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राजकाज-बेबाक बोल-कांग्रेस कथा 11: गरचे दकन में…

राष्ट्रीयता और हिंदुत्व के आधार पर भाजपा अपनी जिस राष्ट्रीय पहचान को बनाने में जुटी थी उसमें वह लगातार कामयाब होती दिख रही है। हैदराबाद का छोटा चुनाव हो या तमिलनाडु का आगे आने वाला बड़ा चुनाव, इसी राष्ट्रीयता और हिंदुत्व के आधार पर वह दक्षिण में भी अपने पांव पसार रही है।

bebak bol, Rajkaajदक्षिण में बीजेपी के प्रचार अभियान की गाड़ी।

कांग्रेस अपनी राष्ट्रीय छवि के कारण पूरे भारत में राज किया करती थी। वहीं ‘दक्षिणपंथी’ भाजपा का अस्तित्व दक्षिण के राज्यों में सीमित था। लेकिन 2014 के बाद राष्ट्रीयता के महाआख्यान के साथ भाजपा ने क्षेत्रीयता की राजनीति का व्याकरण ही बदल डाला है। हैदराबाद निकाय के छोटे चुनाव से लेकर तमिलनाडु के आने वाले बड़े चुनाव तक में भाजपा राष्ट्रीय छवि, राष्ट्रीयता, हिंदुत्व और केंद्र सरकार के कार्य, इन चार तत्वों के साथ अपने पांव मजबूत कर रही है। बिहार विधानसभा चुनाव तक में सीमित प्रचार करने वाला कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व हैदराबाद के निकाय चुनावों में अपनी ऊर्जा झोंकने भला क्यों जाता? छोटे चुनावों में बड़ी मेहनत कर भाजपा अपना राष्ट्रीय आधार बढ़ा रही है और दिल्ली के शीशमहल में आराम फरमा रहे नेताओं के कारण कांग्रेस को क्षेत्रीय दल बेदखल कर रहे हैं। दक्षिण के राज्यों में भाजपा के मजबूत होते आधार और कांग्रेस की दरकती दीवार पर बेबाक बोल

इन दिनों गरचे दकन में है
बड़ी कद्र-ए-सुखन
कौन जाए ‘जौक’ पर दिल्ली
की गलियां छोड़ कर
भारतीय राजनीति में दिल्ली दरबार और उसके शीशमहल का अपना नशा है और कांग्रेस इस नशे की सबसे बड़ी पीड़ित। लगता है कि जौक की इन पंक्तियों को कांग्रेस ने अपने दिल में उतार लिया है। दक्षिण के एक राज्य के शहर में चुनाव हो रहा था। सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों का कारवां वहां पहुंचने लगा। गृह मंत्री से लेकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक वहां पहुंचे। कांग्रेस के पैरोकारों और विपक्ष ने मजाक बनाना शुरू कर दिया कि देखो एक छोटे से चुनाव के लिए कितना जोर लगा रहे हैं। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद कांग्रेस खुद मजाक बन कर रह गई। कांग्रेस के नेता शीशमहल से निकल कर जमीनी पत्थरों से टकराना ही नहीं चाहते हैं। सियासी स्तंभों में एक जुमला चलता था कि कांग्रेस एक दल नहीं एक राजनीतिक प्रवृत्ति है। लेकिन भाजपा ने भारतीय राजनीति से जिस तरह से इस प्रवृत्ति की निवृत्ति करवाई है उसका ताजा उदाहरण है दिल्ली से दूर दक्षिण का कोना हैदराबाद। आंध्र प्रदेश से अलग होकर भारत का 29वां राज्य बना था तेलंगाना।

यूपीए के शासनकाल में पांच दिसंबर 2013 को मंत्रिमंडल ने अलग राज्य के लिए बनाए गए मसविदे को मंजूरी दे दी थी। बहुत ही जल्दी फरवरी 2014 में तेलंगाना बिल लोकसभा से पास होते ही नया राज्य वजूद में आ गया। अब जिस राज्य की स्थापना में कांग्रेस की अगुआई वाले यूपीए का अहम योगदान था, कायदे से वहां कांग्रेस की पकड़ मजबूत होनी चाहिए थी। लेकिन तेलंगाना के जन्म का पूरा श्रेय लिया तेलंगाना राष्ट्र समिति ने जिसकी स्थापना 2001 में हुई थी। हाल में हैदराबाद निकाय का संपन्न हुआ छोटा सा चुनाव भारतीय चुनावी परिदृश्य में बड़ी इबारत लिख गया।

हैदराबाद के निकाय चुनाव में पहले नंबर पर तो टीआरएस ही थी लेकिन चर्चा हुई भाजपा की। एक निकाय चुनाव पर दूसरे नंबर पर आने के लिए केंद्र पर शासन करने वाली पार्टी की चर्चा क्यों? एक कहावत है ‘जहां न जाए रवि, वहां जाए कवि’। यानी जहां सूरज की रोशनी तक नहीं पहुंचती वहां भी कवियों की कल्पना पहुंच जाती है। दक्षिण भारत कभी राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस का सुरक्षित दुर्ग हुआ करता था, जहां भाजपा के पहुंचने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। जिस राज्य को बनवाने में कांग्रेस ने 2014 में अपनी विदाई से पहले हड़बड़ी दिखाई थी वहां भाजपा की जीत की मुंह दिखाई अहम हो गई है। हैदराबाद में निकाय चुनाव ही तो था? हां निकाय चुनाव ही था, और भाजपा ने उसमें अपनी पूरी ताकत झोंक दी। कांग्रेस के दिग्गज वहां दूरबीन लेकर भी नहीं दिख रहे थे और पूरे मंजर पर भाजपा का कब्जा था।

टीआरएस की पहचान क्षेत्रीय दल की है। लेकिन कांग्रेस की राष्ट्रीय पहचान का क्या हुआ? भाजपा ने राष्ट्रीयता का जो महाआख्यान रचा है उसमें अब कांग्रेस क्षेपक की तरह भी नहीं है। राष्ट्रवाद से लेकर राष्ट्रीयता तक की पहचान में भाजपा ने कांग्रेस की पूरी जमीन पर कब्जा कर लिया है। 2014 के बाद क्षेत्रीय स्तर पर जहां कांग्रेस मजबूत थी उसने उस जमीन को तो बचाए रखी है। लेकिन अब उसके पास वह राष्ट्रीय आधार नहीं बचा है जिसकी वजह से उसका अखिल भारतीय वर्चस्व था। क्षेत्रीय दल अब कांग्रेस की जमीन का अधिग्रहण कर चुके हैं जिसकी मिसाल है तेलंगाना राष्ट्र समिति।

अब हम दक्षिण की इस जमीन को आधिकारिक ‘दक्षिणपंथी’ भाजपा के नजरिए से देखें। राष्ट्रीयता और हिंदुत्व के आधार पर भाजपा अपनी जिस राष्ट्रीय पहचान को बनाने में जुटी थी उसमें वह लगातार कामयाब होती दिख रही है। हैदराबाद का छोटा चुनाव हो या तमिलनाडु का आगे आने वाला बड़ा चुनाव, इसी राष्ट्रीयता और हिंदुत्व के आधार पर वह दक्षिण में भी अपने पांव पसार रही है। हैदराबाद के स्थानीय चुनाव को भी उसने राष्ट्रीय रूप दे दिया। इसके पहले भी निकाय चुनावों में भाजपा ने अपनी ‘राष्ट्रीय’ ताकत झोंकी है जिसका फायदा उसे मिला है। पिछले सालों में स्थानीय संस्थाओं पर भाजपा ने जो मेहनत की है उसका कुल जमा फायदा वह राष्ट्रीय स्तर पर उठा रही है।

भाजपा की यह प्रवृत्ति कांग्रेस के विपरीत है और इसी के बूते वह अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस के वजूद को मिटाती चल रही है। ऐसी स्थिति में जो बची-खुची क्षेत्रीय अस्मिताएं हैं अब वह कांग्रेस के साथ जाने से परहेज कर रही हैं। कर्नाटक में कुमारस्वामी अपना अवसाद यह कह कर निकाल चुके हैं कि कांग्रेस के साथ होने के कारण उनकी छवि खराब हो रही है।

इसके साथ ही क्षेत्रीय अस्मिता के आर्थिक विकास को पुरजोर तरीके से केंद्र के साथ जोड़ कर भाजपा ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। आज आर्थिक नीति यही है कि क्षेत्रीय दलों को अपने राज्य का विकास करने के लिए केंद्र के साथ सहयोग का रवैया अपनाना ही होगा। विशेष दर्जे का मामला चुनावी मुद्दा बनता ही रहा है। दक्षिण से दूर बिहार में इसका प्रयोग देख लीजिए, जहां भाजपा ने इसी वादे के साथ गृह प्रवेश किया था। बाकी जगहों पर भी उसने क्षेत्रीय दलों के साथ यही समीकरण बनाए। इसी वजह से टीआरएस भी भाजपा के खिलाफ आक्रामक नहीं हो पाई थी।

टीआरएस को राष्ट्रीय पार्टी और केंद्र सरकार के साथ समीकरण बना कर अपना क्षेत्रीय विकास करना है। इसी कारण उसने भाजपा के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया नहीं अपनाया। वह अपना मुख्य विपक्ष भाजपा को बना ही नहीं पाई। ओड़ीशा से लेकर तमिलनाडु तक भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार को लेकर मित्रतापूर्ण भाषा बोल रहे हैं। राष्ट्रीय छवि, राष्ट्रीयता, हिंदुत्व और केंद्र सरकार के कार्य, इन चार तत्वों के सहारे भाजपा दक्षिण की राह में आगे बढ़ रही है। इन सबकी वजह से भाजपा ऐसे क्षेत्रों में घुस पा रही है जहां के राजनीतिक नक्शे पर भाजपा हाशिए पर ही रखी जाती रही थी।

बिहार जैसे अहम चुनाव में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने सीमित प्रचार किया था तो वहीं हैदराबाद के सीमित चुनाव में भाजपा ने अपनी असीमित ऊर्जा झोंकी थी। चुनाव जीतने के जज्बे से लेकर चुनाव प्रबंधन तक में भाजपा और कांग्रेस के फर्क को देखा जा सकता है। हैदराबाद के निकाय चुनाव में दूसरे नंबर पर आई ‘दक्षिणपंथी’ भाजपा के जज्बे की चर्चा राजनीतिक महफिलों में यूं ही नहीं है। चुनावी जीत का नया व्याकरण कांग्रेस कितनी जल्दी पढ़ती है, यह देखने की बात होगी। (क्रमश:)

हैदराबाद में स्थानीय चुनावों के लिए प्रभारी नियुक्त किए गए भाजपा महासचिव भूपेंद्र यादव ने टीआरएस के गढ़ वाले इलाके में जोरदार प्रदर्शन को पार्टी की नैतिक जीत बताया था। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति के एकमात्र विकल्प के रूप में उभरी है। भाजपा नेताओं ने उम्मीद जताई कि इस जीत से क्षेत्र में उनके कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा। प्रदेश के नेता बी संजय ने इसे ‘भगवा हमला’ करार दिया।

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