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राजकाज-बेबाक बोल-कांग्रेस कथा: इसलिए सुनो ये कहानी

2014 में कांग्रेस एक ऐसी कथा बन गई जिससे हर तरह की प्रेरणा तसल्लीबख्श ली जा सकती है। राजनीति में क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसके लिए बस कांग्रेस की तरफ देखिए। लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस से आज क्या सीख ली जा सकती है।

बेबाक बोलकिसानों का आंदोलन और कांग्रेस की कथा भारतीय राजनीति की नई कहानी कहती है। (फोटो-अरुष चोपड़ा- इंडियन एक्सप्रेस)

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) ने किसानी, रोजगार और भ्रष्टाचार के सवालों पर जनता से मुंह मोड़ लिया था। जमीन से कटी कांग्रेस के खिलाफ जाकर जनता ने भाजपा को चुना और भारतीय राजनीति के इतिहास का रुख मोड़ दिया। 2014 के बाद कांग्रेस ऐसी कथा बन गई है जिससे हर तरह की प्रेरणा तसल्लीबख्श ली जा सकती है। राजनीति में क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसका सारा पाठ्यक्रम जानने के लिए बस कांग्रेस की तरफ देखिए। कांग्रेस ने अपने अहंकार में हर सवाल को खारिज किया था और अब वह हर जगह से खारिज की जा रही है। किसान आंदोलन के संदर्भ में देखें तो आज की सरकार के रणनीतिकार को कांग्रेस-कथा से थोड़ी सीख जरूर लेनी चाहिए। इस समय दिल्ली की सीमा पर वह कौम बैठी है जिसने अपनी हिम्मत और हौसले से पूरी दुनिया में मान और सम्मान कमाया है। किसान आंदोलन के संदर्भ में बजरिए कांग्रेस-कथा अपनी बात कहता बेबाक बोल

हमारा देश किस्से कहानियों का देश है। बच्चों को खाना खिलाने से लेकर सुलाने तक और परिवार को जोड़े रखने के लिए बुजुर्ग किस्सागोई का सहारा लेते हैं। एक कहानी पीढ़ियों तक सावधान करती हुई चलती है। कहानी राजा-रानी की हो या लालची सेठ की, अपना असर रखती है। अपना एक संदेश देती है। इस स्तंभ में हमने भी एक कथा शुरू की है। कथा थोड़ी आधुनिक है और संदेश आधुनिक जनतंत्र वाला है।

इस बार की कथा शुरू करते हैं। बस कुछ ही समय पीछे 2014 के पहले की बात है। भारतवर्ष में कांग्रेस नाम की पार्टी राज किया करती थी। उसके एक नेता थे मनमोहन सिंह। 2008 तक मनमोहन सिंह की छवि बेहद ईमानदार की हुआ करती थी क्योंकि गठबंधन धर्म की मजबूरी के कारण उन्हें जनता के हित की बात करनी होती थी, मनरेगा जैसी परियोजना लानी पड़ती थी। जनता के साथ उनका ठीक-ठाक चल रहा था। लेकिन 2009 के बाद कांग्रेस ने जनता के बीच से अपना दायरा समेटना शुरू किया। उसके नेताओं के नाम बड़े पूंजीपति घरानों और बड़े घोटालों के साथ जुड़ने लगे। उनके वित्त मंत्री की मुश्किल अंग्रेजी वाला अर्थशास्त्र कुछ लोगों तक सिमटने लगा।

अब वक्त था सितंबर 2013 का और जनता से दूर मनमोहन सिंह की सरकार ने भूमि अधिग्रहण विधेयक संसद में पास कर दिया। तब के ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने इस विधेयक को किसानों के हित में सर्वोपरि बताया। नरसिंह राव से लेकर मनमोहन सिंह तक ने किसानों और खेतों को बाजार के हवाले करने की प्रक्रिया तेजी से बढ़ाई। यूपीए के आखिरी सालों में शांत और सौम्य मनमोहन सिंह अचानक अभी नहीं तो कभी नहीं की आक्रामक मुद्रा में आ गए। सरकार से लेकर वित्त संस्थानों के मुखिया तक बाजार-बाजार का आलाप पंचम सुर में लगाने लगे। भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी से जूझती जनता से पूरी कांग्रेसी जमात ने मुंह फेर लिया।

तभी कांग्रेस से पीड़ित जनता के पक्ष में एक आवाज आती है- ‘बहुत हुआ किसानों पर अत्याचार, अबकी बार भाजपा सरकार’। भाजपा के नेता आक्रामक तरीके से कांग्रेस की बाजार परस्त और जनता के बीच से रुखसत लेने की नीति की आलोचना करने लगे। उन्होंने किसानों से लेकर त्रस्त जनता के हर उस वर्ग तक अपनी पहुंच बनाई जो कांग्रेस को राम-राम कहने को तैयार हो गए। अण्णा आंदोलन शुरू हुआ, कांग्रेस ने अपना अहंकार नहीं छोड़ा। लेकिन जल्दी ही उसे सत्ता का हर कोना छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। जल-जंगल-जमीन के हर कोने पर काम कर रही भाजपा और उससे जुड़े संगठन के कार्यकर्ताओं ने जनता का भरोसा जीत कर अपनी पार्टी को प्रचंड बहुमत का खिताब दिलाया।

2014 में कांग्रेस एक ऐसी कथा बन गई जिससे हर तरह की प्रेरणा तसल्लीबख्श ली जा सकती है। राजनीति में क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसके लिए बस कांग्रेस की तरफ देखिए। लेकिन सवाल यह है कि कांग्रेस से आज क्या सीख ली जा सकती है। 2015 में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर ही राजग सरकार को पहला झटका लगा था। लेकिन आप बार-बार कहते हैं कि यह हम नहीं कर रहे कांग्रेस का शुरू किया हुआ है। आज भी आप नए कृषि कानूनों पर कांग्रेसी नेताओं के पुराने संवाद दोहरा रहे हैं।

आज राजग सरकार किसानों से संवाद के लिए जिस तरह की रणनीति बना रही है, वह उसे अकेला ही कर रही है। सरकार के नीतिकारों को लगा था कि इस आंदोलन को देश के अन्य हिस्सों से काट कर पंजाब तक ही सीमित कर देंगे। लेकिन जिस तरह से इस आंदोलन का दायरा बड़ा होता जा रहा है उससे मौजूदा सरकार की छवि को अब तक का सबसे बड़ा नुकसान पहुंचा है। पंजाब में अकाली दल तो पहले ही साथ छोड़ गया था और अब कई क्षेत्रीय पार्टियां अपनी साख बचाने के लिए किसानों के साथ होने की बात कर रही हैं।

2014 के बाद से केंद्र की भाजपा सरकार अभी तक सफल रही है। विपक्ष को उसने पहले ही पूरी तरह विभाजित कर दिया था। तमाम क्षेत्रीय दलों के पास एक ही विकल्प था कि या तो वे भाजपा के साथ हैं, नहीं तो जनता के खिलाफ हैं। याद करें अस्सी के दशक के बाद का दौर, जब भाजपा एकदम अलग-थलग पड़ गई थी। जनता के बीच भाजपा की स्वीकार्यता में कांग्रेस की नवउदारवादी नीतियों की मुखालफत अहम थी। किसानों और रोजगार के पक्ष में वे सारे सवाल किए गए जिससे मनमोहन सिंह की छवि खराब हुई।

भाजपा ने तमाम क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन कर और विपक्ष को गोलबंद कर अपनी जो अखिल भारतीय साख बनाई है उसे इतनी जल्दी नहीं खोना चाहिए। सरकार की छवि को खास चेहरों के साथ जोड़ा जा रहा है। याद करें कि कांग्रेस ने भी ‘जमाई की कमाई’ के खिलाफ हल्ला बोल को हल्के से लिया था और बेफिक्री में जनता से मुंह मोड़ लिया था। नतीजा यह हुआ कि जनता ने हिंदुस्तान की राजनीति का ही रुख मोड़ दिया। जो जमीन कांग्रेस की थी जनता ने उस पर भाजपा का अधिग्रहण करवाया।

यह सच है कि अगर अभी इन कानूनों को लेकर सरकार पीछे हटी तो उसका सीधा संदेश जाएगा कि सुधार पीछे छूट रहा है। आज के समय में सरकार सिर्फ किसी खास भूगोल की नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिकी की होती है और यूरोप, अमेरिका से लेकर भारत तक सबसे क्लिष्ट शब्द यही सुधार (रिफॉर्म) है। भारत में अभी उम्मीद की किरण खेती की ओर ही है। जिन सुधारों की बलि कांग्रेस चढ़ी थी क्या जनता उसमें अब ‘सुधार’ की मांग नहीं करेगी? बंगाल में जनता की भावनाओं के खिलाफ सुधार लाने की कीमत तीन दशक से ज्यादा तक राज करने वाली वामपंथी सरकार ने ‘लाल किले’ के मलबे के रूप में चुकाई। सिंगूर के विरोध से उठे जनांदोलन से वाम की सरकार गई तो अण्णा आंदोलन ने कांग्रेस की सरकार को उखाड़ फेंका था।

भाजपा ने जितनी मुश्किल से इतना कुछ पाया है उसे ठीक से संभालने का वक्त आ गया है। इस बार आंदोलन के मंच पर वो कौम खड़ी है जिसने अपनी मेहनत और जज्बे से पूरी दुनिया में अपनी खास पहचान बनाई। सिख गुरु को लेकर एक लोक कथा है। एक गांव में उनका खूब आदर-सत्कार हुआ तो उन्होंने गांववालों को कहा कि तुम लोग उजड़ कर दुनिया के हर कोने में बसते रहो। नानक दूसरे गांव में पहुंचे तो वहां के लोगों ने उनके प्रति तिरस्कार का भाव रखा।

गुरु ने वहां के गांववालों को कहा कि तुम लोग इसी जगह फलो-फूलो। जब शिष्य ने इस उल्टे आशीर्वाद का कारण पूछा तो गुरु ने कहा कि प्यार करने वाली ईमानदार कौम को उजड़ते रहने का आशीर्वाद इसलिए दिया कि वह जहां जाए प्यार की फसल उगाए। ये आंदोलनकारी किसान उसी गुरु की आशीर्वाद वाली कौम है। खुद चाहे कितनी बार उजड़ जाए, लेकिन इंसानी बस्तियां बसाने का जज्बा नहीं छोड़ती है। इस कौम को खालिस्तानी कह कर खारिज नहीं किया जा सकता है। भाजपा को इन सभी कथाओं से सीख तो लेनी ही चाहिए। (क्रमश:)

दिल्ली की सीमा पर प्रदर्शन कर रहे किसानों के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में दी गई अर्जी पर सबकी नजर थी। किसानों के प्रदर्शन के खिलाफ कोरोना के खतरे को भी उठाया गया था। याचिकाकर्ता के वकील की मांग थी कि प्रदर्शन करनेवालों के प्रतिनिधि नुकसान के जिम्मेदार हों। पंजाब सरकार के वकील ने दलील देते हुए कहा कि लोकतंत्र में प्रदर्शन ही तो हो सकता है। उन्होंने कहा, ‘याद है वियतनाम युद्ध के खिलाफ अमेरिका में क्या हुआ था’?

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