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पर्यावरण परिवर्तन: फसलों पर दुष्प्रभाव

शोध में ऐसे तथ्य सामने आए हैं कि पर्यावरण बदलाव लगातार फसलों पर दुष्प्रभाव छोड़ रहा है।

Author Published on: November 12, 2019 3:51 AM
डॉ. बाओशेन जिंग ने कहा कि कृषि में बायोचर के उपयोग से मृदा की जलधारण क्षमता में 9.82 फीसद तक बढ़ोतरी हुई है,

हाल ही में चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (एचएयू) में स्वर्ण जयंती अंतराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन का विषय ‘न्यू मिलेनिया एग्रीकल्चर नॉवल ट्रेंडस एंड फ्यूचर सिनेरियो’ रहा। इस सम्मेलन में शोधकर्ताओं ने पर्यावरण में हो रहे बदलाव और फसलों पर इसके दुष्प्रभाव से जुड़े तथ्यों को पेश किया। साथ ही वैज्ञानिकों ने कृषि के क्षेत्र में आगामी चुनौतियों को भी साझा किया। इस सम्मेलन में 25 से अधिक देशों के वैज्ञानिकों ने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

इस सम्मेलन के मुख्य अतिथि अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मेसाच्यूसेट के वैज्ञानिक डॉ. बाओशेन जिग ने लंबे समय तक मृदा स्वास्थ्य को बनाए रखने व वर्तमान में हो रहे जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बायोचर के महत्व पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि 1960 में विश्व की जनसंख्या 3.03 अरब थी जोकि अब दोगुणा से ज्यादा हो गई है। जबकि कृषि योग्य भूमि में 12 फीसद की ही वृद्धि हुई। अभी प्राकृतिक संसाधनों पर मानव व पशु संख्या का भारी दबाव है जिसके लिए खाद्य आपूर्ति करना कृषि वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ी चुनौती है।

डॉ. बाओशेन जिंग ने कहा कि कृषि में बायोचर के उपयोग से मृदा की जलधारण क्षमता में 9.82 फीसद तक बढ़ोतरी हुई है, जिससे यह सिद्ध होता है कि भविष्य में जल संरक्षण के लिए कृषि तकनीक में बायोचर का इस्तेमाल लाभदायक होगा। इसके अलावा बायोचर के उपयोग से मृदा की उत्पादन क्षमता व मृदा से पौधों को होने वाली पोषक तत्वों की उपलब्धता भी बढ़ती है। उन्होंने बताया कि बायोचर के इस्तेमाल से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी आती है। अत: यह तकनीक वायु और मृदा प्रदूषण से भी निपटने में सहायक होगी।

प्रस्तुत शोध में ऐसे तथ्य सामने आए हैं कि पर्यावरण बदलाव लगातार फसलों पर दुष्प्रभाव छोड़ रहा है। इस स्थिति से जूझने के लिए वैज्ञानिकों ने ऐसी फसलों को विकसित करने पर बल दिया जो खराब पर्यावरण में भी अधिक पैदावार दे सकें। कनाडा के ग्वेल्फ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कलेरेनस जे सवेंटन ने बताया कि समय के साथ जलवायु में परिवर्तन आ रहा है, जिसमें मुख्य रूप से बढ़ती हुई गर्मी और वर्षा की अनिश्चितता भी है। इसकी वजह से हर साल किसानों को काफी नुकसान होता है। लिहाजा फसलों की ऐसी किस्मों को विकसित करना होगा हो जलवायु में आने वाले बदलाव को सहन कर सकें। उन्होंने सूखे और लवणीयता को सहन करने वाली किस्में विकसित करने पर बल दिया।

एचएयू के कुलपति प्रो. केपी सिंह ने कहा कि कृषि शोध में बदलाव की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कृषि क्षेत्र में आ रही चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए कृषि शिक्षा व कृषि शोध में उपयुक्त बदलाव करने होंगे ताकि किसानों के समक्ष आ रही समस्याओं का समाधान किया जा सके। कृषि क्षेत्र की उन्नति के लिए भविष्य में नए आयाम जैसे कि नैनो तकनीक आधारित मॉनिटरिंग, नैनो फर्टिलाइजर, नैनो पेस्टीसाइड, डाटा माइनिंग, मार्केट आधारित कृषि उत्पादन, अधिक ऊर्जा वाली फसलों संबंधी शोध, कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन, अन्न भंडारण की नई तकनीक, कृषि ज्ञान के प्रचार प्रसार की आधुनिक तकनीकों और समेकित कृषि प्रणाली की महत्ता पर बल देना होगा।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व डीडीजी प्रो. गजेंद्र ने भविष्य में बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए खाद्यान आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कृषि शिक्षा एवं शोध की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश में लगभग 800 विश्वविद्यालयों में से 71 कृषि विश्वविद्यालय हैं जिनमें होने वाले शोध कार्यों से कृषि क्षेत्र में आने वाली चुनौतियों का समाधान करने में मदद मिलेगी।

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