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बेबाक बोलः कुंती कर्म

महाभारत-कथा की जड़ में है वंशबेल और इस वंशावली में अहम कड़ी है स्त्री। महाभारत की स्त्री किरदार भी पुरुषों की तरह ही धूसर रंगों में हैं। आदर्श रचने की कोशिश करती स्त्रियों का अंत अभिशाप के रूप में सामने आता है। जो अपनी कोख में धर्मराज को धारण कर चुकी थी उसे भी सच को छुपाने के अधर्म के रास्ते पर ही चलना पड़ा। महाभारत में छह कौंतेय को समय रहते एक साथ खड़ा कर दिया जाता तो पांच पांडव खुद को ज्येष्ठ कौंतेय की हत्या का अपराधी महसूस नहीं कर रहे होते। कुंती की दादी सास सत्यवती ने अपने इतिहास का यह पन्ना गर्व के साथ खोला कि मुनि पराशर ने उसके गर्भ को ज्ञान का अंकुर फूटने के लिए इस्तेमाल किया था और वो ब्याहता होने से पहले वेदव्यास जैसे युग प्रवर्तक की माता बनी। लेकिन उसकी पुत्रवधु इस सच को छुपाने के कारण ग्लानि गाथा में बदल गई। बेबाक बोल में कुंती।

कुंती ने युद्ध के पहले युधिष्ठिर को यह बात बताई होती तो युद्ध टल भी सकता था।

आपके मौन ने इतना बड़ा युद्ध करवा दिया, लाखों लाशें बिछ गईं। आपकी विवशता पूरे भारतवर्ष को महंगी पड़ी। इस रणभूमि के लिए केवल आप उत्तरदायी हैं। आपने हमें ज्येष्ठ भ्राताश्री का हत्यारा बना दिया…। कुरुक्षेत्र के मैदान में अपनी मां कुंती से बोले गए धर्मराज युधिष्ठिर के ये शब्द इतिहास पर नया बोझ डाल देते हैं। पांचों पांडव ज्येष्ठ कौंतेय के शव को अपनी मां के अधर्म के रूप में देखते हैं।

कुंती पर बात करने के पहले हम यह समझ लें कि महाभारत के लेखक मुनि वेदव्यास खुद एक कानीन पुत्र (नियोग यानी बिना शारीरिक संपर्क के संतति होना) हैं। महाभारत में लेखक खुद एक किरदार बनकर तब अवतरित होते हैं जब चित्रांगद और विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद भरत वंश को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं होता है। भीष्म के विवाह से इनकार करने के बाद सत्यवती बेहिचक यह राज खोल देती है कि मुनि वेदव्यास उसकी संतान हैं जो विवाह के पहले हुए थे। सत्यवती ने अपने इतिहास का यह पन्ना गर्व के साथ खोला कि मुनि पराशर ने उसके गर्भ को ज्ञान का अंकुर फूटने के लिए इस्तेमाल किया था और वो ब्याहता होने से पहले वेदव्यास जैसे युग प्रवर्तक की माता बनी। लेकिन सत्यवती का यह गर्व उसी बेटे पांडु की ब्याहता के लिए शर्म का विषय क्यों हो गया जो खुद नियोग विधि से पैदा हुआ था। सत्यवती भी शादी के पहले मां बनी जो ऐतिहासिक गर्व का विषय था और कुंती भी बिन ब्याही मां बनी जो उसके जीवन की ग्लानि गाथा हो गई।

कुंती कोई मामूली स्त्री नहीं थी। अत्यंत रूपवती होने के साथ इतनी गुण संपन्न कि सबको शाप देने वाले मुनि दुर्वासा उसे वरदान देकर जाते हैं। उसने खुद की इच्छा से सूर्य देव का आह्वान किया और उनके अंश को धारण किया। वरदान दुर्वासा ऋषि का है और गर्भ में अंश सूर्यदेव का है तो फिर क्या भय? लोकनिंदा का भय होता तो क्या उसके आह्वान पर दुर्वासा और सूर्य-देव आकर स्थिति स्पष्ट नहीं कर सकते थे? देवों का आह्वान करने वाली स्त्री इतनी कमजोर साबित हुई कि अपनी संतान का त्याग कर दिया और स्त्री जाति के लिए एक मजबूत आदर्श बनने के बजाय उसे उस मर्दवादी सोच के शिकंजे में कस दिया कि स्त्री के गर्भ पर उसका कोई अधिकार नहीं है, वह सिर्फ पुरुष की वंशबेल के लिए उर्वर जमीन भर है।

जब पांडु के वंश-वृक्ष पर संकट आया तब कुंती का यही अभिशाप सामंती सत्ता के लिए वरदान बनकर आया। पांडु अपनी ब्याहता के इस दैवीय शक्ति के आधार पर सगर्व पिता बनने को तैयार हो गए। कुंती तब भी उन्हें कर्ण के बारे में बता सकती थी लेकिन यह मौका भी उसी डर में गंवा दिया कि पति और समाज उसके बारे में क्या कहेंगे। लोग पिता बनने में अक्षम पांडु को कोई दोष नहीं देंगे लेकिन देवों के अंश को अपने गर्भ में धारण करने वाली स्त्री इतिहास के सामने वो कमजोर मोहरा बन जाने को तैयार हो जाती है जो पत्नी को सिर्फ अपने पति की प्रतिनिधि के रूप में देखने की नजर देता है। लोक को पता है कि पांडव पांडु के कुदरती पुत्र नहीं हैं लेकिन हस्तिनापुर नरेश की गरिमा पर कोई आंच नहीं आती है। कुंती अपनी इस दिव्य शक्ति से अपनी सौत माद्री को भी पुत्रवती कर देती है। लेकिन यह बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाती है कि इस शक्ति साधना से एक और देव-पुत्र जन्म ले चुका है।

रंगभूमि में कुंती कर्ण को देखते ही पहचान गई है। अब वो पांडु की विधवा है और दुनिया जानती है कि उसके पास पांच देवपुत्र हैं, जो उसके पति के नहीं हैं। जन्म लेने के बाद जब कर्ण पहली बार उसके सामने खड़ा होता है तो वो कौरवों और पांडवों के बीच है। बात धनुर्विद्या की है तो वह अर्जुन को ही ललकारता है। लेकिन पांडव सहित पांडवों के गुरु भी कर्ण के कुल का उपहास करते हैं। यह वो समय था जब कुंती इतिहास के पन्ने पर अपने मजबूत हस्ताक्षर कर सकती थी, कर्ण को अपनी कोख की पहचान दे सकती थी। लेकिन उसने अपनी भूमिका आंचल के अंदर आंसू बहाती स्त्री की ही चुनी।

कुंती के मौन का नतीजा यह था कि कर्ण को दुर्योधन ने अपनी पहचान दी कुंती के बेटों के खिलाफ ही इस्तेमाल करने के लिए। दुर्योधन पहचान गया था कि अर्जुन की टक्कर का योद्धा कर्ण ही हो सकता है। लेकिन कुंती यह पहचान न बता पाई कि अर्जुन और कर्ण की गर्भनाल एक ही मां से जुड़ी है। कर्ण की पहचान पर मुंह बंद रख कुंती ने उसके दुर्भाग्य का दरवाजा खोल दिया था।

कुंती कर्ण को उसकी पहचान बताने तब जाती है जब पांडवों के जीवन पर संकट देखती है। वह कर्ण को अपनाने नहीं बल्कि पांडवों का वध नहीं करने के लिए मनाने जाती है। उस वक्त तक कर्ण अपना दिव्य कवच-कुंडल भी दान कर चुका होता है। रंगभूमि में हस्तिनापुर की जनता और पूरे राजवंश के सामने चुप रह जाने वाली मां एकांत में अपने बेटे को बताने आती है कि वह उसकी मां है। कर्ण ने वादा किया कि युद्ध के बाद भी कुंती पांच बच्चों की मां रहेगी, यानी युद्ध में या तो अर्जुन बचेगा या कर्ण। यानी उसने अपनी मां को चार पांडवों के वध नहीं करने का वादा तो दे ही दिया था।

बेटे को उसकी मां ने अपनी पहचान दी भी तो इस भय से कि वह उसके जायज बेटों की जान न ले ले। अगर कुंती रंगभूमि में अपनी चुप्पी तोड़ देती तो कर्ण उस तरफ खड़ा नहीं होता जिधर कृष्ण के अनुसार अधर्म था। युद्ध में जीत उसी पक्ष की होनी थी जिधर कृष्ण थे। इतने के बाद भी कुंती ने पांडवों के बारे में सोचा।

कुंती कर्ण के जन्म के राज को लेकर पांडवों के पास भी जा सकती थी। पांच बेटों को बता सकती थी, जिसे तुम सब राधेय कहते हो, वह कौंतेय है, अपने सबसे बड़े भाई की जान के दुश्मन मत बनो। कुंती के पास बेटे के रूप में धर्मराज युधिष्ठिर थे जिनके लिए अपनी मां के आदेश को मानने से बड़ा कोई धर्म न था। कर्ण से तो पांच बेटों की सुरक्षा का वादा मांगा, लेकिन पांच बेटों से अपने बड़े भाई का वध नहीं करने का वादा नहीं मांगा।

कुंती ने युद्ध के पहले युधिष्ठिर को यह बात बताई होती तो युद्ध टल भी सकता था। फिर कुंती ने युद्ध को टालने का विकल्प क्यों नहीं चुना? कुंती के अलावा तो यह बात श्रीकृष्ण भी जानते थे। दोनों जानते थे कि यह बात जानने के बाद युधिष्ठिर युद्ध नहीं करते। लेकिन ये बात धर्मराज को अधर्म के गुजर जाने पर पता चली। तो क्या महाभारत का युद्ध एक वृहत्तर साजिश थी जिसका मोहरा कर्ण भी बन गया। शतरंज की बिसात पर अंत में एक राजा को ही रहना होता है। राजा जितने मोहरे बचा सके उन्हें ही रहना है। इस बिसात में दुर्योधन के साथ जितने मोहरे थे मारे गए। लेकिन जीतने वाले की तरफ भी पांच ही मोहरे बचे रहे।

छल से कर्ण की मौत के बाद जब कुंती उसके शव पर विलाप करती है तो पांडव पूछते हैं कि वे प्रधान शत्रु और सूत पुत्र के शव पर विलाप क्यों कर रही हैं? धर्मराज को धक्का लगता है कि जिसे वे प्रधान शत्रु कह रहे हैं वह उनका बड़ा भाई है, अर्जुन ने अपनी मां के अंश को ही खत्म किया है। इस अधर्म से विचलित होकर युधिष्ठिर अपनी मां के जरिए पूरी नारी जाति को शाप दे बैठते हैं कि वह भविष्य में किसी रहस्य को दबा कर नहीं रख सकेगी।

जो माता अभी तक मिसाल थी, अब वह अपने बेटों के लिए सिर्फ एक सवाल थी कि ऐसा क्यों किया। समय बीतने से पहले जिस कर्ण को अपना कर कुंती नारी जाति के लिए नया रास्ता खोल सकती थी, वह उसके शव पर विलाप करने के बाद स्त्री-पक्ष को विपक्ष में रखने वाले सामंती समाज को ही मजबूत बना गई। महाभारत में छह कौंतेय को समय रहते एक साथ खड़ा कर दिया जाता तो पांच पांडव अपनी माता पर ग्लानि नहीं गर्व कर रहे होते। अपने सच को लेकर कमजोर पड़ने के कारण कुंती लोक मानस में नारी जाति पर अभिशाप के शोक के रूप में देखी जाने लगी। स्त्री को लेकर लोकोक्तियों में युधिष्ठिर का शाप ही स्थिर हो गया।

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