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मिठुन दादा के नागलोक और ममता दीदी के चंडीपाठ के बाद दिल्ली के सीएम विधानसभा में एलान कर रहे थे कि राम मंदिर बनने के बाद वे दिल्ली के सभी बुजुर्गों को वहां मुफ्त यात्रा पर ले जाएंगे। उन्होंने खुद को हनुमान और राम का बड़ा भक्त साबित करने की कोशिश की।

BJP politics, election 2021, TMCचुनावी सभा में पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार के शिक्षा और स्वास्थ्य बजट की जब पूरे देश में तारीफ हो रही थी तभी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल विधानसभा में एलान करते हैं कि अयोध्या में राम मंदिर बनने पर वे दिल्ली के सभी बुजुर्गों को वहां की मुफ्त यात्रा कराएंगे। उन्होंने अपनी सरकार के लोकोन्मुखी बजट के पीछे रामराज्य की प्रेरणा बताई। केजरीवाल के साथ पहले भी ऐसा होता रहा है कि जब उन्हें वाम का लाल सलाम ठोके जाने की तैयारी होती है तो वे भगवा बोली बोलने लगते हैं। दिल्ली सरकार के रामराज्य से लेकर ममता बनर्जी के चंडीपाठ तक में हम देख सकते हैं कि पूरे देश में राजनीति और चुनावी खेल के नियम भाजपा तय कर रही है। मिठुन चक्रवर्ती भाजपा में शामिल होते ही कोबरा की तरह डंसने की बात कह महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे को पीछे धकेल देते हैं। चुनावी मंच पर मिठुन का ऐसा संवाद जिस चुनावी रणनीति का हिस्सा है उसी की बात करता बेबाक बोल

‘आमी जोल ढोराउ नोई, बेले बोड़ाउ नोई … आमी एकटा कोबरा, गोखुरो आमी, एक छोबले छोबी’(मैं पानी का सांप नहीं हूं, मैं एक कोबरा हूं, गोखुर हूं मैं, डंस दिया तो फोटो बन जाओगे।)
तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा रहे मिठुन चक्रवर्ती ने भाजपा में शामिल होते ही चुनावी मंच से यह संवाद बोल कर सभी को चौंका दिया। इसे हिंदी फिल्मों की तर्ज पर पैसा वसूल बोल कहा जा सकता है। इंटरनेट कोबरा डांसर के मीम से भर गया और हर तरफ इसी की चर्चा होने लगी। ध्यान रहे कि यह संवाद बंगाल चुनाव के संदर्भ में है। कल तक रसोई गैस सिलेंडर लेकर घूम रहीं और स्कूटी चला रहीं ममता बनर्जी अचानक बंगाल के भद्रलोक का अंदाज छोड़ भाजपालोक के मंच को जवाब देने लगती हैं कि मैं हिंदू हूं और घर से चंडीपाठ करके निकलती हूं। सवाल है कि धर्मनिरपेक्षता की पहचान वाली नेता को मंच से चंडीपाठ करने को क्यों मजबूर होना पड़ता है?

पिछले कोई एक दशक में बंगाल में नंदीग्राम की अहम भूमिका रही है। वहां से उठे जन-संग्राम ने ही वामदलों को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया था। नंदीग्राम पहचान बना था नवउदारवादी सुधार बनाम सरकार का। लेकिन आज उसी नंदीग्राम के बारे में ममता बनर्जी ने कहा-नंदीग्राम में जब आंदोलन हो रहा था तो मेरे घर काली पूजा चल रही थी। सिंगुर और नंदीग्राम को मैं ही लेकर आई हूं।

मिठुन दादा के नागलोक और ममता दीदी के चंडीपाठ के बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री विधानसभा में एलान कर रहे थे कि राम मंदिर बनने के बाद वे दिल्ली के सभी बुजुर्गों को वहां मुफ्त यात्रा पर ले जाएंगे। विधानसभा के अंदर उन्होंने खुद को हनुमान और राम का बड़ा भक्त साबित करने की कोशिश की। इसके पहले दिल्ली के बजट में तिरंगे और देशभक्ति के पाठ्यक्रम पर जोर दिया ही जा चुका है। पांच राज्यों के अहम चुनाव में बंगाल से लेकर दिल्ली तक ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल वही भाषा बोल रहे हैं जो केंद्रीय सत्ता का शक्ति प्रदर्शन उन्हें जनता के सामने बोलने के लिए विवश कर रहा है।

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का बजट भाषण हो या फिर ममता बनर्जी का हिंदू कार्ड, उसे बंगाल के संदर्भ में किस तरह देखा जाए। पूरे देश में आम आदमी पार्टी के शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट को लेकर जितनी चर्चा हुई उतना ही पाठ उसके देशभक्ति वाले अध्याय का भी हुआ। चुनावों के इस मौसम में आम आदमी पार्टी शिक्षा और स्वास्थ्य तक ही सीमित रह कर अपना अलग चेहरा दिखा सकती थी। लेकिन उसके शिक्षा बजट में केंद्र सरकार के प्रस्तावित सैनिक स्कूल वाली राष्ट्रवादी छाप दिखी। आम आदमी पार्टी ऐसा पहले भी करती रही है। जब उसे कुछ वाम जैसा खिताब दिया जाने लगता है तभी वह खास राष्ट्रवादी सुर लेकर आम ही रह लेने में भलाई समझती है।

हम इस अवधारणा को बंगाल से ही समझ सकते हैं। वहां जब वाम हारा था तो भी उसका ही एजंडा चल रहा था। निजीकरण, सिंगुर और नंदीग्राम पर ममता बनर्जी का जनवादी सुर था। तब मां, माटी और मानुष के नारे में सर्वहारा को साथ लेकर चलने का वामपंथी तेवर था। दो रुपए किलो चावल से लेकर कमजोर तबके के लिए कई सरकारी योजनाएं थीं। चुनाव में ममता बनर्जी जीती थीं लेकिन जनता का मनोविज्ञान वाम आधारित जनवादी और आंदोलनकारी ही था। अपने जिस एजंडे पर वाम खरा नहीं उतर सका उसी के विकल्प के तौर पर ममता बनर्जी आईं।

आज बंगाल में यह अवधारणा बदल गई है क्योंकि केंद्रीय सत्ता और दल के रूप में भाजपा काफी मजबूत हो चुकी है। अब विपक्ष को उसके खिलाफ उतने ही मजबूत तरीके से एजंडा लाना होगा, वह लाया भी गया लेकिन उसे मुद्दा बनाए रखने में कितना कामयाब होगा यह देखने की बात होगी। बिहार चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने एजंडा तय करने की अगुआई की थी और सरकार बनाते-बनाते रह गए थे। तेजस्वी के बेरोजगारी और सरकारी नौकरी देने का एजंडा तय करते ही भाजपा अपने तेवर में आ गई थी और विपक्ष का मुकाबला कर लिया था। लेकिन बंगाल में भाजपा खेल के मैदान का पिच अपने हिसाब से नम रखने में कामयाब होती दिख रही है। केंद्रीय सत्ता को अपने फैसलों का बचाव करना रहता है। वह तो हमेशा यही रणनीति बनाएगी कि रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों को बेदखल ही रखा जाए।

भाजपा ने जो चुनावी कथ्य तैयार किया है उसकी मजबूत कथा है मिठुन चक्रवर्ती जैसा लोक लुभावन संवाद। उसने जनता के अंदर जो मानसिकता बनाई है यह उसी निर्मिति का परिणाम है। मिठुन चक्रवर्ती का संवाद उस रणनीति का हिस्सा है जो पूरी चुनावी पटकथा को बदल चुका है। पेट्रोल, महंगाई और नौकरी को छोड़ अभी तक धर्मनिरपेक्ष छवि के नेताओं को अपने हिंदू होने का सबूत देना पड़ रहा है।

मिठुन चक्रवर्ती जैसे अभिनेता का अपना एक दर्शक वर्ग रहा है। वे अपने संवाद से उस वर्ग की भुजाएं फड़कवाने में कामयाब होते हैं जो कुछ समय पहले रोजगार के सवाल पर बात कर रहा था। टीवी से लेकर इंटरनेट पर यह संक्रामक होकर फैलता है। लोक लुभावन छवि वाले अभिनेता को नेता बनाना हर पार्टी अपनी जरूरत समझती है। इनका आकर्षण उस बड़े वर्ग में होता है जो मतदान केंद्र तक जाता ही है। कभी मिठुन की इस छवि का इस्तेमाल तृणमूल कांग्रेस ने उन कामगारों को अपनी तरफ करने के लिए किया था कि माकपा ने उनके रोजगार का कितना नुकसान किया है। आज मिठुन का इस्तेमाल भाजपा उसी रोजगार के मुद्दे से ध्यान बंटाने के लिए कर रही है।
मिठुन जैसे नेता कभी तृणमूल तो कभी भाजपा की लिखी पटकथा की संवाद अदायगी करते हैं। लेकिन इन सबका अंतिम नुकसान जनता का राजनीतिकरण किए जाने से होता है।

कभी जन सरोकार की राजनीति सकारात्मक पक्ष में देखी जाती थी जो जनतांत्रीकरण की अनिवार्य शर्त होती थी। इसी से जनता राजनीतिक दल को अपने प्रति जिम्मेदार बना सकती थी। वह शासन व्यवस्था में हस्तक्षेप का खौफ पैदा कर सकती थी। लेकिन अब जनता द्वारा ही उस जनतांत्रीकरण की प्रक्रिया को पीछे धकेलने की कोशिश हो रही है। इसे जनता के ही द्वारा अपने ही खिलाफ राजनैतिक चेतना बनाने की मुहिम के तौर पर देखा जा सकता है। केंद्रीय सत्ता के खिलाफ विपक्ष की लड़ाई कभी आसान नहीं रही है। विपक्ष के कमजोर होते ही जनता मौजूदा केंद्रीय सत्ता के साथ उसे कह देगी-मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है?

पश्चिम बंगाल में सामाजिक-आर्थिक विषयों पर नाटकों के मंचन के लिए मशहूर एक थिएटर ग्रुप के अभिनेता कौशिक कर के भाजपा में शामिल होने के बाद इस ग्रुप ने उन्हें अपने नाटक से बाहर कर दिया है। सौरभ पालोधी ने अपने आधिकारिक फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट किया कि कलाकार कौशिक कर को भाजपा में शामिल होने के कारण नाटक से हटा दिया गया है। पालोधी का नाटक ‘घूम नेई’ उत्पल दत्त के क्लासिक नाटक पर आधारित है जिसमें वाम विचारधारा के चश्मे से देश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को दर्शाया गया है।

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