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तीरंदाजः सहमा हुआ अमेरिकी समाज

वास्तव में अमेरिका का ज्यादातर समाज आज बेहद सहमा हुआ है। उदारवादी दक्षिणपंथियों से सहमे हुए हैं तो दक्षिणपंथी उदरवादियों से सशंकित हैं। दो एजेंडे- डेमोक्रेट और रिपब्लिकन, जो अमेरिका की विविधता को परिभाषित करते थे, आज अपने समर्थकों को वैचारिक रूप से लज्जित कर रहे हैं।

Author Updated: September 22, 2019 2:38 AM
ट्रम्प के ‘लेट्स मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ नारे का मतलब सिर्फ एक ही रह गया है- ‘जो गोरा नहीं है, क्रिश्चियन नहीं है और जो ट्रम्प नीति का समर्थक नहीं है, वह देश और समाज का अपराधी है।’

अमेरिका के मध्य पश्चिमी इलाके में प्रवास जारी है। इस देश के पूर्वी तट, यानी वाशिंगटन, न्यूयॉर्क आदि की राजनीतिक गहमगहमी से यह इलाका दूर है। सड़क से बॉस्टन या न्यू जर्सी जैसे शहरों तक जाने में सोलह घंटे लगते है। हवाई मार्ग से भी जाने के लिए सीधी उड़ानें कम हैं। अमूमन पांच घंटे लग जाते हैं। पश्चिमी तट, जहां पर लॉस एंजेल्स, सैन फ्रांसिस्को स्थित है, का भी कमोबेश इतना ही फासला है। एक तरह से केंटकी, इल्लिनोई, इंडिआना, टेनेसी आदि पूर्वी अमेरिका के पश्चिमी छोर पर है। शिकागो इस इलाके का सबसे बड़ा शहर है और एटलांटा भी।

केंटकी राज्य अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की जन्मस्थली है। छोटी-सी लकड़ी की झोपड़ी, जिसमें उनका जन्म 1806 में हुआ था, आज भी मेमोरियल के रूप में सुरक्षित है। लिंकन का नाम इस देश में बड़े आदर से लिया जाता है। अमेरिका को जोड़ने और उसे यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका का रूप देने में उनका उल्लेखनीय योगदान था। साथ में दास प्रथा का समाप्त करने के लिए उन्होंने ऐतिहासिक कदम उठाए थे। वे समानता, बंधुत्व और स्वतंत्रता के मूल मूल्यों के महानायक थे। उनकी दूरगामी सोच और राजनीतिक बीनाई अमेरिकी मूल्यों की आधारशिला है। लिंकन रिपब्लिकन पार्टी से संबद्ध थे। डोनाल्ड ट्रम्प भी इसी पार्टी के हैं।

केंटकी का सबसे बड़ा शहर लुईविल है। अमेरिका के बड़े शहरों की सूची में इसका सोलहवां नंबर है। विश्व प्रसिद्ध बड़े कॉरपोरेट हाउस जैसे यू, पीएस, यम, केंटकी फ्राइड चिकन (केएफसी), हुमाना इंश्योरेंस आदि के मुख्यालय यहां पर स्थित है। जैक डैनिएल व्हिस्की भी यहीं की ईजाद है। यहां का तंबाकू दुनिया भर में मशहूर है और यहां के घोड़े भी। केंटकी की डर्बी विश्व प्रसिद्ध है, ठीक वैसे ही जैसे बॉक्सिंग में यहां के मोहम्मद अली प्रसिद्ध थे। यह एक अमीर शहरों में से है, जहां खानदानी रईस अपने ऐश्वर्य का भोग शालीनता से करते रहे हैं। लुईविल में न तो न्यूयॉर्क जैसी अफरातफरी है और न ही कैलिफोर्निया की सिलिकॉन वैली जैसी संभावनाएं। शहर पूरी तरह से एक शांत और समृद्ध जीवन शैली के लिए व्यवस्थित है।

पर पिछले दो साल के अंदर ही इस शहर और केंटकी राज्य में बेचैनी उत्पन हो गई है। एकात्मता के प्रतीक लिंकन की जन्मस्थली विभाजित होती चली जा रही है। चाहे वह प्रवासी भारतीय हो या खानदानी केंटकीवासी या फिर अश्वेत नागरिक, सब डोनाल्ड ट्रम्प के व्याख्यानों से उद्वेलित हैं। पढ़े-लिखे उच्च वर्ग के लोग अचानक अपने उदार विचारों और जीवनशैली को खत्म होता देख रहे हैं। ट्रम्प उवाच से प्रेरित श्वेत खेतिहर मजदूर और श्रमिक कभी धर्म के नाम पर तो कभी रंग की दुहाई देकर आक्रामक होते चले जा रह हैं। हर स्तर पर संवाद खत्म हो गया है और वाद अपने पूरे खुमार पर है।

ट्रम्प के ‘लेट्स मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ नारे का मतलब सिर्फ एक ही रह गया है- ‘जो गोरा नहीं है, क्रिश्चियन नहीं है और जो ट्रम्प नीति का समर्थक नहीं है, वह देश और समाज का अपराधी है।’ लुईविल के एक पुराने निवासी के अनुसार, ‘राज्य के बहुत सारे गिरजाघरों में अचानक ऐसे पादरी प्रकट हो गए हैं, जिनका प्रवचन दो सौ साल पुराने पादरियों जैसा है। वे हाथ में जहरीले सांप लेकर श्रद्धालुओं को नर्क का भय दिखाते हैं, जादू-टोना दिखा कर विज्ञान को मुंह चिढ़ाते हैं और बाइबिल के जमाने के उदाहरण देकर गांव-देहात में रह रहे गोरों को उनके ‘स्वर्णिम काल’ में लौटने के लिए प्रेरित करते हैं।’

‘ऐसा लगने लगा है जैसे हम आज की रोशन खयाली छोड़ कर मध्यकालीन अंधेरे से युक्त अमेरिका की तरफ बढ़ने लगे हैं। अपने देश में ही डर लगने लगा है। मैंने अपने साठ साल के जीवन में कभी भी ऐसा भयावह दुस्साहस नहीं देखा है। मुझे अपने क्रिश्चियन होने पर शक होने लगा है।’ उन्होंने अफसोस से सिर झुकाते हुए कहा- ‘अपने विवेक पर शक होने लगा है। ऐसा लगने लगा है कि मैं ‘एलिस इन वंडरलैंड’ कहानी का पात्र बन गया हूं. जो एक लंबे अंधेरे गड्ढे में गिरता चला जा रहा है।’
शहर से कुछ दूर ग्रामीण क्षेत्र शुरू हो जाता है। कुछ गांवों में लोग खेती करते हैं (जैसे कि लिंकन के गांव में) तो आगे चल कर अधिकतर लोग कोयले की खदानों में मजदूरी करते हैं। अधिकतर खदानें बंद हो चुकी हैं। मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। ऐसे ग्रामीण अंचलों में धार्मिक और सामाजिक पुनरुत्थानवाद हावी है। रूढ़िवाद, रंगभेद और दक्षिण पंथी विचारधारा अपने चरम पर है। ऐसा लगता है जैसे पूरा ग्रामीण समाज भयभीत होने की वजह से आक्रामक हो गया है और उसके आक्रमण का निशाना उदारवादी विचारधारा बन गई है। किसी भी रूप की उदारता को वह शत्रु भाव से देखने लगा है।

वास्तव में अमेरिका का ज्यादातर समाज आज बेहद सहमा हुआ है। उदारवादी दक्षिणपंथियों से सहमे हुए हैं तो दक्षिणपंथी उदरवादियों से सशंकित हैं। दो एजेंडे- डेमोक्रेट और रिपब्लिकन, जो अमेरिका की विविधता को परिभाषित करते थे, आज अपने समर्थकों को वैचारिक रूप से लज्जित कर रहे हैं। रिपब्लिकन नेतृत्व का बड़बोलापन और डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं की उदासीनता आम शहरियों का मनोबल तोड़ रही है। रिपब्लिकन पार्टी का एक वर्ग बेहद हर्षित है कि अमेरिका फिर से महान बनने की राह पर लंबे डग भर रहा है। हर बातचीत में वे बताते हैं कि जब से ट्रम्प राष्ट्रपति बने हैं, तब से विश्व का हर राष्ट्र उनके आगे नतमस्तक हो गया है। वे ट्रम्प को ऐसा सुपरमैन मानते हैं, जिसने उत्तर कोरिया और चीन जैसी शक्तियों को नाको चने चबवा दिए हैं। वे जहां जाते हैं- देश में या विदेश में, उनका विजयघोष स्वयं होने लगता है। उनके अकेले की वजह से महज तीन साल में ही अमेरिका ‘विश्व गुरु’ बन गया है। ट्रम्प का जयगान वे एक सांस में करते हैं और तथ्यपरख दलीलों के आते ही आंखें तरेरने लगते हैं।

दूसरी तरफ, डेमोक्रेट खेमा उद्देश्यविहीन हो चुका है। उसकी समझ में नहीं आ रहा है कि अतर्क या कुतर्क से खिलाफ वे क्या तर्क रखें। लगातार प्रहार की वजह से उसकी सोच को लकवा मार गया है। उसकी निशब्दता से आम नागरिक स्तब्ध है। उसके सामने एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति उत्पन हो गई है। उसकी समझ में नहीं आ रहा है कि अमेरिका को फिर से महान बनाने के लिए ऐसी स्थिति क्या एक ऐतिहासिक जरूरत है? या फिर यह सिर्फ एक राजनीतिक छलावा है? वे अपना सब कुछ खो रहे हैं या फिर जो गैरजरूरी था, उसको हटा कर जरूरी को प्राप्त कर रहे हैं? शायद यह ऊहापोह अमेरिका को वैसा अमेरिका अब नहीं रहने देगी, जैसा उसे हम अब तक जानते थे।

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