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बागी बबुआ के साथ सपा समर्थक

अखिलेश जिस तरह से विकास के एजंडे को आगे बढ़ा रहे थे मुलायम सिंह यादव को उसका सम्मान करते हुए स्वत: आगे की राह अखिलेश के लिए आसान कर देनी थी।

अखिलेश जिस तरह से विकास के एजंडे को आगे बढ़ा रहे थे मुलायम सिंह यादव को उसका सम्मान करते हुए स्वत: आगे की राह अखिलेश के लिए आसान कर देनी थी। संतकबीरनगर के सिविल कोर्ट में वकील व सिविल बार एसोसिएशन के अध्यक्ष लालजी यादव का कहना है कि पूरे देश में बहुत से लोगों ने विकास का जो ढिंढोरा पीटा है, उसके उलट अखिलेश ने खामोशी से जमीन पर काम किया है। उत्तर प्रदेश की जात-मजहब की परंपरागत छवि वाली राजनीति के उलट सही मायने में अखिलेश ने विकास को समझा है और उसे आगे बढ़ाया है। सपा के परंपरागत समर्थक लालजी यादव कहते हैं कि अखिलेश ने अपने कार्यकाल में उत्तर प्रदेश का इतना विकास कर लिया है जितना आजादी के बाद आज तक नहीं हुआ था। लालजी यादव का दावा है कि मौजूदा विवाद से अखिलेश के वोट बैंक पर कुछ असर पड़ सकता है लेकिन उन्होंने अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं करके जो दमदार छवि बनाई है उसका सकारात्मक असर भी तो पड़ेगा। अखिलेश की बगावत को कुछ समय के बाद उनके पिता भुला कर उन्हें गले लगा सकते हैं लेकिन अखिलेश ने सिद्धांतों और समर्थकों के साथ जो वफा दिखाई है उत्तर प्रदेश के इतिहास में वह उन्हें नायकत्व का दर्जा प्रदान कर सकता है।

अखिलेश यादव की पिता से बगावत के बारे में बात करते ही इटावा के सपा कार्यकर्ता राजीव यादव कुछ यूं फूट पड़ते हैं, ‘अखिलेश यादव के सत्ता में आने के पहले हम सपा कार्यकर्ताओं की छवि गुंडों जैसी बना दी गई थी, हम लोहिया के विचारों का ककहरा पढ़ कर आए थे लेकिन हमारी मेहनत पर लाठी वाली छवि भारी पड़ जाती थी। आरोप था कि हम पंचायत चुनावों में मनमानी करते हैं, सरकार बनते ही सपा कार्यकर्ता असलहाशुदा हो जाते हैं। हम पर गुंडई का अनावश्यक ठप्पा लगा दिया गया था’। राजीव यादव कहते हैं कि 2013 में अखिलेश यादव ने मुझे इटावा में जिला पार्टी का अध्यक्ष बनाया था, और वे तभी से अखिलेश के काम करने की शैली के मुरीद हैं। राजीव दुखी मन से बताते हैं कि आज जिन लोगों ने अखिलेश यादव को किनारे लगाने का काम किया था उन्हीं शक्तियों के कारण मुझे भी किनारे किया गया था। लेकिन मुझे यकीन है कि अखिलेश सपा को नया भविष्य देंगे।
आखिर अखिलेश पर इतनी आस्था क्यों? इस सवाल पर राजीव यादव कहते हैं कि आप इटावा का ही हाल देखिए। अखिलेश ने क्या से क्या बना दिया। नेताजी तीन बार मुख्यमंत्री होते हुए जितना विकास नहीं कर सके बेटे ने एक बार में किया। इटावा में हॉकी का अंतरराष्टÑीय स्तर का एस्ट्रोटर्फ मैदान, अंतरराष्टÑीय क्रिकेट स्टेडियम बनाया। चंबल और यमुना किनारे को डकैत मुक्त बीहड़ कर दिया। 130 लाख की लागत से पानी की समस्या दूर करने के लिए परियोजना बनाई। एक सधे नेता की तरह बात करते हुए राजीव कहते हैं कि इटावा का हर एक युवा कार्यकर्ता अखिलेश के साथ है। बात सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं है, बात विचारधारा को बचाने की है।

वहीं मऊ के कोपागंज के ग्राम प्रधान अल्ताफ का कहना है कि अखिलेश यादव ने शुरू से ही अपना मिजाज विकासपरस्त रखा। अल्ताफ कहते हैं कि सरकारी योजनाएं तो बहुत बनती हैं लेकिन जमीन पर जरूरतमंदों तक कम पहुंचती हैं। समाजवादी पेंशन, विधवा पेंशन जैसी योजनाएं गरीबों के लिए बहुत राहत भरी हैं। गांव के लोगों तक मनरेगा की योजनाएं पहुंची है। अल्ताफ कहते हैं कि उनका पूरा समर्थन अखिलेश के साथ है। नोएडा में समाजवादी पार्टी की महानगर महिला अध्यक्ष सिंधु रवि का कहना है कि हम कार्यकर्ताओं को पूरी उम्मीद है कि सपा परिवार पर आया यह संकट बहुत जल्द टल जाएगा। अखिलेश जी और नेताजी का साथ हमें मिलेगा और हम चुनावों में अपना बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे। वे कहती हैं कि देश के अन्य मुख्यमंत्रियों और नेताओं से तुलना करें तो अलिखेश यादव के साथ सबसे ज्यादा युवा समर्थक हैं। अखिलेश जिस तरह से कार्यकर्ताओं को उत्साहित करते हैं, घुल-मिलकर काम करते हैं वह हम सबके बीच ऊर्जा का संचार करता है।

नोएडा के दलित प्रेरणास्थल के पास धूप सेंक रहे अब्दुल राशिद का कहना है कि मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से बहुत सारे मुसलमान अखिलेश से नाराज हुए थे। लेकिन हाल के दिनों में मुसलमानों को लेकर जो हालात बने हैं हम उससे और खौफजदा हैं। राशिद कहते हैं कि वे अखिलेश की बहुत सी नीतियों के समर्थक हैं, लेकिन मुजफ्फरनगर की कसक तो है ही। तो फिर आप क्या मायावती को वोट देंगे? इस सवाल का सीधा जवाब देने से परहेज करते हुए राशिद कहते हैं कि देखते हैं। राशिद तो अपने मन की बात दबा बैठे लेकिन वहीं पास में बैठी एक महिला कहती हैं कि अखिलेश बबुआ तो बहुत काम कर ही दिए हैं। अच्छा किए जो अपने मन का कर रहे हैं। ऐसे ही तो आगे बढ़ेंगे।
तो फिलहाल इस चुनावी समर में सपा समर्थक तो बागी अखिलेश बबुआ के साथ हैं, अब देखना यह है कि यह समर्थन चुनावी नतीजों में दिखता है या नहीं।

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