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बेबाक बोलः विदुर वर्ग

प्राचीनकाल से ही दुनिया भर के शासक वर्ग को इस बात का अहसास रहा है कि किसी भी तरह का युद्ध आधा तो मनोवैज्ञानिक तरीके से ही जीत लिया जाता है। महाभारत का युद्ध इसकी शुुरुआती मिसाल है कि मन के जीते जीत है। सत्ता के लिए यही काम बुद्धिजीवी वर्ग करता आया है उसका अनुषंगी बन कर। विदुर जैसे नीतिकार आज सत्ता के लिए जनमत निर्माण करते हैं। राजा और प्रजा को धर्म की डोर से जोड़ने वाले इस वर्ग का धर्म बदलती सत्ता के साथ बदलना है। ‘विदुर नीति’ इतनी लचीली है कि वह कौरवों के अधर्म और पांडवों के धर्म दोनों के साथ सामंजस्य कर लेती है। बुद्धिजीवी वर्ग बखूबी जानता है कि उसका काम सिर्फ नीतियों को बनाना है, उसे लागू करना नहीं। वह सबकी जिम्मेदारी तय करेगा लेकिन खुद किसी भी परिस्थिति के लिए जिम्मेदार नहीं होगा। हर जलवायु में अपने अनुकूल मौसम बनाने वाले विदुर वर्ग पर बेबाक बोल।

‘विदुर नीति’ का मूल सार है, किसी भी तरह राजसत्ता के साथ बने रहना।

कोरोना काल में जब बिहार में चुनावी चर्चा शुरू हो चुकी है तो ऐसे समय में एक प्राचीन प्रतीक मिल जाएगा। मानसून में चर्चा उस मौसम वैज्ञानिक की जो सत्ता की हवा का रुख भांप खुद को किसी भी तरह के पर्यावरण संकट से महफूज रख लेता है। सत्ता को साधने का यह ज्ञान शुरू होता है महाभारत काल से। आज जिसे तुरुप का पत्ता या ‘मास्टर स्ट्रोक’ कहते हैं, महर्षि वेदव्यास ने उसे उद्योग पर्व में ‘विदुर नीति’ का नाम दिया है। सत्ता के साथ चलने और बदलने वाले इस वर्ग को उस समय भी ‘कागजी क्रांति’ की अहमियत पता थी। उसे मालूम था कि उसका समय कभी नहीं जाएगा। उस दौर से ही इस वर्ग की विशेषता रही है कि उसे सिर्फ नीति बनानी है, लागू करने की जिम्मेदारी नहीं लेनी है।

महाभारत के चरित्रों के चित्रण को उनके जन्म के साथ जोड़ा गया है। विदुर का व्यक्तित्व भी जन्म के हिसाब से अहम है। धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर के पिता वेदव्यास हैं। लेकिन विदुर की माता दासी हैं। इसलिए सबसे योग्य होने के बावजूद वे राजगद्दी के हकदार नहीं हैं। वे बार-बार खुद को दासीपुत्र कह खुद को हीनता के शिकार भी जताते हैं। अपने दो भाइयों को राजगद्दी का हकदार देख विदुर के व्यक्तित्व में कई तरह की कुंठा का आना स्वाभाविक था। इसी कुंठा में वे धृतराष्ट्र को राजा बनने से रोकते हैं। विदुर को पहले ही धर्म और नीति का अवतार घोषित किया जा चुका था। उनके कारण पहली बार धृतराष्ट्र अपनी शारीरिक कमी के कारण खारिज होकर हीनता के शिकार होते हैं। हस्तिनापुर के अभिभावक भीष्म द्वारा धृतराष्ट्र को महाराज घोषित करते ही विदुर अपनी नीति को खलनायक की तरह सामने लाकर पांडु को नायक बनाने का श्रेय ले जाते हैं। खुद को दासीपुत्र कह-कह कर राजपुत्रों के भाग्य विधाता बन जाते हैं। राजगद्दी के लिए धृतराष्ट्र को खारिज करने के साथ ही कुरुक्षेत्र का मैदान तैयार हो जाता है, जिस पर विदुर बहुत सावधानी और सतर्कता से अपनी नीति को आगे बढ़ाते हैं।

जिस धृतराष्ट्र को विदुर पहले अयोग्य ठहराते हैं, पांडु के निधन के बाद उसके ही राजा बनने के तर्क भी खोज लाते हैं। द्रौपदी के चीर हरण के वक्त विरोध की औपचारिकता निभा उस अधर्म को करने वालों के साथ रहने में भी उन्हें कोई संकोच नहीं होता। वे धृतराष्ट्र को द्युत सभा नहीं करवाने के लिए राजी भी नहीं करवा पाए थे। द्रौपदी ने चीर हरण के वक्त जिन लोगों को अधर्म का साथ देने के लिए शाप दिया सभी ने उसे भुगता। सिर्फ विदुर को शापरोधी रख वेदव्यास ने आगे के लिए संकेत दे दिए थे कि कोई बदलाव इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा क्योंकि ये बदलाव लाने की क्षमता रखने वालों के पक्ष में बदल जाएंगे।

पांडवों के सत्ता से बाहर होने के बाद विदुर कौरव पक्ष में मंत्री रहते हुए भी खुलेआम पांडवों के साथ रिश्ता बनाते हैं। लेकिन कौरवों से रिश्ता तोड़ते नहीं हैं क्योंकि उन्हें भान है कि सत्ता के साथ रह कर ही उनका महत्व कायम रह सकता है। सत्ता में बदलाव की गंध सूंघ धर्म के नाम पर विपक्ष में भी अपनी स्वीकार्यता बनाए हुए थे।

दासीपुत्र की पहचान को विनम्रता से रखते हुए विदुर ने कभी भी सीधे तौर पर राजगद्दी पर अपने हक की मांग नहीं रखी। लेकिन उनकी पहचान उस राजवंश से जुड़ी हुई है। उन्हें क्षत्रिय होने का हक नहीं था। राजवंश में वे अपनी योग्यता और अयोग्यता के भंवर में फंसे रहते हैं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक तौर पर उनका व्यक्तित्व भीष्म की तरह कुंठाविहीन नहीं था। भीष्म का राजसत्ता से एक निष्पक्ष संबंध था जिसमें किसी तरह की हीनता नहीं थी। ऐसी स्थिति में विदुर धर्म और नीति की व्याख्या के जरिए अपना महत्व स्थापित करते हैं। विद्वान के रूप में मुकाम हासिल कर सत्ता को अपनी तरह से परिभाषित करना शुरू कर देते हैं।

नीति का संबंध नियम और मर्यादा से है। यह नियम राजसत्ता ही तय करती है। राजसत्ता के बदलते ही नियमों को अपने अनुकूल बना लिया जाता है। विदुर में हम आज के ‘सफल’ नेताओं की छवि देख सकते हैं। विदुर कौरवों के राज में धृतराष्ट्र के मंत्री हैं तो पांडवों का राज आते ही युधिष्ठिर के सबसे प्रिय बन उनके भी मंत्री बन जाते हैं। ध्यान दें कि महाभारत के युद्ध के बाद कौरवों के पक्ष के एकमात्र विदुर को ही नई सत्ता में हिस्सेदारी मिलती है। ‘विदुर नीति’ वह है जो धृतराष्ट्र के अधर्म और युधिष्ठिर के धर्म के साथ समायोजित हो जाए।

‘विदुर नीति’ का मूल सार है, किसी भी तरह राजसत्ता के साथ बने रहना। यह नीति आपको भविष्य देखने में पारंगत कर वर्तमान को लेकर निश्चिंत बनाती है। विदुर नीति में स्पष्ट था कि भविष्य में राजसत्ता वहीं होगी जिधर कृष्ण होंगे, जिसे धर्म का नाम दिया गया है। इसी वजह से धृतराष्ट्र के साथ उनका जो संबंध बन रहा है वह दुर्योधन के खिलाफ बन रहा है। दुर्योधन उन्हें बाहर भी निकाल देता है और वे जंगल तक चले जाते हैं। लेकिन धृतराष्ट्र को महसूस होता है कि वो अकेले पड़ गए हैं तो उन्हें वापस बुलाते हैं। धृतराष्ट्र के पास विदुर के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा गया है और विदुर भी घर वापसी नहीं करने का कोई संकल्प नहीं लेते हैं। बुलाने पर वे आराम से अधर्म की मोहर वाले खेमे में लौट भी जाते हैं। वे अपनी नीति को इतना लचीला बना लेते हैं कि स्वाभिमान जैसे किसी भी भाव को अपने व्यक्तित्व के पास फटकने तक नहीं देते हैं।

यह स्व-विहीन व्यक्तित्व विदुर की निर्मिति के साथ जुड़ा हुआ है। अगर वे स्वाभिमान का बोझ उठाते हैं तो उन्हें राजसत्ता के खिलाफ खड़ा होना होगा जो वे बिलकुल नहीं चाहते हैं। इस स्वाभिमान की कमी को वे निष्पक्षता का दुशाला ओढ़ ढकने की कोशिश करते हैं जो कृष्ण के आते ही उघड़ जाता है। कृष्ण वो मनोवैज्ञानिक हैं जो सत्ता में विदुर जैसे बौद्धिकों की जरूरत समझते हैं। युद्ध रोकने के लिए कृष्ण जब शांतिदूत बन कर हस्तिनापुर आते हैं तो दुर्योधन की जगह विदुर का आतिथ्य स्वीकार करते हैं। इस तरह वे युद्ध के पहले ही कौरवों के मनोबल को तोड़ने में कामयाब हो जाते हैं। विदुर और कृष्ण दोनों ने युद्ध नहीं लड़ने की शपथ ली है। कृष्ण तो मैदान में अर्जुन के सारथी हैं ही लेकिन विदुर मैदान के बाहर से भी कौरवों का मनोबल तोड़ कर पांडवों को फायदा पहुंचा रहे थे।

युद्ध की स्थिति में विदुर अपनी नीति से खुद को निष्पक्ष रूप से खड़ा रखते हैं लेकिन राजसत्ता बदलते ही वे जीते हुए पक्ष के पक्षकार बनना सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं। आज के बौद्धिक वर्ग का आरंभिक रूप हम विदुर में देख सकते हैं। विदुर अपनी नीति के जरिए आज उन लोगों की अगुआई करते हैं जो अपने अस्तित्व के लिए राजसत्ता की दया पर निर्भर हैं। वे अपनी योग्यता और क्षमता की धार सत्ता के औजार से ही तेज करते हैं।

दुर्योधन की छवि खलनायक की है। लेकिन किसी भी कीमत पर दोस्ती निभाने और अपने पक्ष पर तटस्थ रहने की उसकी खूबी आज नहीं दिखती है। वहीं, विदुर महाभारत की ऐसी देन हैं जिसकी हर खेमे में भरमार है। ‘विदुर नीति’ को आज के भारत में जनमत निर्माण कहते हैं। जनमत को प्रभावित करने वाला जानता है कि राजसत्ता के साथ जुड़ कर ही अपने विचार को कारगर कर सकता है। वह अपने बौद्धिक वंदनवार के जरिए अपने महत्व को भी पाना चाहता है और सत्ता के महत्व को भी बनाए रखना चाहता है। यहां सवाल उठ सकता है कि यह वर्ग तो खुद को सत्ता के प्रतिरोध का प्रतीक मानता है। जी, वो विरोध तब आता है जब सत्ता के बदलने की गुंजाइश आती है। सत्ता में बदलाव के साथ विरोध हम साथ-साथ हैं के नम्र अनुरोध में बदल जाता है, जिसे आम भाषा में मौकापरस्ती कहते हैं। दरअसल, ‘विदुर नीति’ सत्ता में बौद्धिक वर्ग के शुरुआती अवसरवाद का ही रूप है।

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