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संदर्भः पलायन विकल्प नहीं

पलायन से पहले सोचना होगा कि क्या प्रकृति ने कभी किसी को सिर्फ आसान रास्ते पर चल कर जीवन जीने का विकल्प दिया है? क्या जीवन का मूल्य इतना ही है? ऐसा मुमकिन ही नहीं है कि जो व्यक्ति लगातार आगे बढ़ता रहे, कोई परेशानी उसका मार्ग अवरुद्ध करने न आई हो। फिर वह इंसान जो समाज की तरक्की में अपना योगदान देने जा रहा है, उसे परेशानियां नहीं मिलेंगी, यह असंभव है।

Author Updated: September 22, 2019 3:06 AM
किसी के भाग जाने से परेशानी खत्म नहीं होती, वह वहीं रहती है, बल्कि व्यक्ति विशेष के पलायन के बाद जो लोग पीछे रह जाते हैं, उन्हें उस ‘विकट’ परेशानी को भी झेलना होता है और जो व्यक्ति अपने स्थान को खाली छोड़ गया है, उस व्यक्ति के ‘अपनों’ को अपने बहुत खास रिश्ते से जुड़ी भावनाओं, सामाजिक स्थिति, आर्थिक परेशानियों और अन्य अनेक तकलीफों से भी जूझना होता है।

वंदना यादव

संयुक्त परिवारों से एकल परिवार की ओर बढ़ते हुए हम किस दौर में आ पहुंचे हैं जहां परिवार के साथ रहने के बावजूद व्यक्ति ‘एकल’ हो गया है! व्यस्तताओं से भरे जीवन में परिवार का हर सदस्य अपनी जीवनचर्या में डूबा है और अपने-अपने संघर्षों से मुकाबला कर रहा है। ऐसे में किसी के पास वक्त नहीं है। आधुनिक समाज में परिवार नाम की संस्था गौण होती जा रही है। परिवार का वह सदस्य जो पिछड़ रहा है या जिसे मानसिक परेशानी ने घेर लिया है, क्या उसके लिए परिजन थोड़ा-सा भी वक्त नहीं निकाल सकते? यह गंभीर सवाल है जिस पर समाज को सोचना होगा।
समाज का वह पहला व्यक्ति जिसकी वजह से समूचा देश और सभ्यता भरपेट रोटी खाती है, वही किसान जब आत्महत्या करता है तब उसे गरीबी का नाम दे दिया जाता है। गरीबी उसका निजी चुनाव नहीं है। यह विकास की दौड़ में उसका पिछड़ना है, ऐसा विकास जो हाड़तोड़ मेहनत के बाद उसे सुख के साथ दो वक्त की रोटी तक मुहैया नहीं करवा पा रहा है। उसकी हार किसी से छिपी नहीं रहती, वह सबके बीच हर समय फटे कपड़ों से झांकती भूख से बेजार, इलाज के अभाव में मरती दिखती रहती है, फिर भी सामाजिक स्तर पर यह पराजय नकार दी जाती है। उस आत्महत्या को हम ‘व्यक्तिगत आत्महत्या’ करार दे देते हैं।

शहरी समाज का वह व्यक्ति जो हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है, जिसका बहुत से लोगों के साथ मिलना-जुलना होता है, वह जरूरत के समय मददगार होता है या जिसकी वजह से रोजगार पाकर कई घरों में दोनों वक्त चूल्हा जलता है, जब वह पिछड़ने लगता है तब भी क्या किसी को खबर नहीं होती? परेशानी के समय सामाजिक जीवन जीने वाले लोगों की मानसिकता कैसे छिपी रह जाती है? क्या हम पारिवारिक स्तर पर और सामाजिक जीवन में इतने आत्मकेंद्रित हो गए हैं कि हमें आसपास की परेशानियां दिखाई ही नहीं देतीं? अगर यही सच है तो यकीनन यह स्थिति बहुत भयानक है। हम विस्फोट की ओर बढ़ रहे हैं। इससे पार पाने के उपाय हमें ही करने होंगे। हमें हर हारते हुए को संभालने वाला हाथ बनना होगा। गिरते को थामने वाला और आघात झेलने वाले मनुष्य के लिए विश्वसनीय चरित्र हमें अपने अंदर गढ़ना होगा, जिससे घबरा कर पीछे हट रहा व्यक्ति पलायन से पहले अपने आसपास के किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचे जरूर। एक ऐसा सामाजिक या पारिवारिक व्यक्ति जो उस थके इंसान को जीवन की ओर वापस लौटने का कारण बनेगा, उसे ही यह पहल करनी होगी।

आपाधापी भरे जीवन में हर व्यक्ति के अपने संघर्ष हैं, जिनसे वह जूझ रहा है। कम समय में मंजिल तक पहुंचने की बैचेनी से मुकाबला कड़ा होता जा रहा है। ‘हार ना जाऊं’ का डर दिमाग पर हावी हो रहा है। यह अपने भीतर बैठा भय है जिसे हमने चींटी जितने आकार को बढ़ा कर हाथी जितना विशाल बना लिया है। यह किसी लिहाज से ठीक नहीं है।

देर तक मोबाइल देखता सातवीं-आठवीं का बच्चा, माता-पिता की डांट से नाराज होकर फंदे पर झूल जाने की राह चुन लेता है। युवा होती उम्र में युवक-युवती का एक-दूसरे की अनदेखी करना बर्दाश्त नहीं होता और मौत को गले लगा लेना जैसा रास्ता उन्हें आसान लगने लगता है। पति-पत्नी की आपसी टकराहट में दो समझदार वयस्क, परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी तक से मुंह मोड़ कर क्षणिक क्रोध के आवेग में जान देने का फैसला कर लेते हैं। व्यवसाय या नौकरी के दबाव न झेल पाने के चलते ऊंची इमारत से कूद कर मौत को गले लगा लेने या पुल से नदी की गहराई में जीवन को डुबा देने जैसी घटनाएं अब रोजाना की नियति बन गई हैं। सवाल है कि हम जा किस ओर रहे हैं? क्या सच में जीवन इतना पेचीदगियों भर गया है? क्या परेशानियों से बाहर आने के सारे रास्ते बंद हो गए हैं?

वर्तमान समय में हमारी सामाजिक सोच क्या इतनी नकारात्मक हो गई है या हम निराशा से घिर गए हैं? ऐसा कैसे हो सकता है कि जीवन से आशाएं रूठ जाएं और किसी तरह के सुधार की गुंजाइश ही न रहे। हालात इतने खराब कभी नहीं होते कि उन्हें ठीक न किया जा सके। स्थिति का डट कर मुकाबला करने से हालात बदलने की पूरी उम्मीद रहती है और अगर स्थिति नहीं बदली तो परेशानी से निकलने का कोई और रास्ता जरूर निकलेगा। पलायन विकल्प नहीं होता। किसी के भाग जाने से परेशानी खत्म नहीं होती, वह वहीं रहती है, बल्कि व्यक्ति विशेष के पलायन के बाद जो लोग पीछे रह जाते हैं, उन्हें उस ‘विकट’ परेशानी को भी झेलना होता है और जो व्यक्ति अपने स्थान को खाली छोड़ गया है, उस व्यक्ति के ‘अपनों’ को अपने बहुत खास रिश्ते से जुड़ी भावनाओं, सामाजिक स्थिति, आर्थिक परेशानियों और अन्य अनेक तकलीफों से भी जूझना होता है।

पलायन से पहले सोचना होगा कि क्या प्रकृति ने कभी किसी को सिर्फ आसान रास्ते पर चल कर जीवन जीने का विकल्प दिया है? क्या जीवन का मूल्य इतना ही है? ऐसा मुमकिन ही नहीं है कि जो व्यक्ति लगातार आगे बढ़ता रहे, कोई परेशानी उसका मार्ग अवरुद्ध करने न आई हो। फिर वह इंसान जो समाज की तरक्की में अपना योगदान देने जा रहा है, उसे परेशानियां नहीं मिलेंगी, यह असंभव है। सच्चाई यह है कि जो व्यक्ति सफलता की जितनी सीढ़ियां चढ़ता है, उसे उतनी ही कठिनाइयों से मुकाबला करना पड़ता है। सच यह है कि सफलता उन्हें ही मिलती है जो उसको पाने लिए कठोर परिश्रम करते हैं, सुविधाओं को छोड़ कर कठोर मार्ग चुनते हैं और सफल होने के लिए असफलताओं से सबक लेकर अपने कदम लगातार आगे बढ़ाते हैं।

कोचिंग कक्षाओं में सहपाठियों के साथ प्रतिस्पर्धा के चलते माता-पिता के सपनों को पूरा करने के दबाव में विद्यार्थी जीवन में भविष्य की कल्पना करते अधिकतर बच्चों के मन में घबराहट होती है। उनके मन में पिछड़ जाने का डर कभी-कभी खौफ पैदा कर देता है। ऐसे समय में परिवार का भावनात्मक साथ, स्कूल-कॉलेज में, कोचिंग सेंटर में मनोचिकित्सक की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। बच्चे जब पलायन की ओर कदम बढ़ा रहे होते हैं, उसी समय किसी अपने का संबल उन्हें भयंकर भूल करने से रोक सकता है। परंतु सवाल यह है कि सही समय पर वह साथ मिले कैसे?

युवा डॉक्टरों का मौत को गले लगाना क्या आसान है? जो युवा पढ़ाई के समय की प्रतिस्पर्धा झेल गए, उन्हें नौकरी का दबाव या साथी कर्मचारियों का व्यवहार इतना विचलित कर देता है कि वे अपनी जान देने से भी नहीं हिचकिचाते। इसका मतलब यह है कि हम ध्यान रखें कि कहीं हम ही सामाजिक स्तर पर हालात खराब करने वालों की गिनती में तो नहीं आ रहे या हमारे आसपास का माहौल किसी के लिए धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र या आर्थिक स्तर पर पेचीदगियां तो खड़ा नहीं कर रहा। स्थिति जो भी हो, सुधरेगी तभी जब हम चौंकन्ने रहेंगे। यह हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है कि हम इस तरह के पलायन को रोकने में अपने-अपने स्तर पर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएं। हम समाज को आत्महत्या से हटा कर सकारात्मकता और तरक्की की ओर ले जाएं।

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