थिक दुष्परिणामों की भी चेतावनी देते हैं। उनका कहना है कि यूरोपीय संघ का झगड़ा यहां होने वाले निवेश को प्रभावित कर सकता है। लेकिन आग से खेलने वाले ओरबान जैसी दक्षिणपंथी नेता इसकी ज्यादा चिंता नहीं करते। वे तो भावनाएं भड़का कर लोगों का समर्थन हासिल करने में उस्ताद हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App