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बेबाक बोल-कांग्रेस कथा: श्री हीन

सामूहिक असंतोष से निकले संघर्ष से पैदा हुए थे श्रीकृष्ण सिंह जिन्होंने नमक सत्याग्रह का रास्ता तैयार किया था। नमक की लड़ाई से तपा हुआ शरीर, अंग्रेजों के आगे हुंकार भरती आवाज के कारण ही वो स्वाधीनता संग्राम के बाद बिहार के पहले अगुआ बने।

बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी कार्यालय, पटना।

स्वाधीनता आंदोलन की जमीन से पैदा हुई कांग्रेस आजादी के बाद देश की सत्ता की स्वाभाविक वारिस हुई। आजादी के समय जनता से जुड़े नेता प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के रूप में देश को मिले। लेकिन सत्ता से जुड़ते ही कांग्रेस जमीन और संगठन से कटती चली गई। कांग्रेस ने लिफाफा मुख्यमंत्री का कुभ्यास कर जनता के उस लोकतांत्रिक अभ्यास को खत्म किया जिसमें वो अपना नेता खुद चुनती थी। चुनाव राज्यों में जनता के द्वारा होता है और मुख्यमंत्री दिल्ली दरबार का आलाकमान चुनता है। आज ‘बिहार में का बा’ की बात करें तो एक बार हमें इस राज्य के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह का शासन याद करना चाहिए। आधुनिक भारत की बुनियाद के कारखाने बिहार में लगाए गए। नालंदा की विरासत वाली जमीन पर आधुनिक विश्वविद्यालयों ने अपनी पहचान बनाई थी। एक समय श्रीकृष्ण सिंह जैसे जमीनी नेताओं वाली कांग्रेस के नेतृत्व के स्तर पर श्री-हीन होने के सफर पर बेबाक बोल

देश की पहली पंचवर्षीय योजना के सूचकांक में अव्वल रहने वाला राज्य बिहार था। संसद के जरिए नियुक्त अर्थशास्त्री श्री एपेल्लवी की रिपोर्ट में बिहार को देश का सबसे बेहतर शासित राज्य माना गया था। आजाद देश का पहला तेलशोधक कारखाना (बरौनी आयल रिफाइनरी), देश का पहला खाद कारखाना-सिंदरी व बरौनी, रासायनिक खाद कारखाना, एशिया का सबसे बड़ा इंजीनियरिंग कारखाना-भारी उद्योग निगम (एचईसी) हटिया, सबसे बड़ा स्टील संयत्र (बोकारो), बरौनी डेयरी, एशिया का सबसे बड़ा रेलवे यार्ड-गढ़हरा, गंगोत्री से गंगासागर के बीच प्रथम रेल सह सड़क पुल-राजेंद्र पुल, कोशी प्रोजेक्ट, पूसा व सबौर का एग्रीकल्चर कॉलेज, बिहार, भागलपुर, रांची विश्वविद्यालय…। ‘बिहार में का बा’ के इतर गूगल के खोजी इंजन पर श्रीकृष्ण सिंह टंकित करते ही ये सब परिणाम दिखेंगे। जवाहरलाल नेहरू ने कल-कारखानों को आधुनिक भारत का मंदिर कहा था तो इस मंदिर की बुनियाद बिहार में रखी गई थी।

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में सबसे बड़ा मुद्दा नौकरी और रोजगार का है। 2014 के बाद यह किसी राज्य का वैसा चुनाव है जिसमें भाजपा को विपक्ष के बनाए मैदान में खेलना पड़ रहा है तो उसकी वजह यही नौकरी है। तेजस्वी यादव ने अपनी चुनावी रैली में कहा कि नौकरी और रोजगार में फर्क होता है। तेजस्वी ने नौकरी और रोजगार के फर्क को बता कर वह नब्ज पकड़ी है जिसका स्पंदन आजादी के बाद से शुरू होता है। जिसके इतिहास में है कांग्रेस कथा की बुलंदी।

आजादी के बाद बिहार में पहला नेतृत्व कांग्रेस नेता डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह का था। स्वाधीनता संग्राम से निकले श्रीकृष्ण सिंह को महात्मा गांधी ने बिहार का पहला सत्याग्रही कहा था। इनकी अगुआई में आजादी के बाद बिहार को वह सब पहला मिला जिसका उल्लेख ऊपर है। लेकिन बिहार में इस मजबूत विरासत का कांग्रेस ने किया क्या? कांग्रेस को जैसे ही लगा कि हम ही हम हैं और हमारा कोई विरोध और विपक्ष नहीं है तो उसने जनता से नाता ही काट लिया। जमीन से जुड़े स्वाभाविक नेताओं की जगह अपनी पसंद के नेताओं को राज्यों की बागडोर दी जाने लगी।

कांग्रेस का दिल्ली दरबार सीलबंद लिफाफे में लिख कर भेजता था कि जनता का नेता कौन होगा। श्रीकृष्ण सिंह के निधन के बाद कवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा था कि बिहार ‘श्री हीन’ हो गया। दिनकर ने उनकी अहमियत समझाते हुए उसी वक्त कहा था कि बिहार को उनकी उदार परंपरा को कायम रखना होगा।

लेकिन उनके बाद बिहार की जमीन पर एक बार भी कांग्रेस ने श्रीकृष्ण सिंह की परंपरा के नाम पर चुनाव नहीं लड़ा। मुख्यमंत्री के पद से उतरते ही जगन्नाथ मिश्रा दिल्ली दरबार के जेहन से भी उतर गए और चुनावी मैदान में कभी भी उनका नाम नहीं लिया। इस प्रवृत्ति के कारण बिहार जैसे राजनीतिक रूप से परिपक्व समझ दिखाने वाले राज्य में अपने मजबूत संगठन के साथ उस लोकतांत्रिक अभ्यास को भी नष्ट कर दिया कि जनता अपना नेता चुनेगी। जनता को खारिज कर आलाकमान के जरिए मुख्यमंत्री चुनने की कुप्रथा की शुरुआत कांग्रेस ने ही की थी।

आज की तारीख में भाजपा और कांग्रेस को आमने-सामने रखें तो शर्तिया तौर पर भाजपा को इस मामले में सौ फीसद अंक मिलेंगे कि यहां न सिर्फ आलाकमान बनने में बल्कि नीचे के स्तर पर भी वो नए-नए चेहरों को मौका दे रही है। जहां जमीनी नेता हैं वहां उनके चेहरे और नाम पर ही भाजपा आगे बढ़ रही है।

कांग्रेस-कथा में उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव भी रेखांकित होना चाहिए जब प्रशांत किशोर उसके साथ थे। प्रशांत किशोर ने कांग्रेस नेतृत्व से मांग की थी कि या तो कोई नया चेहरा लाएं या फिर प्रियंका-राहुल में से कोई एक आगे आए। लेकिन कांग्रेस ने दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री बुजुर्ग शीला दीक्षित को आगे कर दिया था। शीला दीक्षित अपनी वृद्धावस्था के कारण ठीक से चुनाव प्रचार भी नहीं कर पाई थीं। जो व्यक्ति चुनावी प्रबंधन सिखा रहा है, लोकतंत्र की धमनी को समझ रहा है उसकी भी बात नहीं मानी कांग्रेस ने।

आज के दौर में कांग्रेस पार्टी लोकतांत्रिक आदर्श को लेकर कहीं भी नहीं ठहरती है। जब वह सभी सीटों पर लड़ती है तो लिफाफे में मुख्यमंत्री को भेजती है। यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी आज बिहार की जिन 70 सीटों पर लड़ रही है उनमें से कई ऐसी हैं जहां उसके उम्मीदवारों के लिए जीत की उम्मीद न्यूनतम है।

आज बिहार की कमजोर 70 सीटों के पीछे है 1970 के बाद का वो समय जब कांग्रेस अपने आंदोलन की जमीन से कटती चली गई और उसके खेमे में नेताओं का निर्माण होना बंद हो गया। आंदोलन की जमीन पर ही नेता का निर्माण होता है। आंदोलन आखिर कहते किसे हैं? आंदोलन की बुनियाद में सामूहिक असंतोष होता है। इससे एक सामूहिक पीड़ा पैदा होती है और उसे दूर करने के लिए जो एक छटपटाहट भरी कोशिश होती है वही कामयाब होकर जमीनी शक्ल बदलती है।

सामूहिक पीड़ा दूर करने के प्रयासों का जो राजनीतिकरण होता है उसे कैसे देखें? इसकी शुरुआत होती है दिशा देने से और वहीं से पैदा होता है नेतृत्व। जो कांग्रेस का शुरुआती नेतृत्व रहा चाहे वो क्षेत्रीय हो, चाहे केंद्रीय, वो उसी आंदोलन की देन है।

सामूहिक असंतोष से निकले संघर्ष से पैदा हुए थे श्रीकृष्ण सिंह जिन्होंने नमक सत्याग्रह का रास्ता तैयार किया था। नमक की लड़ाई से तपा हुआ शरीर, अंग्रेजों के आगे हुंकार भरती आवाज के कारण ही वो स्वाधीनता संग्राम के बाद बिहार के पहले अगुआ बने। ऐसा पूरे देश के स्तर पर था। लेकिन आगे चलकर आंदोलन वाली पार्टी का चरित्र बदल कर केंद्रीय सत्ता में एकाकार होता गया। जमीनी हकीकत से कट जाने का ही परिणाम था कि नीचे पनप रहे भयंकर असंतोष का अहसास भी पार्टी नेतृत्व को नहीं हो पा रहा था।

असंतोष को समझने के बजाए ऊपरी स्तर पर अहंकार पनपने लगा और उसकी परिणति आपातकाल के रूप में हुई। आपातकाल उसी का परिणाम था कि उच्च नेतृत्व को जमीनी असंतोष का जरा भी अंदाजा नहीं था। इंदिरा गांधी जैसी नेता सोच रही थीं कि यह सब ऊपरी परत है, कुछ विपक्षी दलों के नेताओं का असंतोष है और आपातकाल के आतंक से इनको निपटा दिया जाएगा तो सब कुछ बड़ी आसानी से निपट जाएगा।

सत्ता के आसमान से सीधे विपक्ष के कब्र में गिरीं इंदिरा गांधी ने खुद को फिर से सशक्त करने के लिए उसी बिहार की धरती को चुना था जहां से उनका बहिष्कार हुआ था। इंदिरा गांधी बिहार का राजनीतिक मूल्य समझ चुकी थीं। बिहार में बेलछी जनसंहार के बाद इंदिरा का वहां जाना और अपनी राजनीतिक पहचान वापस पाना वो कथा है जिसका आज के मौजूदा कांग्रेस नेतृत्व को पुनर्पाठ करना चाहिए। महंगाई और गरीबी जैसे नीचे के दुखों को हटाने का नारा देकर ही वो सत्ता में वापस लौटी थीं। आज के दौर में बिहार हो या अन्य हिंदी प्रदेश हर जगह कांग्रेस नेतृत्व का जमीन से कटने का संकट है।

अभी राजस्थान से लेकर मध्य प्रदेश तक में नेतृत्व का संकट बार-बार उभर कर आ रहा है। इसी संकट के कारण मध्य प्रदेश में वह जीती बाजी हार गई। कभी श्रीकृष्ण सिंह जैसे नेताओं वाली पार्टी आज नेतृत्व के स्तर पर श्री हीन है। कांग्रेस जब तक जमीन की सामूहिक पीड़ा से छटपटाना नहीं सीखेगी तब तक उसके सत्ता के लिए छटपटाने का कोई नतीजा नहीं निकलने वाला है। (क्रमश:)

राजकाज
श्रीकृष्ण सिंह को ‘बिहार केसरी’ के नाम से भी जाना जाता है। ‘बिहार केसरी’ किसी औपनिवेशिक शासन या भारत सरकार की दी हुई पदवी नहीं थी। यह उपाधि आम लोगों ने अपने जननेता को दी थी। लोग उन्हें श्रीबाबू के नाम से भी पुकारते थे। वे सामाजिक सरोकारों वाले और जनता से घिरे रहने वाले जननेताओं में से थे। उन्हें अध्ययन का बहुत शौक था। उन्होंने बिहार में कला-संस्कृति से जुड़े संस्थानों के निर्माण में भी योगदान दिया था।

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