राजकाज-बेबाक बोल: लाल निशान

वाम आंदोलनों का लोकप्रिय नारा रहा है- ‘लालकिले पर लाल निशान मांग रहा है हिंदुस्तान’। इस नारे से लालकिले के प्रतीकात्मक महत्व को समझ सकते हैं। जब अंग्रेज दिल्ली आए तो मुगल शासन को खत्म कर लालकिले पर यूनियन जैक फहराया।

Jansatta-Bebak bol26 जनवरी को किसान आंदोलन के दौरान कुछ कार्यकर्ता हिंसक हो गए और लाल किले पर अपना झंडा लहरा दिया। (एक्सप्रेस फोटो)

ताशकंद में लालबहादुर शास्त्री की रहस्यमय मौत, श्रीलंका में राजीव गांधी पर हमला और भारत में उनकी हत्या, भारतीय राजनीति के इतिहास में ये कुछ उदाहरण हैं कि किस तरह देश के अगुआ तक की सुरक्षा में भारी खामियां रही  हैं। इन गंभीर मामलों के उलट राजीव गांधी के घर के बाहर हरियाणा सरकार के दो खुफिया कर्मचारियों की मौजूदगी ने हास्यास्पद तरीके से युवा तुर्क चंद्रशेखर की सरकार गिरा दी थी। किसी भी देश की आंतरिक सुरक्षा में खुफिया तंत्र की भूमिका अहम होती है। महज पुलिस और अवरोधकों के भरोसे रहने का खमियाजा है कि इस बार 26 जनवरी को देश के राष्ट्रीय प्रतीक लाल किले पर ऐसा उपद्रव हुआ जिसने हमारी पूरी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा दिया। एक साल के अंदर देश की राजधानी में दूसरी बड़ी खुफिया नाकामी पर नैतिक जिम्मेदारी किसकी होगी? कहीं इस बार भी चूक पर कार्रवाई की बात खुफिया तो नहीं रह जाएगी, यही सवाल पूछता बेबाक बोल

तू इधर उधर की न बात कर ये बता कि काफिला क्यूं लुटा
मुझे रहजनों से गिला नहीं तिरी रहबरी का सवाल है
-शहाब जाफरी
26 जनवरी को लाल किले पर किसान प्रदर्शनकारियों के कब्जे पर बात करने से पहले चलते हैं 2 मार्च 1991 की तारीख में राजीव गांधी के घर के सामने। यह राजनीति का वह दौर था जब कांग्रेस अपनी हार के बाद भी कुर्सी का सरदार तय किया करती थी। वीपी सिंह की सरकार को गिरा कर कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर की सरकार बनी थी। कांग्रेस कुछ भी कर सकती है, इस धारणा के बीच हल्ला मचता है राजीव गांधी की जासूसी का। आरोप लगाया गया कि हरियाणा की चौटाला सरकार के गृह मंत्री संपत सिंह राजीव गांधी की जासूसी करवा रहे हैं। हरियाणा सीआइडी के दो कर्मचारी प्रेम सिंह और राज सिंह को दिल्ली पुलिस ने पूर्व प्रधानमंत्री के घर के बाहर उनकी जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया। कांग्रेस ने इस पर चौटाला और केंद्र सरकार पर ऐसा हल्ला बोला कि चंद्रशेखर को अपना इस्तीफा सौंपना पड़ा।

यह है हमारे देश में खुफिया सेवा का इतिहास कि हरियाणा सरकार के दो सिपाहियों के कारण देश की सरकार गिर गई। हमारे यहां खुफिया सूचना तंत्र किस कदर मजाक का विषय है, यह इस देश की सरकारें दिखाती रही हैं। तीन साल पहले दिल्ली में सीबीआइ निदेशक की जासूसी करते पकड़े गए आइबी के अधिकारी तो सोशल मीडिया पर हास्य के हवाले हो गए थे लेकिन खुफिया तंत्र में हमारी खामी पर गंभीर सवाल उठाने की हमने जरूरत ही नहीं समझी।

पिछले दो महीने से चल रहे किसान आंदोलन को गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर परेड की इजाजत दी गई। सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक किसानों का एक जत्था लालकिले तक पहुंच गया और वहां निशान साहब लहरा दिया। दुनिया की नजर इस घटना पर पड़ी और हमारे लोकतंत्र के पूरे ढांचे पर सवाल उठ गया। इसके पहले पिछले साल फरवरी में अमेरिकी राष्टÑपति डोनाल्ड ट्रम्प के आगमन के वक्त भी हमारे खुफिया तंत्र की नाकामी सामने आई थी। नागरिकता कानून के विरोध के दौरान देश की राजधानी दिल्ली दंगों में सुलग उठी और हमारी कानून व्यवस्था को लेकर वैश्विक स्तर पर सवाल उठे।

अभी कुछ समय पहले जब हम अमेरिका के लोकतंत्र पर सवाल उठा रहे थे और उसे भारत से सीखने का उपदेश दे रहे थे तभी हमारे यहां गण और तंत्र का बड़ा टकराव सामने आ गया। हालांकि अमेरिकी सत्ता के केंद्र कैपिटल हिल में उपद्रव के बरक्स भारत के जनांदोलन की कोई तुलना नहीं की जा सकती। लेकिन सुरक्षा एजंसियों की खामियों ने मौका तो दे ही दिया है। गणतंत्र दिवस के दिन लालकिले पर आंदोलनकारियों के एक समूह के अपना झंडा फहराने को किस तरह से देखा जाए?

वाम आंदोलनों का लोकप्रिय नारा रहा है- ‘लालकिले पर लाल निशान मांग रहा है हिंदुस्तान’। इस नारे से लालकिले के प्रतीकात्मक महत्व को समझ सकते हैं। जब अंग्रेज दिल्ली आए तो मुगल शासन को खत्म कर लालकिले पर यूनियन जैक फहराया। अंग्रेजों का साम्राज्य खत्म करने के बाद लालकिले पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया गया। लालकिला दिल्ली दरबार और सत्ता का प्रतीक बन गया। किसानों और मजदूरों के वामपंथ के आंदोलन में उसी प्रतीक का इस्तेमाल किया गया राजसत्ता को किसान विरोधी बताते हुए। इस किसान आंदोलन में भी सत्ता का वह प्रतीक सामने आया। आंदोलनकारियों के बीच लालकिले पहुंचने और वहां अपने नेतृत्व का झंडा लहराने का जज्बा पनपा।

वर्तमान किसान आंदोलन के बारे में अहम है कि यह किसी खास समूह का नहीं है। एक मंच पर सैकड़ों संगठन हैं। आंदोलन की व्यापकता ने ही इसे अभूतपूर्व बनाया है। गणतंत्र दिवस की ट्रैक्टर परेड के लिए समन्वय इसकी सबसे बड़ी चुनौती थी। लेकिन इसमें कहां पर पतली गली हो जाए और वह नियंत्रण से बाहर हो जाए इसकी संभावना बनी हुई थी। यह डर नेताओं को भी था और वे पुलिस के साथ इसे साझा कर चुके थे। लेकिन किसानों की इतनी संख्या हो जाएगी इसका अंदाजा न तो आयोजक लगा पाए और न पुलिस। दिल्ली पुलिस ने जनसैलाब के साथ जिस धैर्य का परिचय दिया उसकी तारीफ होनी चाहिए। दिल्ली की सीमाओं पर पुलिस और आयोजकों दोनों ने एक-दूसरे का साथ देने की भरसक कोशिश की।

इस प्रदर्शन में हुई गड़बड़ी को साजिश में देखने की बजाए इसकी व्यापकता में देखने की जरूरत है। इसकी इतनी बड़ी व्यापकता होगी, खुफिया तंत्र ये खबर सरकार को नहीं दे सका। इससे बड़ी नाकामी क्या हो सकती है। हर तरफ आशंका व्यक्त की जा रही थी लेकिन सरकार के पास कोई सूचना नहीं थी कि इस प्रदर्शन में असामाजिक तत्व आने वाले हैं। इतने लोग आ जाएंगे इसकी खबर भी आयोजकों से लेकर गृह मंत्रालय तक को भी नहीं लग सकी। अगर आयोजन का पैमाना इतना व्यापक था तो उसके मुताबिक इंतजाम क्यों नहीं था। प्रदर्शन में हुई ज्यादातर झड़पें बेबसी का नतीजा थी। आंदोलन का मकसद अगर हिंसा होता तो वह कितने बड़े पैमाने पर होता ये सोचा जा सकता है। 26 जनवरी को किसानों के प्रदर्शन में जो हिंसा हुई वह अराजकता के कारण हुई। हम इस दिशा में नहीं तो किस दिशा में जाएंगे इस पर अफरातफरी थी। ज्यादातर को दिल्ली के नक्शे की जानकारी भी नहीं थी कि एक कदम गलत मुड़े तो पूरा कारवां गलत राह पर चल पड़ेगा।

इतने बड़े प्रदर्शन की इजाजत देने के पहले खुफिया एजंसियां लापरवाह कैसे हो सकती हैं, यह सवाल अगर आज न पूछा गया तो आगे हमें इससे बड़े नुकसान के लिए तैयार रहना होगा। नागरिकता कानून विरोधी प्रदर्शन के दौरान पूरा खुफिया तंत्र जिस तरह स्वैच्छिक अवकाश पर चला गया था उसी का दोहराव इस प्रदर्शन में देखा गया। लालकिले तक पहुंचा समूह कोई अचानक धरती से फट कर नहीं प्रकट हुआ था। अवरोधकों को तोड़ कर लालकिले तक पहुंचने की मंशा हवा में फैल चुकी थी लेकिन सरकार के गुप्तचर उसे सूंघ नहीं सके। सरकार की तय परिधि को तोड़ने की नीयत रखने वाला जत्था दिल्ली की सीमा पर सबसे आगे था और खुफिया अमला सबसे पीछे।

यह आंदोलन कल क्या रूप लेगा हम नहीं जानते। लेकिन हमारा खुफिया तंत्र इसी तरह कुंभकर्णी नींद सोता रहा तो हमें इस तरह के हालात से फिर दो-चार होना पड़ेगा। लाल किले ने खुफिया नाकामी के खतरे का जो लाल निशान दिखाया है उसे किसी भी तरह कमतरी में नहीं लिया जा सकता है। सिर्फ पुलिस और उसके अवरोधकों के भरोसे रहे तो खतरा लाल निशान को पार करता रहेगा। इस बार भी अगर खुफिया चूक में जिम्मेदारी तय नहीं हुई तो यह तंत्र कभी उठ कर खड़ा नहीं हो पाएगा।

देखते हैं, सब कुछ ठंडा होने के बाद खुफिया चूक का यह मामला विमर्श में बना रह पाता है या नहीं। इस समय मौका है, कोई तो आकर इस नाकामी की नैतिक जिम्मेदारी ले। सरकार का कोई नुमाइंदा या खुफिया एजंसियों के जिम्मेदार। नाकामी की जिम्मेदारी तय करने की यह बात खुफिया न रहे तो हमारा भरोसा इस तंत्र पर मजबूत होगा।

Next Stories
1 राजकाज-कांग्रेस कथा-बेबाक बोल: विरोध और विरोधाभास
2 बेबाक बोल-राजकाज-कांग्रेस कथा: सत्ता और संत
3 बेबाक बोल- राजकाज- कांग्रेस कथाः एक समय की बात है
आज का राशिफल
X