An Historic Mistake That Changed the Course of India's Kashmir Problem: Meet the Ignored Man Mahavir Tyagi - Jansatta
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ब्‍लॉग: 1966 की वह ऐतिहासिक गलती जिसने कश्‍मीर में आतंक का बीज बो दिया

एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का अर्थ भी यह नहीं है कि जम्मू और कश्मीर में हम कोई दखल न दें।

कश्मीरी प्रदर्शनकारी (PTI Photo)

एक ऐतिहासिक भूल 1966 में हुई थी। उस कारण देश 2016 में भी ऐतिहासिक पीड़ा सह रहा है। यदि हाजी पीर को पाकिस्तान को नहीं लौटाने की महावीर त्यागी की बात मान ली गयी होती तो कश्मीर समस्या आज इतनी विकट नहीं होती। हाजी पीर इलाके से घुस कर पाकिस्तानी आतंकवादी कश्मीर में लगातार हत्याएं कर रहे हैं और अन्य तरह से भारत को क्षति पहुंचा रहे हैं। 1966 में संपन्न ताशकंंद समझौते के तहत जब केंद्रीय मंत्रिमंडल पाकिस्तान को हाजी पीर इलाके को लौटाने का फैसला कर रहा था तो इसके विरोधस्वरूप तत्कालीन पुनर्वास मंत्री महावीर त्यागी ने सरकार से इस्तीफा दे दिया। क्योंकि पूर्व सैनिक होने के नाते त्यागी उस इलाके के सामरिक महत्व को समझते थे। याद रहे कि भारत -पाक युद्ध के दौरान 28 अगस्त 1965 को भारतीय सेना ने हाजी पीर पर फतह हासिल कर ली थी। ताशकंद समझौते के तहत जीते हुए इलाके लौटाने थे। उसका फैसला कैबिनेट को करना था। तब गुलजारी लाल नंदा कार्यवाहक प्रधान मंत्री थे। पाकिस्तानी आतंकवादियों के कश्मीर में घुसने का सबसे सुगम रास्ता हाजी पीर दर्रा है। त्यागी जी ने देशहित में मंत्री पद छोड़ा था। यदि उनकी बात मान ली गयी होती और हाजी पीर को नहीं लौटाया जाता तो आज घुसपैठ की समस्या इतनी विकट नहीं होती। हम तो ताशकंद समझौते का पालन कर रहे थे, पर पाकिस्तान उसका उलंघन कर रहा था। बाद में शिमला समझाते का भी अक्षरशः पालन पाकिस्तान ने नहीं किया। जबकि भारत ने करीब 90 हजार युद्धबंदियों को रिहा कर दिया था।

बंगला देश युद्ध के बाद शिमला समझौता हुआ था। तब पाकिस्तान ने ताशकंद समझौते को नकारते हुए बाद में साफ शब्दों में यह कह दिया था कि ‘समझौते में जो हथियारबंद पाकिस्तानियों को वापस बुलाने का जिक्र है,उसका अर्थ यह नहीं है कि हम अपने हथियारबंद छापामारों को कश्मीर से वापस बुलवाएंगे। एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का अर्थ भी यह नहीं है कि जम्मू और कश्मीर में हम कोई दखल न दें। क्योंकि इस समझौते के बावजूद जम्मू और कश्मीर के क्षेत्र को पाकिस्तान अपना निजी क्षेत्र मानता है।’ पर इसके विपरीत अपने देश की सुरक्षा की कीमत पर पाकिस्तान के प्रति उदारता दिखाते हुए ताशकंद समझौते के तहत भारत उस भूभाग को वापस कर देने पर सहमत हो गया था। हाजी पीर दर्रे पर बड़ी कुर्बानियों के बाद भारतीय सेना ने कब्जा किया था।

महावीर त्यागी पहले सेना में थे।उन्होंने जालियांवाला बाग नरसंहार के विरोध में सेना की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। वह स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गये थे। वह बारी-बारी से नेहरू और शास्त्री मंत्रिमंडल के सदस्य बने थे।जब 1965 में भारतीय सेना ने हाजी पीर दर्रे पर कब्जा किया तो त्यागी जी बहुत प्रसन्न हुए थे। युद्ध के बाद त्यागी जी ने तत्कालीन प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री से कई जन सभाओं में जनता को यह आश्वासन दिलवा दिया था कि हम हाजी पीर को किसी भी हालत मेंं पाकिस्तान को वापस नहीं करेंगे। पर, ताशकंद में सोवियत संघ ने दबाव डाल कर हाजी पीर की वापसी को भी समझौते में शामिल करा दिया।

एक अपुष्ट खबर के अनुसार शास्त्री जी इसके सख्त विरोध में थे। पर,तत्कालीन मंत्री द्वय स्वर्ण सिंह और वाई.वी.चव्हाण ने शास्त्री जी को अंततः मना लिया था। शास्त्री जी के निधन के बाद गुलजारी लाल नंदा कार्यवाहक प्रधान मंत्री बने थे। शास्त्री मंत्रिमंडल के सारे सदस्य नंदा मंत्रिमंडल में भी शामिल किए गए थे। ताशकंद समझौते को स्वीकार करने के लिए उस अस्थायी कैबिनेट की बैठक बुलाई गयी। त्यागी ने समझौते के इस बिंदु का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि अगला मंत्रिमंडल ही इस पर विचार करे। पर, ऐसा नहीं हुआ। ताशकंद समझौते पर मुहर लगाने के लिए जब मंत्रिमंडल में प्रस्ताव आया तो त्यागी ने अपने त्याग पत्र की घोषणा कर दी और वह बैठक से बाहर निकल गये। बाद में प्रेस बयान में त्यागी ने कहा कि ‘इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि पाकिस्तान और भारत तब तक उन्नत और संपन्न नहीं बनेंगे जब तक इन दोनों देशों में आपस की एकता स्थापित नहीं हो जाती। मेरा विश्वास है कि हमको पूरा प्रयत्न इस बात का करना होगा कि हमारे और पाकिस्तान के आपसी भेदभाव शांतिपूर्ण ढंग से दूर हो सकें। अपने झगड़ों को निपटाने के लिए हम दोनों कभी भी सैनिक शक्ति का प्रयोग न करें।जहां तक ताशकंद के समझौते का संबंध है, मैं इसके ध्येय और शुभ भावनाओं से पूरी तरह सहमत हूं। पर इस समझौते में कुछ बातें ऐसी हैं जो हमारी सरकार और हमारी पार्टी की ओर से सितंबर, 1965 के पश्चात की हुई घोषणाओं से कत्तई विपरीत है।’

‘इस समझौते के कई तत्व बहुत ही गंभीर हैं। इसलिए मेरी राय में अस्थायी मंत्रिमंडल को इस पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगाने और पार्लियामेंट से पास कराने की जिम्मेदारी अपने सिर पर ओढ़नी नहीं चाहिए थी। क्योंकि अस्थायी मंत्रिमंडल के लिए ऐसे गंभीर प्रश्न पर अपना निर्णय देने के बजाए उचित होता कि दो -तीन दिन ठहरकर वह नए प्रधान मंत्री व मंत्रिमंडल का इंतजार करे। मैं मंत्रिमंडल को इस बात के लिए तैयार न कर सका कि वह दो -तीन दिन ठहर जाए।जहां तक मेरा संबंध है, मेरे लिए अपनी सेना को हाजी पीर के मोर्चे से वापस बुलाने का आदेश देने की जिम्मेदारी अपने सिर पर ओढ़ना कठिन है।क्योंकि 5 अगस्त 1965 को जीती हुई हाजी पीर की चैकियों को छोड़ना भयंकर भूल होगी। विशेषकर जबकि पाकिस्तान अपने छापामारों, गुप्तचरों और बिना वर्दी के सैनिकों को वापस बुलाने और भविष्य में ऐसे आक्रमण न करने को कटिबद्ध नहीं होता है।’ कितने दूरदर्शी थे महावीर त्यागी! पर उनका त्याग भी तब भारत सरकार की आखें नहीं खोल सका था।उसका खामियाजा देश आज भी भुगत रहा है।

लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार एवं विश्‍लेषक हैं। 

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