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बेबाक बोलः धर्म की धुंध

किसी भी जटिल समय में खास तरह की पक्षधरता की जरूरत पड़ती है। हर कालखंड उम्मीद करता है कि उसमें बदलाव की लकीर खींचने वाला कोई आए। उस काल में खींची गई लकीर के फकीर बन जाने वालों को आगे का समय स्थिर भाव से ही देखता है। युधिष्ठिर महाभारत के ऐसे पात्र हैं जो तात्कालिक आदर पाने के बाद भी नायक के रूप में धुंधले दिखते हैं। आज की मौजूदा राजनीति में इस तरह का स्थिर भाव काम नहीं करेगा क्योंकि कुछ चीजों को आप बहुत बदल नहीं पाएंगे। पूरी महाभारत में युधिष्ठिर का कोई संवाद या कदम वक्त का रुख मोड़ता हुआ दिखाई नहीं देता है। आधुनिक भारत में कानून की देवी के दोनों आंखें बंद हैं तो धर्मराज युधिष्ठिर की सिर्फ एक आंख बंद है। पांडवों के अधर्म को वे नहीं देखते और कौरवों के कंधों पर धर्म की स्थापना का सारा बोझ डाल देते हैं। धर्म का इस्तेमाल कर अपना राज स्थापित करने वाले युधिष्ठिर पर बेबाक बोल।

युधिष्ठिर ने विजय हासिल करने के लिए उस गुरु को भी धोखा दिया जिन्होंने युद्ध धर्म का पाठ पढ़ाया था।

यक्ष, जोकि स्वयं थे यमराज/ अपने गूढ़तम, जटिल/ प्रश्नों की वाण-वर्षा को/ एक-एक कर/ निष्फल होते देखकर भी/ क्रुद्ध होने की जगह/ हुए पुलकित/ क्योंकि अपने पुत्र की /वे ले रहे परीक्षा थे कठिनतम

कवि रमाकांत शर्मा उद्भ्रांत की काव्य रचना ‘अभिनव पांडव’ की इन पंक्तियों को पढ़ विचार कौंधा था कि क्या महाभारत के चरित्रों का पाठ आधुनिक भाव बोध से किया जा सकता है? उत्तर सत्य के इस युग में यक्ष प्रश्न को किस तरह से देखा जाए? युधिष्ठिर की पहचान यक्ष प्रश्न से है। सिर्फ युधिष्ठिर ही यक्ष के प्रश्नों के उत्तर दे उसे संतुष्ट कर पाए थे। आज सवाल यह भी उठता है कि क्या किसी सवाल का कोई एक जवाब हो सकता है? जब हर प्रश्न जाति, जेंडर व अन्य पहचानों पर प्रति प्रश्न से जूझता है, उत्तर के कई केंद्र बनाता है तो युधिष्ठिर की संतुष्ट करने वाली छवि को कैसे देखेंगे?

युधिष्ठिर के संतुष्टीकरण को आज की राजनीति में तुष्टीकरण नाम दिया गया है। भारत में राजनीतिशास्त्र को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला काव्य ग्रंथ है महाभारत। आज की राजनीति युधिष्ठिर की सबसे बड़ी देन है। सत्यनिष्ठ बने रहते हुए समय, सुविधा और अपनी आवश्यकता के मुताबिक धर्म को कैसे ढालना है, ऐसे हर यक्ष प्रश्न का जवाब युधिष्ठिर के पास खोजा जा सकता है।

युधिष्ठिर अगर धर्म के संस्थापक हैं तो द्रौपदी उसी धर्म की सबसे बड़ी पीड़ित। यक्ष के सवालों के त्वरित उत्तर देने वाले युधिष्ठिर द्युत सभा में द्रौपदी के सवालों पर निरुत्तर थे। द्रौपदी अपने पदार्पण के साथ ही युधिष्ठिर के लिए सबसे बड़ी परीक्षा थी जिसमें वे नाकाम साबित होते रहे। स्वयंवर में द्रौपदी के योग्य अर्जुन घोषित हुआ और कुंती ने अनजाने में उसे पांचों भाइयों में बांट लेने को कहा तो धर्मराज का क्या कर्तव्य था? कुंती ने अपनी गलती मानते हुए कहा भी कि द्रौपदी कोई अनाज नहीं है जो बांटी जाए, इसलिए मैं अपनी बात वापस लेती हूं। कुंती के पीछे हटने के बाद युधिष्ठिर उस अन्यायी आदेश को धर्म की तुला पर संतुलित क्यों करने लगे? उस वक्त उन्होंने धर्म की नई व्याख्या क्यों नहीं बनाई?

द्रौपदी के लिए धर्म की नई व्यवस्था बनाने के बजाए युधिष्ठिर धर्म के पीले पड़ चुके पन्नों से उस ऋषि के उदाहरण खोज लाए जिनकी पत्नी ने बहुपति की व्यवस्था अपनाई थी। इतिहास की गलतियों को सुधारने के बजाए उन्होंने अपनी सुविधानुसार उसे गतिशील बना दिया। यह वह समय था जब बहुपति की कबीलाई प्रथा खात्मे के कगार पर थी और कुलीन समाज में पति का बड़ा भाई स्त्री के अभिभावक के समान होता था। लेकिन अभिभावक के रूप में खड़े युधिष्ठिर की दी व्यवस्था के अनुसार द्रौपदी सबसे पहले उनकी ही पत्नी बनी।

युधिष्ठिर ने धर्म स्थापना के नाम पर दो स्त्रियों के साथ अन्याय किया। द्रौपदी तो विडंबनाओं का शिकार हुई ही, साथ ही इसका सारा दोष कुंती के ‘आदेश’ पर आ गया। जोर इसी बात पर है कि मां के मुंह से निकली बात को न मानना अधर्म हो जाएगा। ये वही पुत्र हैं जिन्हें इतिहास अपनी मां को शाप देने के लिए जानता है। महाभारत के अंत में जब युधिष्ठिर को पता चलता है कि कर्ण उनका भाई था तो वे कुंती को शाप देते हैं कि आगे से स्त्रियों के पेट में कोई बात नहीं पचेगी। जब उनका धर्मराज का मुकुट हिलने लगता है तो वे अपनी मां को शाप देकर समाज को घोर स्त्री-विरोधी एक मुहावरा हमेशा के लिए दे देते हैं कि स्त्रियों के पास कोई राज सुरक्षित नहीं रह सकता। स्त्रियों को ऐसे अवसरवादी धर्म से आज तक छुटकारा नहीं मिल पाया और राज-समाज में उन्हें पीछे धकेलने के लिए आधुनिक समय में भी कई धर्मराज खड़े हो जाते हैं।

युधिष्ठिर के धर्म की दूसरी बड़ी परीक्षा थी द्युत-सभा। सामंती समाज का नियम था कि जैसे युद्ध का आह्वान स्वीकार करना पड़ता है वैसे ही द्युत-क्रीड़ा के निमंत्रण को नकारा नहीं जाता। युधिष्ठिर इस कुप्रथा को बदल सकते थे। वे उदाहरणों के ढेर लगा सकते थे कि यह मानवता के खिलाफ हैं। लेकिन उनके खामोश धर्म के कारण ढेर लगे तो द्रौपदी के वस्त्र। युधिष्ठिर के इस कदम को उसी काल में अधर्म घोषित करते हैं कृष्ण के दाऊ बलराम। बलराम राजनीति और समाज में शुचिता के पक्षधर थे। द्वारिका में छोटे दंगलों में स्त्रियों को दांव पर लगा दिया जाता था। बलराम ने युधिष्ठिर का उदाहरण देते हुए कहा कि स्त्रियों को दांव पर लगाने की प्रवृत्ति सभ्य समाज का निर्माण नहीं कर सकती है। युधिष्ठिर का किया अधर्म आने वाली कई पीढ़ियों के कलंक का कारण बनेगा। इसलिए इस प्रथा को मैं आज से खत्म करता हूं। राज्य पत्नी को दांव पर लगाने का अधिकार नहीं देगा। युधिष्ठिर सामंती जड़ धर्म को सुरक्षित रखना चाह रहे थे तो बलराम उसकी जड़ता को खत्म कर समाज को नई राह दिखा रहे थे।

यक्ष को निरुत्तर करने वाले युधिष्ठिर के पास द्रौपदी के प्रश्नों के उत्तर नहीं थे, जो पूछ रही थी कि आपने द्युत-सभा का निमंत्रण क्यों स्वीकार किया? आपको अपने चारों भाइयों को दांव पर लगाने का अधिकार किसने दिया? एक हारा हुआ व्यक्ति अपनी पत्नी को दांव पर कैसे लगा सकता है वह भी तब जब वो अकेली आपकी नहीं पांच की पत्नी है। युधिष्ठिर के चारों भाइयों के साथ खुद के दांव पर लगाने और हार जाने की खबर सुन द्रौपदी ने भरी सभा में उन्हें जासवंत (गुड़हल) के फूल के साथ अपना संदेश भिजवाया। द्रौपदी ने कहलवाया कि जासवंत के फूल में पांच पंखुड़ियां एक डंडी से जुड़ी होती हैं। आप अगर उस डंडी को तोड़ देंगे तो पांचों पंखुड़ियां बिखर जाएंगी और फूल का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। लेकिन युधिष्ठिर ने उस द्युत-धर्म की रक्षा के लिए द्रौपदी को भी दांव पर लगा दिया जो आज सभ्य समाज में भी न जाने कितने घर-परिवारों को तोड़ रहा है। युधिष्ठिर जुएं जैसी कुप्रथा को आगे बढ़ाने के प्रतिनिधि हैं।

युधिष्ठिर ने विजय हासिल करने के लिए उस गुरु को भी धोखा दिया जिन्होंने युद्ध धर्म का पाठ पढ़ाया था। वह झूठ की आवाज ऊंची कर सच की धीमे सुर में हत्या करने के लिए मान गए। गुरु द्रोण को अपने वरदान से ज्यादा युधिष्ठिर पर भरोसा था। उन्होंने कहा कि युधिष्ठिर के मुंह से सुनने के बाद ही अमर अश्वत्थामा की मृत्यु की बात को सच मानेंगे। उन्हें यकीन था कि युधिष्ठिर झूठ नहीं बोलेंगे। लेकिन युधिष्ठिर ने अपने ‘ऊंचे असत्य’ से अपने गुरु के प्राण हर लिए और दावा धर्म की पुनर्स्थापना का किया।

द्रौपदी से लेकर द्रोण तक के भरोसे को तोड़ने वाले युधिष्ठिर स्वर्ग की राह पर भी धर्म का स्वार्थी रूप रखते हैं। जिन भाइयों और पत्नी को वे दांव पर लगा धर्म की स्थापना करते हैं उनकी जगह एक कुत्ते को चुनते हैं। धर्मराज की आपत्ति के बाद भी वे पीछे गिरे हुए इंसान को छोड़ श्वान को लेकर अड़ते हैं कि यह तो मेरे साथ जाएगा ही। क्या धर्म की रक्षा में भीम और अर्जुन जैसे वीर भाइयों का कोई योगदान नहीं था? अधर्मियों का अंत तो भीम और अर्जुन ने किया। वे अपने भाइयों से यह न कह सके कि युद्ध में दुश्मन को धोखे से मारना अधर्म है। उनकी आंख मूंदने और जोर से झूठ बोल कर सच को दबा लेने की नीति आज भी सबसे बड़ी रणनीति है। आज नायकत्व के मंच से जब गर्वीली आवाज में कहा जाता है कि युद्ध और प्रेम में सब कुछ जायज है तो पांच पतियों में बंटती द्रौपदी और जिंदा बेटे के गम में मारे जाने वाले द्रोण याद आते हैं।
किसी किरदार में ऐतिहासिक चमक तभी होती है जब उसमें खास तरह की तार्किक पक्षधरता दिखे। महाभारत का वही किरदार दमदार है जो अपने कर्मों के लिए बुलंद तर्क गढ़ता है। युधिष्ठिर स्थिरता और समन्वयता में धुंधले पड़ जाते हैं। उन्होंने तात्कालिक आदर अवश्य पाया लेकिन भविष्य में उनके हिस्से भव्यता नहीं आती है। वे कहीं भी चमत्कृत नहीं करते हैं क्योंकि वे कोई बदलाव लाते नहीं दिखते हैं।

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