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बेबाक बोल : विश्वाणु

बाजार के स्तर पर एक हुई दुनिया की गति कोरोना के विषाणु ने मंद कर दी तो अहसास हुआ कि पूंजी के वैश्वीकरण के साथ रोगाणु भी नत्थी होंगे। विषाणु का हमला और मानव जाति की यह लड़ाई नई नहीं है और जल्द ही हमारा समुदाय भी कोरोना के साथ दोस्ताना हो जाएगा। लेकिन तब तक ग्लोब की रुकी गति बता रही है कि अमेरिका के स्वास्थ्य क्षेत्र में मुनाफाखोरी का ढांचा कैसे नाकाम हो रहा है और अलग-थलग किए क्यूबा के आविष्कार में दुनिया उम्मीद देख रही है। स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक ढांचे को मजबूत किए बिना नए कोरोना की बात तो छोड़िए पुराने मलेरिया, डेंगू, निमोनिया और दिमागी बुखार से हुई मौतों को भी नहीं रोका जा सकता है। विषाणु वैश्विक हो या स्थानीय उससे लड़ने के लिए सबसे जरूरी है घर के पास एक अदद अस्पताल। घर में बंद इंसान बनाम वैश्विक विषाणु पर बेबाक बोल।

पूरा विश्व कोरोना वायरस से पीड़ित

मेरिकी निर्देशक टॉड फिलिप्स की फिल्म ‘जोकर’ का यह संवाद उस पूरी व्यवस्था पर तमाचा है, जो अमेरिका से लेकर भारत तक संक्रामक तरीके से फैली। ‘जोकर’ में अस्सी के दशक का अमेरिका है। इसका जोकर उस समय के अमेरिकी समाज के विरोधाभास का प्रतीक है। जोकर उस अमेरिका का प्रतीक है, जहां लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा खारिज कर मुनाफे की अर्थव्यवस्था शुरू कर दी गई थी। राज्य नागरिकों के कल्याण से अपने हाथ खींच कर खुद को बाजार के हवाले कर रहा था। असफल और हताश नागरिक शहर के गंदे कोने में नारकीय जीवन जीने को मजबूर थे। ‘जोकर’ का नायक आर्थर (वाकिन फीनिक्स) हताशा और असफलता की वजह से अपने मानसिक रोग का इलाज करवाने के लिए एनजीओ जैसी एक संस्था पर निर्भर है। एक दिन उसकी डॉक्टर अचानक उसे खबर करती है कि उसके इलाके की फंडिंग बंद हो गई है और उसे वहां से अपना काम समेटना पड़ेगा। फिल्म का नायक आर्थर सवाल करता है कि फिर मुझे दवा कौन देगा। उसकी डॉक्टर के पास इसका कोई जवाब नहीं होता कि उसे दवा कौन देगा। फंडिंग बंद तो दवा बंद। नागरिक का स्वास्थ्य राज्य की जिम्मेदारी नहीं है।

टॉड फिलिप्स के नायक जोकर के सामने जैसे-जैसे समाज और राजनीति का सच सामने आने लगता है वैसे-वैसे वह गंभीर होने लगता है। उस समय का अमेरिकी समाज जैसे को तैसा में यकीन कर रहा था, तो जोकर भी उसी हिसाब से अपने मापदंड तय कर लेता है और जिसे मौत मिलनी चाहिए उसे मौत दे देता है। कोरोना विषाणु के संक्रमण के समय में इस फिल्म पर चर्चा इसलिए की क्योंकि यह फिल्म आपको गहरे अवसाद से भर देती है। अवसाद का कारण है सच्चाई का सामने आना और कई तरह के भ्रम का टूटना। एक विषाणु का संक्रमण फैला और पूरी दुनिया ने चीन पर अंगुली उठाई। चीन ने अमेरिका पर और उसके बाद रूस ने अपने परंपरागत जासूसी तरीके से इसे अमेरिका की नस्लीय साजिश ही बता डाला। जब एक बीमारी को लेकर विश्व की महाशक्तियां एक-दूसरे पर अंगुली उठाएं, साजिश का आरोप लगाएं तो इसके खतरे को समझा जा सकता है। इस उलटफेर को समझा जा सकता है कि तीसरी दुनिया कहे जाने वाले देश अपने यहां यूरोपीय लोगों के आगमन को रोक रहे हैं। हर कोई अलग-थलग हो जाना चाह रहा है। अपनी धुरी पर तेजी से घूर्णन कर रहा ग्लोब अचानक रुक-सा गया है। दुनिया भर के शेयर बाजार के सूचकांक बता रहे हैं कि इसके बाद बेकारी और गुरबत के आंकड़े किस हौलनाक हालात में जा सकते हैं।

कोरोना विषाणु का वैज्ञानिक पहलू तो यही है कि पिछले काफी समय से लगातार नए विषाणु पनप रहे हैं। आज एक है तो कल दूसरा आ जाता है। जानमाल के खासे नुकसान के बाद उनकी दवा खोज ली जाती है। लेकिन सबसे बड़ा खतरा यह है कि अब सारे विषाणु वैश्विक हो जाते हैं और आज पूरी दुनिया के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है।पिछले दशकों में वैश्वीकरण की प्रक्रिया में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ गई। यह एक बड़ा सच है कि जब देशों की अर्थव्यवस्था जुड़ती है तो वहां के नागरिक भी जुड़ते हैं। बाजार का जुड़ना लोगों का जुड़ना भी होता है, जीवन पद्धति का भी जुड़ाव होता है। सिर्फ पूंजीपति नहीं, कामगार भी जुड़ते हैं। पूंजी के साथ श्रम का मिलन होता ही है। मुद्रा के साथ मजदूर को अलग नहीं किया जा सकता है।

पहले जब इस तरह के विषाणु का फैलाव होता था और उससे महामारी पनपती थी, तो उसकी एक स्थानीयता होती थी। खास जलवायु के अंदर ही उस पर काबू पाना होता था और उसे स्थानीय स्तर पर दबाया जा सकता था। लेकिन अब महामारी ने वैश्विक रूप ले लिया है। बाजार के स्तर पर एक हुई दुनिया पर जब महामारी की मार पड़ती है तो फिर समझ आता है कि यह दुनिया कितनी अलग है। रोग एक है लेकिन रोगियों की सरकारें अलग हैं, उनके डॉक्टर और अस्पताल अलग हैं। कोरोना का खौफ चीन से उठा। आज के दौर में चीन सिर्फ एक देश नहीं है। चीन में पूरी दुनिया के कारखाने की मशीन चल रही है, जहां ज्यादातर देशों के लिए उत्पादन हो रहा है। उत्पादन तो चीन में हो रहा है लेकिन इसका वितरण पूरी दुनिया में हो रहा है। तो यहां से निकले कोरोना का भी पूरी दुनिया में वितरण हो ही गया। यह यूरोप तक पहुंच गया और लगभग पूरा एशिया चपेट में है। अब भी अगर हम यह समझें कि वैश्वीकरण सिर्फ पूंजी का होगा तो ऐसा संभव नहीं है। पूंजी के साथ स्वाभाविक रूप से रोगाणुओं का भी वैश्विक मिलन नत्थी हो ही जाएगा।

वैश्वीकरण के साथ स्वास्थ्य सुविधा और तकनीक का पेटेंट कर मुनाफाखोरी का जो खेल शुरू हुआ था, वह अब कड़वा सच बन कर हम सबके सामने खड़ा है। भारत जैसे देश में जहां जनसंख्या घनत्व बहुत ज्यादा है और स्वास्थ्य सुविधाओं की गुणवत्ता पर सवाल हैं वहां इस महामारी के प्रकोप को कैसे देखेंगे। दुनिया में जो हालत चीन की है वैसी ही भारत में केरल जैसे राज्य की है। आज पूरी दुनिया में केरल के लोग फैले हुए हैं। दुनिया में फैली हर संक्रामक बीमारी की मार केरल पर पड़ती है। यह सूबा इस तरह के संक्रमण से निपटना भी सीख रहा है। याद रखें कि केरल में अन्य राज्यों के मुकाबले सामुदायिक स्वास्थ्य सेवा बेहतर है इसलिए यहां महामारी जैसे हालात पर काबू भी पा लिया जाता है। केरल के उदाहरण का अर्थ यह है कि वैश्विक हो चुके विषाणुओं का मुकाबला सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा के बिना नहीं किया जा सकता है।

कोरोना विषाणु और चीन की सीमा के पास तैनात कोरोना से संक्रमित भारतीय सेना के जवान ने हमारे सामने भूमंडलीकरण की सीमा रख दी है। अचानक से पूरी दुनिया की तालाबंदी की नौबत आ गई है। शिक्षा और सेहत किसी भी देश की रीढ़ होते हैं और ज्यादातर देशों ने इसे बाजार के हवाले कर दिया। अब जब आपकी आवाजाही पर कोरोना का ताला लग जाएगा तो इस आकस्मिक हालात का सामना अपने स्थानीय संसाधनों से ही करना पड़ेगा। बाजार आधारित व्यवस्था का हाल तो यह है कि पैसे वाला इंसान अपने घर में मास्क और विषाणुनाशक का भंडार कर लेगा, लेकिन यह नहीं सोचेगा कि उसके आसपास सभी के हाथ ठीक से धुलेंगे तभी उसकी जान भी बचेगी। यहीं पर हमें अजर अमर सी सामुदायिकता और लोक कल्याणकारी सरकार की अहमियत समझ आती है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद ही लोगों को साम्राज्यवाद खलनायक की तरह महसूस हुआ और संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच की जरूरत महसूस हुई। कोरोना के विषाणु की व्यापकता के बाद अहसास हुआ कि इसकी मार हर वर्ग और धर्म से परे है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। यह लड़ाई आम जनता और सरकार दोनों को मिलकर लड़नी है।

जिस विश्व स्वास्थ्य संगठन को अमीर देशों ने हाशिए पर रख दिया था अब उसे भी नई नजर से देखा जा रहा है। महाशक्ति का दर्जा पाए राष्ट्राध्यक्ष इस कमजोर संस्थान के बयान के साथ पत्रकारों से मुखातिब हैं। जिन डोनाल्ड ट्रंप ने अपने अहंकार में कोरोना को हल्के में लिया था अब उनके चेहरे पर खौफ को पूरी दुनिया देख रही है। कोरोना ने ग्लोब की गति को मध्यम कर हर चीज के बारे में फिर से सोचने का मौका दिया है। स्थानीयता को नया संदर्भ मिला है। जिस क्यूबा को पूरे अलगाव में रखा गया था उसके अनुसंधान और उसके ढांचे पर बात हो रही है। दम तोड़ रहे दक्षेश के मंच को नया जीवन मिला है। वोट बैंक की राजनीति कर रहे भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को अहसास हो गया है कि उनकी साझा रीढ़ की हड्डी को मजबूत करना ज्यादा जरूरी है अमेरिका को अपनी मजबूरी बनाने के बजाय। रोगाणु के हमले से मानव जाति की यह लड़ाई नई नहीं है।

प्लेग, इन्फ्लूएंजा से लोहा ले चुका विज्ञान, जल्द ही कोरोना के साथ भी दोस्ताना हो जाएगा। इस बार नया है वैश्विक खौफ जिसके अन्य पहलुओं पर आगे बात होगी कि यह कितना स्वाभाविक था और कितना गढ़ा हुआ। खौफ फैलने का खतरा हम देख चुके हैं कि दिल्ली के अस्पताल में कोरोना के संदिग्ध मरीज ने सातवीं मंजिल से कूद कर खुदकुशी कर ली। विषाणु तो फिर भी काबू में आ जाता लेकिन खौफ जानलेवा बन गया। भारत जैसी बड़ी जनसंख्या और शिक्षा व सुविधाओं की असमानता के बीच खौफ का फैलना ज्यादा नुकसानदेह होगा। अभी तो इंसान के बीच कोरोना नया मेहमान है, तो पहले इसे जरा विशेषज्ञों को समझने देते हैं। तब तक एक-दूसरे का खयाल रखते हुए किसी भी तरह के खौफ से दूर रहें।

‘जब शहर की हालत खराब हो रही थी तो अधिकारियों ने चूहों को इसकी वजह बताया।’

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