Opinion Renuka Chowdhury’s laugh During Modi Speech in Parliament session - Jansatta
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बेबाक बोलः राजकाज- हंसना मना है

मिथिलांचल (वर्तमान में बिहार का हिस्सा) के मंडन मिश्र का आदि गुरु शंकराचार्य से शास्त्रार्थ चल रहा था। निर्णायक थीं मंडन मिश्र की विदुषी पत्नी भारती जिन्होंने घर का काम-काज करते हुए ही शंकराचार्य को विजयी घोषित कर दिया। भारती का तर्क था कि उनके पति हार रहे थे और गुस्से में थे। उनके गुस्से के ताप ने उनके गले में फूलों की माला मुरझा दी थी। मंडन मिश्र का गुस्सा पौरुष का गुस्सा है जिसे हार पसंद नहीं और वो सवाल पसंद नहीं जिसका जवाब उसके पास नहीं है। ऐसी पुरुषवादी सोच में महिलाओं की हंसी भी मारक हो जाती है। लड़की हंसी तो फंसी वाले मर्दवादी जुमले के बीच महिलाओं का अपनी बनाई जगह पर अपने तरीके से हंसना पौरुष के सूचकांक को अमेरिका और भारत के बाजार की तरह धड़ाम कर जाता है। हंसी तो फंसी के उलट मर्दवादी सोच को उन्मुक्त, बिना फांस की हंसी क्यों परेशान कर जाती है। घर, स्कूल, गली, छात्रावास परिसरों तक इस हंसी को रोकने की कोशिश की जाती रही है। हंसी पर हुए हंगामे को लेकर बेबाक बोल।

खुशहाली में लगातार पिछड़ रहा भारत। (PHoto-Flickr)

‘माना के मुश्त-ए-खाक से बढ़कर नहीं हूं मैं
लेकिन हवा के रहम-ओ-करम पर नहीं हूं मैं’
स शेर के साथ पिछले दिनों आई फिल्म ‘लंचबॉक्स’ की नायिका याद आती है। नायिका इला भूटान जाना चाहती है। वह दुखी है क्योंकि उसका पति हंसता नहीं है। वह उसके हाथ के बनाए खाने का स्वाद भी नहीं पहचानता। और, एक ऐसा मर्द जो उसे जानता भी नहीं उसके बनाए खाने के स्वाद पर फिदा है। ‘लंचबॉक्स’ में बंद उस स्त्री की अस्मिता खिलखिलाना चाहती है। अपनी बेटी के साथ भूटान जाने के लिए गहने भी बेच देती है। उसे भूटान जाना है और हंसना है।
मध्यप्रदेश की सरकार ने ‘आनंद मंत्रालय’ खोला है। सरकार का तर्क है कि नाना-नानी, दादा-दादी की दौड़ जैसी छोटी चीजों का आयोजन करवा कर वह जनता के खुश रहने के दरवाजे खोल रही है। अब दिल्ली सरकार ने भी ‘हैपीनेस विभाग’ खोलने की योजना बना डाली है।
भूटान से नजीर बने खुशी के सूचकांक की बात हो रही थी तभी स्त्री की खिलखिलाहट से पौरुष का सूचकांक वैसे ही धड़ाम से गिर गया जैसे दुनिया भर के बाजार गिर रहे हैं। अमेरिका का बाजार गिरता है तो चीन का बाजार गिरता है और भारत का बाजार गिरता है। भारत के बाजार को संभालना है तो अमेरिका के बाजार को संभालो। जब संसद में ही स्त्री ऐसे हंसेगी तो फिर स्कूल से लेकर गली और घरों के अंदर उसे कैसे रोका जाएगा। आनंद मनाते समाज की कल्पना में स्त्री की हंसी बेदखल है। उसकी खिलखिलाहट पर वही सनातनी पाबंदी लगाई जाती है मिथकीय रूपकों के साथ।

प्राचीनकाल में पुरुषों से स्त्री के शास्त्रार्थ की कथाएं प्रचलित हैं। आदि गुरु शंकराचार्य से तर्क करते वक्त मंडन मिश्र हारने लगते हैं। हार के गुस्से की ताप से उनके गले की माला के फूल मुरझा जाते हैं। मंडन मिश्र की विदुषी पत्नी भारती मोर्चा संभालती हैं और अद्वैतवाद को मानने वाले गुरु से गृहस्थ जीवन से जुड़े सवाल पूछती हैं जिसका जवाब शंकराचार्य नहीं दे पाते हैं। शास्त्रार्थ में भारती विजयी होती हैं। इस संदर्भ में अहम है मंडन मिश्र की हार और उनका गुस्सा। पुरुष अपनी हार नहीं बर्दाश्त कर पाता। मंडन मिश्र का गुस्सा पौरुष का गुस्सा है। जहां पौरुष गुस्से में हो वहां स्त्री हंसे तो गुस्से की आग तो भड़कनी ही थी।
सदन के अंदर मोबाइल पर पॉर्न देखते पुरुष, कुर्सियां फेंकते पुरुष, मिर्ची स्प्रे फेंकते पुरुष याद हैं न। जरा उन कांग्रेसकालीन वित्त मंत्री को भी याद कर लीजिए जो साड़ियां या सौंदर्य उत्पाद के सस्ते होने की घोषणा के पहले सदन में महिला सदस्यों की तरफ देखते थे।

उस वक्त वह जनता की चुनी हुई संसद की प्रतिनिधि नहीं सिर्फ एक महिला होती है जिसे सिर्फ साड़ी और सौंदर्य उत्पादों से मतलब होता है। सेनेटरी नैपकिन पर जीएसटी लगने का विरोध सिर्फ मेनका गांधी या अन्य महिला सांसद ही करे। महिला सांसदों को साड़ी और सेनेटरी नैपकिन तक सीमित रखने की कोशिश में हंसती हुई स्त्री चुभ जाती है। सुखद है कि स्त्री पितृसत्ता की इस साजिश को समझ गई है। अभी सोशल मीडिया पर स्त्रियां अपनी खिलखिलाती हुई तस्वीरें साझा कर रही हैं, एक-दूसरे को टैग कर रही हैं कि तुम भी हंसो, खिलखिलाओ। और लीजिए, शूर्पणखा का भी आधुनिक पाठ तैयार है। बाबा वैलेंटाइन के इस हफ्ते में शूर्पणखा नायिका है।

वह वैसी स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है जो अपनी इच्छा जाहिर करने की पहल करती है। पिता ने जिन राजकुमारों को चुना उसके गले में वरमाला डालने के बरक्स ऐसी स्त्री जो पुरुष से पहल कर कहे कि मैं तुम्हारा प्यार पाना चाहती हूं। ‘प्यार मांगा है तुमसे न इनकार करो, हां मुझे प्यार करो…’ यह गाना स्त्री गाएगी तो पुरुषवादी समाज उसे कैसे बर्दाश्त करेगा। आधुनिक स्त्रियों के सामने वह प्रेम में पहल करने वाली नायिका है।

इस तरह संसद से लेकर सोशल मीडिया तक महिलाओं ने पौरुष का पाठ ही बदल दिया है। मैं भी शूर्पणखा, मी टू और ये लो खिलखिलाती फोटो। ये महिलाएं पुरुषों के उस जुमले को पुरुषों के मुंह पर मार चुकी हैं कि औरत ही औरत की दुश्मन होती है। ये औरतें एक-दूसरे को सराह रही हैं। पिछले दिनों दिल्ली विश्व पुस्तक मेले का अनुभव अद्भुत रहा था। एक स्त्री दूसरी स्त्री की किताबों के साथ सेल्फी वायरल कर रही है। स्त्री लिख रही है, स्त्री पढ़ रही है और स्त्री सराह रही है। पुरुष लेखक जल-भुन रहे थे कि ये तो हमारी जगह खत्म हो रही है। स्त्रियां तो एक-दूसरे के खराब लिखे पर भी वाह-वाह कर रही हैं, न तो जल रही हैं और न टांग खींच रही हैं।

अपने पेशे में लंबे समय से देख रहा हूं महिला पत्रकारों को साथ काम करते हुए, एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते हुए। महिला सहयोगियों से लंबे अरसे से सुन रहा हूं कि महिलाओं के साथ काम करने में ज्यादा सहजता होती है, दफ्तर में महिलाओं की संख्या बढ़नी चाहिए। ये महिलाएं उस स्टीरियोटाइप में कहां फिट बैठती हैं कि एक स्त्री, दूसरी स्त्री को आगे नहीं बढ़ने देना चाहती। रचनात्मक मंचों पर लेखिकाओं का बहनापा पुरुषों को उन्हीं के बनाए मिथकों में उलझा रहा।
औरतों की यह खिलखिलाहट ऐलान कर रही है कि हम तुम्हारे ‘सुपरवुमन’ वाले झांसे में नहीं आने वालीं। हमें फोटो टैग करो लेकिन ‘गॉरजियस’ और ‘प्रिटी वुमन’ न कहो। ये औरतें ‘प्रिटी वुमन’ और ‘ब्यूटी विद ब्रेन’ की गिरहों को खोल चुकी हैं। इन औरतों ने ‘शानदार’ होने के बोझ को भी अपने कंधों पर ढोने से मना कर दिया है। इनकी बराबरी की मांग में है औसत होना। औसत होकर ही स्त्री अपने सहज क्षेत्र में रह सकती है। शानदार मां, शानदार पत्नी और शानदार बेटी नहीं ये औसत स्त्री रहने देने की मांग कर रही हैं।

रूपकों और मिथकों में उलझी स्त्री उस छद्म परिवेश के खिलाफ खड़ी हो उठी है जो पुरुषों ने रचा है। वह उतनी ही कमजोर है और उतनी ही बलवान है जितना एक पुरुष। वह भी पुरुषों की तरह ही करियर को लेकर या तो निर्मोही है या उत्साही है। वह भी उतनी ही ईमानदार या भ्रष्टाचारी हो सकती है जितना एक पुरुष। जब राजनीति का पूरा आटा ही पौरुष के पानी से गूंथा गया हो तो स्त्री की हंसी मारक लग सकती है। पुरुष की सत्ता बहुत से सवालों पर असहाय है और उसके पास गुस्से के सिवा कुछ नहीं है तो एक हंसी उसके पौरुष को चूर करने लगती है। हाथों में पौरुष के गुस्से की जो रेत है वह स्त्री की हंसी के साथ उड़कर पुरुष की आंखों की किरकिरी बन जाती है। स्त्रियां बहुत पहले ही रवींद्रनाथ ठाकुर की ‘चोखेर बाली’ सरीखी हो चुकी हैं। वे एड़ियां उठा कर बंद दरवाजों की सांकल खोल चुकी हैं। वे सिर्फ वह रेत नहीं है जिसे जब चाहे आप फूंक से उड़ा दें, वह आपकी आंखों में घुस कर किरकिरी बनने लगी है।

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