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बेबाक बोल: सानंद के समय में

गंगा को धर्म और आरती के खाते में रख विज्ञान और तकनीक को बांध, हथियार, सॉफ्टवेयर और स्मार्टफोन बनाने में जुटा दिया। इस विज्ञान का लक्ष्य है ज्यादा से ज्यादा उत्पादों का निर्माण कर ज्यादा से ज्यादा खपत का माहौल बनाना। वैज्ञानिक चेतना से लैस एक प्रोफेसर कहते हैं कि जिस गंगा ने अपनी गोद में इंसानी बस्तियों को जन्म दिया वही इंसान आज गंगा की अविरलता को रोक रहा है। बांधों की जकड़न में बंधी नदी मनुष्य के लिए कब तक जीवनदायिनी रहेगी। जल, जंगल और जमीन को खत्म करना हमारे कथित विकास की बुनियादी शर्त क्यों बन गई। प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की चेतावनी हमारे कानों में पड़ती है कि गंगा नहीं बचेगी तो कुछ नहीं बचेगा। हम इस चेतावनी को सुनते ही उन्हें संत और तपस्वी का दर्जा दे अपने उपभोग में व्यस्त हो जाते हैं। त्योहारों के इस मौसम में जब हम प्रकृति के करीब होने की कोशिश करते हैं तो क्या स्वामी सानंद की शहादत की अहमियत समझेंगे। विज्ञान और तकनीक आज गंगा को नहीं बचा पाएंगे तो कल स्मार्टफोन भी नहीं बना पाएंगे। बेबाक बोल में इस बार स्वामी सानंद को श्रद्धांजलि।

बेबाक बोल में इस बार स्वामी सानंद को श्रद्धांजलि।

‘मैं गंगा जी को मरते नहीं देखना चाहता और गंगा को मरते देखने से पहले मैं अपने प्राण छोड़ देना चाहता हूं’। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान एक ऐसा नाम है जो पूरी दुनिया में ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में अपना नाम जोड़ता है। कंप्यूटर से लेकर मोबाइल और सड़क से लेकर अंतरिक्ष तक। वहीं से निकला एक ऐसा नाम जो न तो अमेरिका जाकर बसता है और न किसी सोशल साइट या किसी बड़ी फोन कंपनी को खड़ा करने में उसका नाम जुड़ा है। बड़े संस्थान की पहचान के साथ आसमान छूने के बजाए वह धरती पर एक नदी को बचाने के लिए अपने प्राण त्याग देता है। स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद। जीडी अग्रवाल को बाद में दुनिया ने इसी नाम से जाना। आज जब हम त्योहारों के मौसम में शक्ति से लेकर संपन्नता तक की आराधना में जुटे हैं उस वक्त जीडी अग्रवाल की शहादत क्या मायने रखती है। विज्ञान, संस्कृति से लेकर सन्यास को लेकर हमारी सतही समझ पर इनका देहावसान क्या कोई नई छाप छोड़ेगा। समाज, विज्ञान और संस्कृति को लेकर हम अपने-अपने अतिरेक स्थापित करते हुए अपना-अपना मोर्चा खोले हुए हैं। कोई सारे आधुनिक विज्ञान को नकारते हुए वेदों की ओर लौटने में ही समाज और संस्कृति का भला समझता है तो कोई अंग्रेजों के आने के पहले के सारे ज्ञान और अध्यात्म को खारिज करता है। जंगल, पहाड़ से लेकर रेगिस्तान तक, आधुनिक इंटरनेट की हैशटैग संस्कृति से लेकर कबीलाई सभ्यता तक में जीने वाले भारत के लिए विकास का रास्ता क्या होगा। हम हर बांध, सड़क और नई इमारत को विकास बता देते हैं तो खत्म होते वन और उस पर आश्रित समुदाय कहते हैं कि यह विज्ञान नहीं विनाश है। इन्हीं द्वंद्व के बीच में हमें मिलते हैं जीडी अग्रवाल।

उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग में पर्यावरण की चिंता कर रहे खौलते मन ने यूनिवर्सिटी आॅफ कैलीफोर्निया पहुंचा दिया जहां से उन्होंने पर्यावरण इंजीनियरिंग में पीएचडी की। उसके बाद कानपुर आइआइटी में बतौर प्रोफेसर पढ़ाने लगे। खुद पढ़े-लिखे, इंजीनियर बने और आइआइटी में पढ़ाने लगे। लेकिन इससे पर्यावरण को जमीनी तौर पर क्या फायदा हो रहा है। उनकी डिग्री और प्रोफेसरी ही उन्हें बेचैन कर रही थी। वे आइआइटी की बंद प्रयोगशाला से निकल वहां पहुंचे जहां से जीवन का जन्म होता है। हिमालय से निकलने वाली गंगा को अपनी प्रयोगशाला बनाया और पूरे राज और समाज को अपना विद्यार्थी। चारदीवारी से बाहर किसी बड़ी कंपनी को लाभ पहुंचाने वाला नहीं बल्कि समाज के अंतिम आदमी तक पहुंचाने वाला प्रयोग शुरू किया तो प्रोफेसर और वैज्ञानिक से संत बन गए। आखिर वह कौन सी चेतना है जो आपको वैज्ञानिक से संत बना देती है? विज्ञान और विकास की परिभाषा क्या हो? विज्ञान जब सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय की बात करता है तो वह बाजारू चोले से बाहर आ जाता है। विज्ञान और विकास जंगलों को मरुस्थल और नदियों को मैदान बनाने पर आमादा हो जाता है और एक बड़े वर्ग को अपने बुनियादी अधिकारों से वंचित करने लगता है तो इस पर लगाम लगने की बात उठती है। पीछे हटती गंगा और आगे बढ़ती इंसानी बस्तियों के बरक्स कौन बोले कि अब बहुत हुआ। कितने बांध बनाओगे और कितनी बिजली पाओगे। बिना गंगा के कितने दिन जी पाओगे तुम।

जीडी अग्रवाल उपभोग, उपभोग और ज्यादा उपभोग वाले इसी विज्ञान पर सवाल उठाते हैं। वे चेतावनी देते हैं कि गंगा के बहने का रास्ता रोकने वाली सभ्यता बहुत आगे तक नहीं बह पाएगी। गंगा ने अपने किनारे इंसानी बस्तियों को जन्म दिया और अब ये बस्तियां अपनी मां की राह का अतिक्रमण कर रही हैं। इतिहास के खाते में दर्ज नदियों किनारे बसी सभ्यताएं ही आगे बढ़ कर नया मुकाम हासिल कर सकी हैं, सभ्यता के इतिहास में अपना नाम दर्ज करवा चुकी हैं। आज वही सभ्यता बिजली, बांध, रोटी, कपड़ा और मकान के नारे में नदी का रास्ता रोक रही है। जीडी अग्रवाल बातचीत के दौरान गंगा को भगीरथी जी कहते थे। नदी के बारे में ऐसे बात करते थे जैसे किसी इंसान के भूत, वर्तमान और भविष्य की बात कर रहे हों। वैज्ञानिक चेतना से लैस यह इंसान गंगा के सारे रासायनिक समीकरण, उस पर हुए शोध और जमीनी हकीकत के आंकड़ों को एक सांस में गिनवा देता था। उन सरकारी अधिकारियों की विडंबना पर मुस्कुराते थे जिनके लिए गंगा का मतलब रटे-रटाए आंकड़े थे। वे कहते थे कि तुम्हारा कसूर भी क्या है, तुम्हें प्रशिक्षण ही इस बात का मिला है।
आज जब हरियाणा जैसे भारत के कई राज्य कथित बाबाओं के ‘डेरे’ बन गए हैं, राम-रहीम और आसाराम के श्रद्धालु अदालत से सजायाफ्ता होने के बाद भी अपने बाबाओं पर बलात्कार के आरोपों का खंडन कर उनकी भक्ति में लीन हैं तो स्वामी सानंद को हम किस तरह देखें। राजे-महाराजे वाले नाटक करने वाले कथित बाबा और कथित मां भक्तों को भोग विलास का प्रसाद वितरित करें तो सानंद का सूती भगवा कपड़ा किससे मुकाबला करे। वैसे वैज्ञानिक संस्थान और वैसे वैज्ञानिकों की भीड़ जो रोज बिजली से चलने वाले नए-नए यंत्र बनाते हैं और समाज में उसकी जरूरत भी पैदा करते हैं के बारे में स्वामी सानंद कहते थे कि इतनी बिजली क्यों चाहिए तुम्हें। इतना सामान क्यों चाहिए तुम्हें। वहीं पर्यावरण बचाने वाले ऐसे कथित संत भी हैं जो आराम से शासक का दिया मंत्रिपद ही नहीं कबूलते बल्कि उसके लिए सौदेबाजी भी करते हैं। ऐसे विज्ञान और अध्यात्म के बीच स्वामी सानंद हैं जो सिर्फ गंगा की बात करते हैं। उनका नारा था कि गंगा बचेगी तो सब बचेगा।

त्योहारों का मौसम है और कभी नष्ट न होनेवाले प्लास्टिक की थालियों में भोग लगाती कन्याएं। कहते हैं कि राम द्वारा रावण के वध की याद में दशहरा तो उनकी अयोध्या वापसी की खुशी में दिवाली मनाई जाती है। रामायण एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें शासक और समाज का प्रकृति से भी संबंध दिखाया गया है। चौदह साल का वनवास प्रकृति और मनुष्य के बीच गर्भनाल संबंध का भी प्रतीक है। उस प्रकृति को भूल आज दिवाली सिर्फ संपत्ति दर्शन का प्रतीक है। नवरात्रि पर पंडालों से आता कानफोड़ू संगीत, करवा चौथ पर धरती और चांद का शीतल रिश्ता भूल दिल की धड़कन बेतरतीब करता डीजे और दिवाली पर ज्यादा से ज्यादा उपभोग के नारे लगाते तोहफे। अपने आराध्यों के पूजन के वक्त क्या हम एक बार भी याद कर पाएंगे कि एक वैज्ञानिक संत हमारे लिए अपने जीवन की शहादत दे चुका है। स्वामी सानंद कहते थे कि गंगा नहीं बचेगी तो कुछ नहीं बचेगा। गंगा नहीं रही तो करवा चौथ भी नहीं रहेगा और न रह पाएगी दिवाली और न ईद मुबारक की गूंज। गंगा के खत्म होते ही खत्म होगी वह सफेद बर्फ की पहाड़ी और उससे आधी रात को आता हुआ घंटी बजे, घंटी बजे गाने वाला सैंटा। हमारे राम, रहीम, वाहे गुुरु, यीशु मसीह हमारी प्रकृति का ही तो हिस्सा हैं। गंगा को बचाने का मतलब है कम उपभोग। कम प्लास्टिक, कम तोहफे और कम पटाखे। विज्ञान जब गंगा से मिलता है तो स्वामी सानंद का जन्म होता है। आज त्योहार बनाम उपभोग के इस मौसम में कौन बनेगा करोड़पति से ज्यादा जरूरी सवाल है – कौन बनेगा सानंद?

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