दल बदल विरोधी कानून की प्रासंगिकता पर उठते सवाल

दल बदल का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना समय हमें अंग्रेजों से आजादी मिलकर हो चुका है। स्वतंत्रता के बाद से राजनीतिक दल बदलने की आदत शुरू हो गई थी, जो अब तक जारी है। इससे बचने के लिए कानून भी बनें लेकिन नतीजा कुछ नहीं आया।

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कर्नाटक में दल बदल की वजह से एचडी कुमारस्वामी को अपना पद गंवाना पड़ा था। Photo Source – PTI

थोड़ा पीछे चलते है। या यूं कह लीजिए कि आजादी के तुरंत बाद के दौर को टटोलने की कोशिश करते है। 1948 ईसवी की बात है। कांग्रेस समाजवादी दल ने अपने सारे विधायकों को अपने पद से इस्तीफ़ा देकर फिर से चुनावी मैदान में उतरने को कहा। इसके पीछे की मुख्य वजह सभी विधायकों द्वारा कांग्रेस पार्टी छोड़ने का फैसला था। इस फैसले को सर्वसम्मति से मानने में आचार्य नरेंद्र देव जैसे दिग्गज नेता भी शामिल थे। पूरे राजनीतिक इतिहास में यह घटना आज भी एक मिसाल के रूप में पेश किया जाता है। एक दौर वह भी था जब दल बदल विरोधी कानून के बिना ही राजनेताओं की सत्यता, संबलता और दृढ़ता उजागर होती थी। इसके बाद शायद ही ऐसा कोई उदाहरण भारतीय राजनीति के इतिहास में देखने को मिलता है।

ऐसे बनी ‘आया राम और गया राम’ कहावत
अब आपको 1960 से 1972 ईसवी के दौर में ले चलते है। यह दल बदल करने के लिहाज से सबसे स्वर्णिम दौर माना जाता है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि साल 1967 से लेकर 1971 के बीच कुल 142 सांसदों ने दल बदल किया। इतना ही नहीं इसी दौर में कुल 1,969 विधायकों ने दल बदल कर इतिहास रच दिया। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इस दल बदल की वजह से कुल 32 चुनी हुई सरकारों को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। आपने ‘आया राम और गया राम’ वाली कहावत भी जरूर सुनी होगी। अक्टूबर 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने 15 दिनों के भीतर 3 बार पार्टी बदला। वह पलवल विधान सभा क्षेत्र से स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुन कर सदन पहुंचे थे। यह वाकया भी इतिहास के पन्नों में जुड़कर रह गया।

लालच देकर सरकार गिराई
ऐसी कई सारी कहानियां और किस्से भारतीय राजनीति के इतिहास में दर्ज है जो कहीं न कहीं भारतीय संविधान और कानून को तार तार करने के लिए काफी है। आप बात चाहें 1967 में मध्य प्रदेश में गोविंद नारायण सिंह सरकार को गिराने की करें या फिर 1980 में हरियाणा में पूरी भजनलाल कैबिनेट का कांग्रेस में शामिल होने की करें। प्रत्येक पहलुओं पर अगर ध्यान दिया जाएं तो कहीं न कहीं दल बदल का इतिहास काफी कलंकित रहा है।

सबसे शर्मनाक हरकत तो तब हुई जब साल 1983 में कांग्रेस को शिकस्त का सामना करना पड़ा और एनटी रामाराव मुख्यमंत्री के रूप में चुनकर सदन पहुंचे। अगले ही साल साल 1984 में रामाराव के विदेश जाने पर कांग्रेस ने उनकी पार्टी के एक मंत्री को मुख्यमंत्री पद का ऑफर देकर तोड़ दिया और हद तो तब हो गई जब वहां के तत्कालीन राज्यपाल ने आनन फानन में मुख्यमंत्री पद की शपथ भी दिलवा दी। इससे न सिर्फ दल बदल करने वाले जनप्रतिनिधियों पर सवाल उठा बल्कि राज्यपाल जैसी मर्यादित और संवैधानिक पद की गरिमा को भी ठेस पहुंचा। हालांकि फिर कुछ दिनों के बाद रामाराव ने राष्ट्रपति के सामने सारे विधायकों की परेड करवाई और फिर से जाकर उनकी सरकार बन पाई। ऐसी कई घटनाएं इतिहास के पन्नों में दर्ज है।

दल-बदल प्रथा पर कानून अंकुश का प्रयत्न
साल 1985 को भी याद करना लाजमी होगा जब राजीव गांधी की सरकार ने 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से दल बदल विरोधी कानून को पारित कर एक नया इतिहास रचा। साथ ही संविधान में 10वीं अनुसूची को भी जोड़ा गया। इस कानून के तहत देश में आग की तरह से फैल चुकी दल-बदल प्रथा को रोकना था। कुल मिलाकर कई सारे प्रावधानों को मंजूरी दी गई। एक प्रावधान ऐसा था जिसपर बहुत सवाल भी खड़े किए गए। दल-बदल विरोधी कानून के अंतर्गत एक तिहाई सदस्य साथ में दल बदल कर सकते थे। इसके बाद भी दल बदल प्रथा पर कुछ खास अंकुश नहीं लग पाया। इस कानून में लोकसभा और विधानसभा के अध्यक्षों के अधिकारों के दायरे को भी बढ़ा दिया गया।

दल बदल विरोधी कानून के रहते वी. पी. सिंह और चंद्रशेखर की सरकारें बनती भी हैं और गिरती भी हैं। उस दौर में किस प्रकार जोड़तोड़ हुआ होगा इसपर ज्यादा लिखने की जरूरत नहीं है। फर्क इतना रह गया था कि पहले लोग अकेले भी दल बदल कर लिया करते थे लेकिन इस कानून के आ जाने के बाद थोक भाव में दल बदल प्रारंभ हो गया। विवाद इतना बढ़ गया कि इसे देश की सबसे ऊपरी अदालत में चुनौती दी गई। नवंबर 1991 में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय 3:2 के अनुपात में दल विरोधी कानून के पक्ष में आया। 3 जजों ने इस कानून को सही ठहराया जबकि 2 जजों ने इसे असंवैधानिक करार दिया।

17 महीने में पांच मुख्यमंत्री
कानून बन जाने के बाद भी नागालैंड (1988), मिजोरम (1988), कर्नाटक (1989), गोवा (1990), नागालैंड (1990), मेघालय (1991), मणिपुर (1992), नागालैंड (1992) और मणिपुर (2001) में काफी जबरदस्त तरीके से दल बदल किया गया। सवाल उठना लाजमी था क्योंकि कानून के प्रावधानों को लागू करने के बजाय वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 1998-99 में गोवा काफ़ी सुर्खियों में रहा। 17 महीने के अंदर गोवा में पांच मुख्यमंत्री ने अपनी कुर्सी छोड़ी। फिर बाद में चार महीने (फरवरी-जून 1999) राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

जब सीमित हुई मंत्रिमंडल की सदस्य संख्या
साल 1997 का दौर कौन भूल सकता है। जब कल्याण सिंह की सरकार से मायावती ने समर्थन वापस ले लिया। उसके बाद जो हुआ वह भारतीय राजनीति के इतिहास में अनूठा वाकया था। समर्थन के लोभ में कल्याण सिंह ने 93 सदस्यीय मंत्रिमंडल का निर्माण किया था। इतनी संख्या तो छोटे राज्यों में पूरे विधानसभा की भी नहीं होती है। अंततः साल 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने संसद में 91वां संविधान संशोधन पेश किया और उसे मंजूरी मिल गई। इस कानून के तहत न सिर्फ व्यक्तिगत दल बदल बल्कि सामूहिक दल-बदल को भी असंवैधानिक घोषित किया गया और दो तिहाई की संख्या के साथ दल बदल को सिर्फ मंजूरी दी गई। इसके साथ ही मंत्रिपरिषद की संख्या को भी सीमित किया गया।

कानून तो बना लेकिन असर कम हुआ
लेकिन इसके बाद भी जिस तरह से दल बदल होता गया वह अपने आप में कई सवाल खड़ा करता है। साल 2016 में उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश में जिस प्रकार से दल बदल हुआ और राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई, वह कहीं न कहीं दल बदल विरोधी कानून को भी कटघरे में खड़ा करता है। अखिलेश यादव और शिवपाल यादव के बीच हुए दरार को भी इसी कानून से समझा जा सकता है। नीतीश कुमार और शरद यादव की कटुता को भी दल बदल विरोधी कानून से उजागर किया जा सकता है। साल 2017 में मणिपुर विधान सभा का मामला हो या फिर साल 2020 में राजस्थान और मध्यप्रदेश में हुए सियासी बबंडर का हो, सभी जगह दल बदल विरोधी कानून की प्रासंगिता का सवाल खड़ा होता है। हालांकि 91वें संविधान संशोधन के बाद जरूर दल बदल में पहले से काफी कमी आई है लेकिन सामूहिक दल बदल के मामलों में जितनी कमी देखी जानी चाहिए थी उतनी नहीं हो पाई है।

निष्कर्ष:
अब समय आ गया है कि फिर से दल बदल विरोधी कानून की समीक्षा की जाएं और फिर से आवश्यक संशोधन किया जाएं। दल बदल न सिर्फ संविधान और कानून को दागदार करता है अपितु यह चुनाव के समय डाले गए एक एक वोट को भी कलंकित करता है। जनता के द्वारा डाला गया एक एक वोट लोकतंत्र के लिए उतना ही अधिक महत्वपूर्ण है जितना कि 1 वोट से किसी सरकार का सत्ता से बाहर जाना।

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(लेखक कानून के जानकार हैं। यहां व्यक्त विचार उनके अपने हैं।)

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