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बिहार में दंगा शांत कराने भीड़ में घुस गए थे नेहरू, नरसंहार के बाद बेलछी गई थीं इंदिरा, बच्चों की मौत पर क्यों चुप हैं राहुल?

Encephalitis (Chamki Fever) Symptoms, Causes, Precautions, Treatment, Prevention: 27 मई 1977 को बिहार के बेलछी में पहला जातीय नरसंहार हुआ था। 11 दलितों की हत्या कर दी गई थी। घटना के करीब ढ़ाई महीने बाद इंदिरा गांधी ने बेलछी जाने का फैसला किया था।

नई दिल्ली | Updated: June 21, 2019 12:21 PM
बिहार में एईएस से डेढ़ सौ से अधिक बच्चों की मौत के बाद भी राहुल गांधी ने एक ट्वीट तक नहीं किया। (Photo: Express/PTI)

Encephalitis (Chamki Fever) Symptoms, Causes, Precautions: बिहार में इस साल चमकी बुखार (एक्यूट एनसिफेलाइटिस सिंड्रोम- AES) बच्चों पर कहर बनकर टूट पड़ा है। स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अब तब करीब डेढ़ सौ से ज्यादा बच्चे (स्थानीय मीडिया के अनुसार) चमकी बुखार की वजह से असमय काल के गाल में समा गए। सबसे अधिक कहर मुजफ्फरपुर में बरपा है। यहां बच्चों की मौत का आंकड़ा सौ पार कर चुका है। मुजफ्फरपुर स्थित एसकेएमसीएच में ही सिर्फ बुधवार की शाम तक  93 बच्चों की मौत की आधिकारिक पुष्टि की गई है। बच्चे यहां गंभीर हालत में आ रहे हैं और कफन में लिपटकर वापस जा रहे हैं। परिजनों की चित्कार से माहौल गमगीन है। 14 दिनों बाद सूबे के मुखिया नीतीश कुमार की नींद खुलती है और वे मुजफ्फरपुर पहुंचते हैं। जायजा लेते हैं और वापस चले जाते हैं। जब मीडिया उनसे और उनके उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी से सवाल करती है तो वे जवाब देने से साफ तौर पर इनकार कर देते हैं। मुख्यमंत्री गाड़ी का शीशा बंद कर चलते बनते हैं और उप-मुख्यमंत्री पत्रकारों को कहते हैं अभी जिस विषय (बैंकिंग) की बैठक चल रही है, उससे संबंधित ही सवाल का जवाब दिया जाएगा। किसी अन्य (चमकी बुखार से संबंधित) सवाल का जवाब नहीं दिया जाएगा।

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय चमकी बुखार को लेकर बैठक करते वक्त भारत-पाकिस्तान मैच का स्कोर पूछते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्द्धन जब पत्रकारों के साथ वार्ता कर रहे होते हैं तो केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री नींद में उंघते नजर आते हैं और बाद में कहते हैं कि ‘चिंतन’ कर रहे थे। इन सब के बीच सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के मुखिया राहुल गांधी पूरी तरह खामोश हैं। उन्होंने 100 से अधिक बच्चों की मौत पर न तो केंद्र सरकार पर व्यवस्था करने का दबाव बनाया और न हीं पीड़ितों के प्रति सहानुभूति जताने के लिए एक ट्वीट तक किया। दौरा करना तो दूर की बात है। अब अगर ऐसे में बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी राजद के कर्ता-धर्ता तेजस्वी यादव मौन धारण किए हुए हैं तो हैरानी की बात नहीं है। राहुल गांधी की खामोशी यह संकेत कर रही है कि शायद वे अभी राजनीति में परिपक्व नहीं हुए हैं। यदि राजनीति में वे परिपक्व हो गए रहते तो ये गलती नहीं करते। उन्हें कम से कम अपने पूर्वजों से सीख जरूर लेनी चाहिए थी कि जब कहीं जनता पर विपत्ति आती हो तो ऐसे समय में क्या करना चाहिए।

दंगा शांत करवाने पंडित नेहरु पहुंचे थे बिहार के चंडी: चंडी वर्तमान में नालंदा जिले में स्थित है। यह बिहार की राजधानी पटना से करीब 55 किलोमीटर दूर पटना-बिहारशरीफ मुख्य मार्ग पर स्थित है। बिहार के स्थानीय अखबार में छपी रिपोर्ट में कम्युनिस्ट पार्टी के वयोवृद्ध नेता गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने संस्मरण में कहा था, “बात 1947-48 की है। आजादी के बाद देश में कई जगहों पर दंगे हुए थे। बिहार भी उनसे अछूता नहीं था। यहां पटना जिले के मसौढ़ी और नालंदा जिले के चंडी और नूरसराय में एक समुदाय के विशेष के कई लोगों की दंगों में हत्या कर दी गई थी। इस खबर पर पंडित नेहरु चंडी पहुंचे थे।

नेहरु के आने की खबर सुनकर विरोधियों ने उनका पुरजोर विरोध करने की तैयारी कर रखी थी। बावजूद वे चंडी पहुंचे। उनके साथ इंडियन मिलिट्री के भी कुछ लोग थे। यहां एक कुंए में कई लोगों की हत्या कर उन्हें डाल दिया गया था। तब पंडित नेहरु उस कुंए के पास खुद पहुंचे और लोगों से दंगा रोकने की अपील की। यहां उनका विरोध होने लगा और बड़ी भीड़ इकट्ठा हो गई। तब नेहरु खुद भीड़ में पहुंचे और कहा कि अब यह दंगा बर्दास्त नहीं होगा। यदि यह नहीं रूकता है तो मजबूरन मिलिट्री को उतारना होगा। और तब जाकर यह दंगा शांत हुआ।”

बेलछी नरसंहार के बाद पहुंची थीं इंदिरा गांधी: स्पेनिश लेखक जेवियर मोरो ने सोनिया गांधी की जीवनी लिखी है ‘द रेड साड़ी’। इस घटना में सोनिया गांधी और उनके परिवार की जिंदगी से जुड़ी कई बातों का जिक्र है। बात वर्ष 1977 की है। 27 मई 1977 को बिहार के बेलछी में पहला जातीय नरसंहार हुआ था। 11 दलितों की हत्या कर दी गई थी। घटना के करीब ढ़ाई महीने बाद इंदिरा गांधी ने बेलछी जाने का फैसला किया। हालांकि, सोनिया गांधी के विचार इससे जुदा थे। उन्होंने इंदिरा गांधी से कहा था, ‘बिहार बहुत खतरनाक, पिछड़ा और असुरक्षित राज्य है। आप वहां न जाएं।’ यह वह समय था जब इंदिरा गांधी 1977 का चुनाव हार गई थी और काफी तनाव में थी। इंदिरा ने सोनिया को समझाया, ‘मेरी चिंता न करो। पार्टी के निष्ठावान नेता मेरे साथ जा रहे हैं।’ इसके बावजूद इंदिरा गांधी बेलछी पहुंची। 13 अगस्त 1977 को तेज बारिश हो रही थी।

पटना से बेलछी जाने वाले रास्तों पर कई जगह पानी भर गया था। कार से आगे जाना संभव नहीं था। तब इंदिरा गांधी टैक्टर पर चढ़ आगे बढ़ीं लेकिन वह ट्रैक्टर भी कीचड़ में फंस गया। मौसम और रास्ते की वजह से साथ जा रहे कुछ लोगों ने आगे न जाने की सलाह दी। बावजूद इंदिरा गांधी आगे बढ़ती रही। रास्ते में एक नदी थी। नदी पार के लिए स्थानीय लोगों की सलाह पर इंदिरा गांधी ने हाथी का सहारा लिया। यहां उनके प्रतिभा पाटिल भी थी। कड़कती बिजली और बारिश के बीच आधी रात को इंदिरा गांधी बेलछी पहुंची। यहां उन्होंने पीड़ित परिवारवालों से मुलाकात की। गांव के लोगों ने उनका स्वागत किया और कहा, ‘आपके खिलाफ वोट किया, इसके लिए क्षमा कर दीजिए।’ चेहरे पर मुस्कान लिए इंदिरा गांधी वापस दिल्ली लौंटी।

क्या राहुल गांधी भूल चुके हैं अपनी जिम्मेदारी: ये पुरानी कहानी कहने का मतलब ये है कि आज राहुल गांधी अपने पूर्वजों के काम को शायद भूलते जा रहे हैं। भले ही वो विपक्ष में हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव 2019 में देश के 12 करोड़ से ज्यादा जनता ने उन्हें वोट दिया। आज बिहार के सैंकड़ों बच्चे असमय काल के गाल में समा गए हैं। मां अपने लाल को खोने के बाद चित्कार रही हैं। पिता के बुढ़ापे की लाठी टूट गई है। जब राहुल गांधी चुनाव के समय वोट मांगने जा सकते हैं, तो इस संकट की घड़ी में वे क्यों नहीं जा रहे हैं? वे सरकार के खिलाफ आवाज मुखर क्यों नहीं कर रहे हैं? भारतीय चिकित्सा अनुसंधान पत्रिका में प्रकाशित 2017 के अध्ययन में कहा गया कि 2008 से 2014 के बीच इस रोग के 44 हजार से अधिक मामले सामने आए और इससे करीब छह हजार मौतें हुईं। उसके बाद भी बच्चों की मौत की सिलसिला थम नहीं रहा है। यदि सत्ता पक्ष अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है तो क्या विपक्ष भी अपनी जिम्मेदारी भूल चुका है?

नीतीश कुमार की नीयत पर उठ रहे सवाल: आज बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नीयत पर भी सवाल उठ रहे हैं। आखिर उठे भी क्यों न, एक समय था जब वे रेल दुर्घटना के बाद इस्तीफा दे दिए थे और अब पत्रकारों के सवाल पर भी कन्नी काट निकल रहे हैं। बात वर्ष 1999 की है। देश में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। नीतीश कुमार रेल मंत्री थे। इसी समय गैसाल ट्रेन हादसा हुआ था। इस हादसे में करीब 290 लोगों की मौत हो गई थी और नीतीश कुमार ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया था। करीब 43 साल बाद इस तरह का इस्तीफा हुआ था।

इससे पहले 1956 में तमिलनाडु के अरियालुर में हुए भीषण ट्रेन हादसे में 142 लोगों की मौत हो गई थी। पंडित नेहरु के सरकार में तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया था। आज चमकी बुखार की वजह से सवा सौ से ज्यादा बच्चों की मौत हो चुकी है। किसी के इस्तीफा देने की बात तो दूर, राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, ‘बच्चों की मौत के लिए न तो सरकार जिम्मेदार है और न हीं प्रशासन। बच्चों की नियती ठीक नहीं थी।’ यहीं नहीं, बच्चों की मौत के दौरान इनका ध्यान भारत-पाकिस्तान मैच पर था और ये स्कोर पूछ रहे थे। जबकि डॉक्टरों और विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार प्रयास करती तथा जागरुकता अभियान चलाती तो मौत के आंकड़े काफी कम हो सकते थे।

बिहार को एक मजबूत विपक्ष की तलाश: बिहार के वर्तमान राजनीतिक हालात को देखकर यह महसूस किया जा रहा है कि सूबे की जनता के लिए आवाज उठाने वाली एक मजबूत विपक्ष की दरकार है। आज बिहार विधानसभा में सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी राजद के कर्ता-धर्ता तेजस्वी यादव कहीं गुम हैं। जमीन पर आवाज बुलंद करने की बात को दूर उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टि्वटर पर एक ट्वीट तक नहीं किया है। बिहार के लोगों के लिए बच्चों की मौत आपदा से कम नहीं है और राजद के नेता तक को मालूम नहीं है कि तेजस्वी अभी कहां हैं? चुनाव के समय तो उन्होंने लगभग प्रतिदिन राज्य में सभा को संबोधित किया। जनता से वोट मांगे लेकिन अभी कोई अता-पता नहीं है। ऐसे में राहुल गांधी को चाहिए कि वे बिहार जाएं, लोगों से मिले और जनता की अवाज बनें।

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