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बेबाक बोलः राजकाज- खिलते पद्म

नागरिक पुरस्कारों का उद्देश्य होता है दलगत और विचारगत भावनाओं से ऊपर उठकर काम करने वाले नागरिकों का सम्मान करना। राज्य का यह राजधर्म है कि वह अपने उन नागरिकों की प्रशंसा करे जो निज से निकल कर समाज के बृहत्तर के लिए काम करते हैं। भारतीय गणतंत्र में नागरिक पुरस्कारों में पद्म पुरस्कारों का अपना नूर भी रहा है लेकिन सत्ता की चौखट पर खड़े ज्यादातर चेहरों के नाम ही रहने के कारण यह बेनूर भी होता गया। इस गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जब केंद्र सरकार ने पद्म पुरस्कारों की सूची जारी की तो दिल्ली वाले तंत्र से हाशिए वाले गण को जोड़ने की कोशिश दिखी। गुमनाम नायकों को ‘दरबार हॉल’ का निमंत्रण बसंती बयार की तरह सुखद है। विशिष्टों की सेवा में जुटे डॉक्टरों, ‘समाज सेवकों’ और दरबारियों को इस सूची से बाहर रखने के लिए सरकार को बधाई। गणतंत्र के 69वें साल में 99 साल के सुधांशु विश्वास इस बात के लिए सम्मानित होते हैं कि उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों को शिक्षा देने में समर्पित किया। इस बार के बेबाक बोल में उन गुमनाम नायकों को सलाम जो अरस्तू को सही साबित करने में जुटे हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।

केरल में ताड़ के पत्तों से बनी झोपड़ी में रहने वाली लक्ष्मीकुट्टी के साथ पद्म पुरस्कारों में एक चौंकाता हुआ नाम है सुभाषिनी मिस्त्री का। जिन्हें पद्म से सम्मानित किया जाएगा।

सूची आई क्या? गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर बहुत से मित्रों के संदेश आ रहे थे। वे जानना चाह रहे थे कि इस साल सरकार ने किन लोगों को पद्म पुरस्कारों से नवाजा है। देर शाम सूची आने के बाद संदेश के बदले सीधे फोन आने लगे। नामों पर बात शुरू हो गई। दिल्ली और मुंबई मुख्यालय वाला मीडिया परेशान था कि इन लोगों की बाइट तो दूर इनके बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं मिली। जब ज्यादातर पत्रकारों को ‘पद्मावत’ के दर्शक गिनने में जुटा दिया गया था तो उनके बारे में कौन जानकारी लाता जो दिल्ली से बहुत दूर थे, ‘पेज थ्री’ के चमचमाते पन्नों पर जिनकी कभी तस्वीर नहीं आई थी।

जब लोगों को गूगल खोज करने पर भी ज्यादा पता न चले कि ये कौन तो पद्म पुरस्कारों के लिए इनसे बेहतर चेहरे नहीं हो सकते थे। पद्म पुरस्कारों को सत्ता की चौखट पर रहने वाली चौकरी के चेहरों से बाहर ले जाने के लिए केंद्र सरकार बधाई की हकदार है। केरल की आदिवासी महिला लक्ष्मीकुट्टी अपने पुरखों से मिले ज्ञान से औषधि तैयार करती हैं, जिसे बाजार में हर्बल मेडिसिन कहा जाता है। वे जिस इलाके में रहती हैं वहां के आम लोगों की बड़ी समस्या हैं सांप-बिच्छू और कीट। लक्ष्मीकुट्टी इन वषैले जीवों के जहर की भी दवा तैयार करती हैं। हजारों लोगों को उनकी औषधि से फायदा पहुंचा है। केरल के ही एमआर राजगोपाल को भी पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। नवजातों के स्वास्थ्य पर उनका उल्लेखनीय काम है। इस सूची में हिमाचल के भिक्षु चिकित्सक भी हैं जो स्थानीय लोगों की सेहत संभालने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर चुके हैं।

केरल में ताड़ के पत्तों से बनी झोपड़ी में रहने वाली लक्ष्मीकुट्टी के साथ पद्म पुरस्कारों में एक चौंकाता हुआ नाम है सुभाषिनी मिस्त्री का। मेहनत-मजदूरी कर अपना घर चलानेवाली सुभाषिनी के पति ने इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया। पति के शोक ने सुभाषिनी को ऐसी शक्ति दी जिसके सामने संसाधन, हौसला जैसे शब्द छोटे पड़ते गए। अपने बेटे को अनाथालय भेजा ताकि वह पढ़ सके और खुद भी हाड़तोड़ मेहनत करने लगीं। सुभाषिनी ने अपनी मेहनत से एक अस्पताल खड़ा किया और आज उनका बेटा भी डॉक्टर है। जिसकी गोद में उसके पति ने दम तोड़ा उसने अपने बेटे तक को उस गोद में नहीं बैठने दिया ताकि लक्ष्य में बाधा न आए। आज बेटा डॉक्टर बनकर मां के सपने पूरा कर रहा है कि बिना इलाज कोई न मरे।

सुभाषिनी और लक्ष्मीकुट्टी वैसे बीजनुमा लोग हैं जो खुद मिट्टी में मिल जाते हैं ताकि एक फलदार वृक्ष तैयार हो। ऐसे लोग मिट्टी में दफन तक हो जानेवाली मेहनत करते हैं तभी उम्मीदों की फसल लहलहाती है। अभी तक पद्म पुरस्कारों की सूची में ज्यादातर उन डॉक्टरों के नाम होते थे जिनकी फोटो अखबारों के ‘पेज थ्री’ में विशिष्ट लोगों के साथ छपती थी और जो विशिष्टों के विशिष्ट अंगों की देखरेख अपने विशिष्टतापूर्ण सुविधाओं वाले अस्पतालों में करते थे। सत्ता से जुड़े चेहरों की सेहत की देखभाल और देश की राजधानी व अन्य महानगरों में उनके शॉपिंग मॉल जैसे अस्पताल हैं।

किसी भी गणतंत्र में स्वास्थ्य और शिक्षा की अपनी अहमियत है। सबको स्वास्थ्य और शिक्षा मिले बिना गणतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती। सत्ता से जुड़े लोगों को सेहत और शिक्षा देने वाले चमकते चेहरे हमेशा से पुरस्कृत होते देखे गए हैं। इस बार अगर हाशिए पर हौसला दे रहे लोगों को पहचान मिली है तो इससे सुखद कुछ नहीं। आइआइटी कानपुर के पूर्व छात्र अरविंद गुप्ता की पहचान माइक्रोसॉफ्ट, गूगल या फेसबुक के सीईओ के तौर पर नहीं बल्कि देश के स्कूली बच्चों के बीच ज्ञान और विज्ञान की बातें पहुंचाने के तौर पर है। खेत मजदूर सुलगति नरसम्मा कर्नाटक के जनजातीय इलाकों में प्रसव सहायिका का काम करती हैं। नरसम्मा पिछले 70 सालों से कर्नाटक के पिछड़े इलाकों में बिना किसी सरकारी सुविधा के प्रसव करवाती हैं। गर्भ में शिशु की नब्ज, सिर और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों के बारे में जान लेने की अद्भुत प्रतिभा ने उन्हें अपने इलाके में ‘जननी अम्मा’ का खिताब दिया है। ये जब पद्म पुरस्कार ग्रहण करेंगी तो इनके हाथों पैदा हुए 15000 से ज्यादा बच्चे ताली बजाएंगे।

किसी भी देश और समाज में पुरस्कारों की अपनी अहमियत है। नागरिक पुरस्कार का अर्थ है कि सत्ता आम लोगों को प्रशंसित कर रही है। यह स्वाभाविक है कि राष्टÑ उसे ही पुरस्कृत कर सकता है जो राष्टÑहित में हो, समाज के हित में हो। राष्टÑहित तो पैमाने और परिभाषाओं से परे है। लेकिन हम इसकी एक व्याख्या कर सकते हैं, वैसा हित जिसका दायरा व्यक्ति से निकल कर व्यापक हो, बृहत्तर हो। निज से निकल कर यह जितना सामाजिक होगा उतना हितकारी होगा। यानी व्यक्ति की भूमिका जब सीमित दायरे से निकल कर राष्टÑ को प्रभावित करती है तो उसे पुरस्कृत करना राजधर्म है।

अब इस राजधर्म का पालन सरकार कितना करती है यह भी एक सवाल है। यह सवाल हमेशा से उठाया भी जाता रहा है। नागरिक पुरस्कारों का उद्देश्य ही दलगत और विचारगत दायरों से ऊपर उठकर देखना था। लेकिन राजधर्म की अनदेखी कर इसका दायरा सिकोड़ा जाता रहा। जो सत्ता के इर्द-गिर्द रहे, सत्ता उसे ही पुरस्कृत करे। अंग्रेजों के समय औपनिवेशिक भारत में भी यही दायरा था। राजसत्ता के पक्षकारों को राय बहादुर से लेकर बहुत तरह के पुरस्कार और सम्मान दिए जाते थे। उस वक्त भी इसके सिकुड़े दायरे का विरोध हुआ था और बहुत से क्रांतिकारियों ने औपनिवेशिक सत्ता के उस सम्मान को नकारा था जो नागरिकों के बृहत्तर की अनदेखी करे।

केंद्र सरकार ने गुमनाम नायकों को दिल्ली में ‘दरबार हॉल’ का आमंत्रण भेजकर संदेश दिया है कि इन पुरस्कारों के लिए दरबारियों के दिन गए। पद्म पुरस्कारों में गुमनामों के गुमान से मुस्कुराते चेहरों ने पुरस्कारों की सम्मान वापसी करा दी है। इस बार पद्म पुरस्कार समारोह के दौरान ‘दरबार हॉल’ में देश के उन नागरिकों का जुटान होगा जो असली भारत की पहचान हैं। जो अपने निज से निकल कर नागरिक होना साबित कर चुके हैं। ये वे लोग हैं जो अरस्तू को सही साबित करते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।
राज्य के दिए नागरिक पुरस्कारों का संदर्भ आम में घुसे खास और समाज को देखना था। नागरिकों के बीच भेद न कर एक समावेशी समाज तैयार हो। विशिष्टता का मतलब सत्ता से जुड़े लोग नहीं समाज से जुड़ा लोक हो। विशिष्टों को दरकिनार कर हाशिए के हौसले को सलाम करने के कारण इस बार पद्म पुरस्कार खास हो गए हैं। ऐसे चेहरों को चुनने से सम्मान भी खुद को सम्मानित महसूस करता है।

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