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राजकाज-कांग्रेस कथा-बेबाक बोल: विरोध और विरोधाभास

कभी सत्ता के खिलाफ बगावत का झंडा उठाने वाला बाद में सबसे पहले अपने खिलाफ उठी हर बागी आवाज को खत्म करना चाहता है। भारतीय राजनीति में बगावत से लेकर विरोधियों से अदावत की अब तक सबसे बड़ी मिसाल इंदिरा गांधी ही रही

Congress Kathaकांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

136 साल का इतिहास रखने वाली कांग्रेस में इंदिरा गांधी एक ऐसा चेहरा रहीं हैं जिन्हें समझना भारतीय राजनीति को समझना है। पार्टी के अंदर इंदिरा गांधी ने बागी चेहरे के रूप में ही अपनी पहचान बनाई थी। आंतरिक लोकतंत्र की मांग करते हुए दिग्गज चेहरों की कतार में खुद को सबसे आगे खड़ा कर दिया। लेकिन उनका यह लोकतांत्रिक चेहरा तभी तक बना रहा जब तक कि सत्ता का निर्माण अपने हिसाब से नहीं कर लिया। सत्ता का पर्याय बनते ही उन्होंने हर उस आवाज पर काबू पाने की कोशिश की जिनसे बगावत के सुर निकल सकते थे। राजनीति की त्रासदी है कि बगावत की बयार लाने वाला बागी बदलाव के सारे रास्ते बंद कर देता है। इंदिरा भी नहीं चाहती थीं कि कांग्रेस के अंदर कोई और बागी इंदिरा पैदा हो। आज जब कांग्रेस में विकल्पहीनता का संकट है और राहुल गांधी की अध्यक्ष पद पर वापसी की तैयारी हो रही है तो बगावत से लेकर विरोधियों को खत्म करने की अदावत पर बेबाक बोल

और सब भूल गए
हर्फ-ए-सदाकत लिखना
रह गया काम हमारा ही
बगावत लिखना
– हबीब जालिब

सियासत की दुनिया में बगावत सबसे रूमानी शब्द है। हर बदलाव की इमारत इसी बगावत की इबारत से खड़ी होती है। लेकिन राजनीति की त्रासदी रही है कि कभी सत्ता के खिलाफ बगावत का झंडा उठाने वाला बाद में सबसे पहले अपने खिलाफ उठी हर बागी आवाज को खत्म करना चाहता है। भारतीय राजनीति में बगावत से लेकर विरोधियों से अदावत की अब तक सबसे बड़ी मिसाल इंदिरा गांधी ही रही हैं।

लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद जब मोरारजी देसाई को सहज रूप से प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना जा रहा था, तभी इंदिरा गांधी ने अपनी असहज दावेदारी आगे कर दी। भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी का प्रवेश बागी नेता के रूप में ही हुआ।

कांग्रेस में दिग्गजों और विकल्पों की भरमार होते हुए भी इंदिरा ने आंतरिक लोकतंत्र की मांग करते हुए खुद को स्थापित किया। जो कामराज इंदिरा को कठपुतली की तरह रखना चाहते थे समय आते ही इंदिरा ने उनकी राजनीतिक डोर अपने हाथ में पकड़ ली। आंतरिक लोकतंत्र का राग इंदिरा ने तब तक गाया जब तक कि व्यवस्था का निर्माण उनके हिसाब से नहीं हो गया। कामराज और देसाई के कब्जे से पार्टी को मुक्त करवाने तक उनका चेहरा एक बागी का ही रहा। लेकिन सत्ता की कमान मिलते ही उन्होंने सबसे पहला काम भविष्य में बगावत के रास्तों को बंद करने का किया।

इसके बाद वह वक्त आया जब इंदिरा गांधी ने दूसरी किसी इंदिरा गांधी बनने की लोकतंत्र की पौधशाला को ही रौंदने की कोशिश की। इसके बावजूद पार्टी में इंदिरा के विरोधी स्वर उभरते चले गए जिन्हें कोई तवज्जो नहीं दी गई। उन विरोधी सुरों को अपना चेहरा बचाने के लिए पार्टी छोड़ने के अलावा कोई और विकल्प ही नहीं दिया गया। नतीजतन मोरारजी देसाई ने अपना अलग रास्ता पकड़ा। गुलजारीलाल नंदा जो दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने थे, उन्होंने भी प्रधानमंत्री पद पाने की नाकाम कोशिश की थी। दोनों बार उन्हें इस पद तक नहीं पहुंचने दिया गया।

भारतीय राजनीति में इंदिरा की हत्या की त्रासदी के पहले कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की त्रासदी ज्ञानी जैल सिंह जैसे सत्ता के ‘सेवादार’ बन चुके थे। अपनी अपरिपक्व और चापलूसी की राजनीति से वे इंदिरा को काफी नुकसान पहुंचा चुके थे। ज्ञानी जैल सिंह भिंडरावाला को नजरअंदाज करने की सलाह देने वालों में से थे। जब भिंडरावाला इंदिरा सरकार के लिए भस्मासुर साबित होने लगा तो इंदिरा ने अपने फैसले को सही साबित करने के लिए जैल सिंह को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना दिया। उस समय ज्ञानी जैल सिंह का राष्ट्रपति बनना कांग्रेस से लेकर भारतीय राजनीति की कथा में अलहदा अध्याय है।

दावा किया जाता है कि राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी पर जैल सिंह ने कहा था-मैं अपनी नेता का हर आदेश मानता हूं। उनके कहने पर ही मैं राष्ट्रपति बना हूं। यह वह वक्त था जब कांग्रेस में राष्ट्रपति पद के लिए कई कद्दावर चेहरे दावेदार थे और ज्ञानी जैल सिंह उस पद के चौखटे में कहीं नहीं जंचते थे। लेकिन इंदिरा गांधी अचानक ऐलान करती हैं कि ज्ञानी जैल सिंह मेरे उम्मीदवार हैं। इस घोषणा ने आंतरिक लोकतंत्र की हत्या करने के साथ राष्ट्रपति पद को बेसाख करने का शुरुआती काम किया।

आज मुख्यधारा के किसी भी दल में आंतरिक लोकतंत्र मुखर नहीं है। क्योंकि हर सत्ता को पता है कि अगर उनके लिए कोई खतरा होगा तो यहीं से निकलेगा। जिसमें आवाज उठाने की ताकत दिख जाती है उसे शुरू से ही कमजोर करने की कवायद होने लगती है। सत्ता के हरे-भरे बाग में बगावत के उगते फूल को कांटों की तरह देखा जाता है। आज जब राहुल गांधी छुट्टी से वापसी के बाद फिर से अपने बागी सुर में आ गए हैं तो उनके हर बोल के खिलाफ सत्ता का हल्ला बोल शुरू हो जाता है। उनके बोलते ही सत्ता पक्ष का हर मंत्रालय अपना सब काम छोड़ कर राहुल गांधी की फाइल लेकर बैठ जाता है। राहुल के वार से ज्यादा सत्ता पक्ष का पलटवार बताता है कि उसे खतरे के केंद्र बिंदु की पहचान है।

राजनीतिक टिप्पणीकार अभी भी अपनी इस भविष्यवाणी पर कायम रहना चाहते हैं कि सत्ता का विकल्प जब भी मिलेगा, कांग्रेस से ही निकलेगा। आज जब क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी रियासतों में बंट चुके हैं और वामपंथ के गढ़ ढह चुके हैं तो भाजपा के खिलाफ एक राष्ट्रीय विकल्प का खतरा कांग्रेस के अंदर से ही मंडराता दिखता है। जाहिर है कि हमला वहीं होता है जहां खतरा महसूस होता है। राहुल गांधी पर सत्ता पक्ष के आक्रामक हमले को विपक्ष के जिंदा होने की उम्मीद मान कर संतोष किया जा सकता है।

यही वजह है कि आज भी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की बहाली नहीं हो पा रही है। पहले सबका मन टटोला जाता है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद के लिए मानेंगे या नहीं। उसके बाद उन्हें उम्मीदवार बनाया जाता है। चुनाव में नाकामी के बाद राहुल अपना पद छोड़ देते हैं तो मां अपने हाथ में बागडोर ले लेती हैं। फिर एक साल तक दोबारा इस तरह का माहौल बनाया जाता है कि वे स्वीकार्य हो जाएं। अब आगे उनकी फिर से ताजपोशी की पूरी संभावना बन रही है।

कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र की बात की जाए तो इंदिरा गांधी से लेकर राहुल गांधी तक के समय में एक बड़ा फर्क भी दिखता है। इंदिरा जब अपनी दावेदारी जता रही थीं तो उनके सामने कांग्रेस के कद्दावर चेहरे थे। उत्तर से लेकर दक्षिण तक ऐसे नेता थे जो पार्टी से लेकर देश की कमान संभालने की पहचान रखते थे। आज कांग्रेस में नेहरू-इंदिरा परिवार के बाहर ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी स्वीकार्यता पूरी पार्टी या बड़े वर्ग के बीच हो। शरद पवार और ममता बनर्जी जैसे जनाधार वाले नेता कांग्रेस से निकल गए। अभी के सारे नेता बिना जनाधार के हैं। अब सिर्फ आंतरिक लोकतंत्र का नहीं बल्कि विकल्पहीनता का भी मसला है।

पार्टी के अंदर स्वीकार्यता की बात हो या देश के अंदर, हम कांग्रेस में एक भी ऐसा चेहरा नहीं देख पाते हैं। कई राज्य ऐसे हैं जहां के क्षेत्रीय दलों के साथ भाजपा का गठबंधन हो चुका है। कांग्रेस हर जगह से सिकुड़ रही है।

ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय ताकत से भी नेतृत्व के उभरने की उम्मीद नहीं की जा सकती। ले-देकर पंजाब और राजस्थान में जो चेहरा है उनका अखिल भारतीय स्तर पर कोई प्रभाव नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्वहीनता का ही प्रभाव है कि अगर पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र होगा भी तो विकल्प का चेहरा नहीं मिलेगा। राहुल का विकल्प खोजने पर उनकी बहन को खड़ा कर दिया जाता है। कांग्रेस में राहुल का राज आने तक इंदिरा जैसा कोई चेहरा नहीं है जो बगावत कर विकल्प का संकल्प बने। (क्रमश:)

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