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बेबाक बोल- राजकाज- आप की पारी

आम लोगों के साथ संगठित होकर बदलाव का मंच तैयार किया गया। तब जंतर मंतर पर नारा गूंज रहा था ‘मुझे चाहिए स्वराज’। आज पांच साल बाद जंतर मंतर पर आम लोगों को इकट्ठा होकर नारे लगाने की आजादी नहीं है। पांच साल पहले आपने इसे जनता की, कार्यकर्ता की पार्टी बनाया था और आज वह दूसरे राजनीतिक दलों की तरह व्यक्ति केंद्रित पार्टी हो गई है। लोकपाल, जनमत संग्रह जैसे शब्द भुलाए जा चुके हैं और आपका एक ट्वीट जनता को अपना फैसला सुना देता है। आम आदमी की अगुआई के लिए खास लोगों के लिए सीट आरक्षित होने पर बात क्यों होनी चाहिए जबकि यह सभी दलों में होता है और पार्टी का अंदरुनी मामला है। बात सिर्फ उस भाव को झटका लगने की होनी है जो समझ रहा था कि यह अलग है। अलग तरह की राजनीति, अलग तरह के नेता। आपने अलग तरह की बात तो की थी, अलग राह पर चले भी थे। इसी अलग को विकल्प का नाम देकर देश भर में उम्मीद भी जगी थी। लेकिन आंदोलनकारी से राजनेता बनने के पांच साल के अंदर ही आप विकल्प के संकल्प की राह पर से भटक गए। अलग होना भी एक जुमला साबित हुआ। उसी अलग से अलगाव को लेकर इस बार का बेबाक बोल।
पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ अरविंद केजरीवाल।

पिछले तीन साल में मैंने न जाने कितने लोगों को कहा कि अरविंद केजरीवाल में और कोई भी दोष हो लेकिन कोई उन्हें खरीद नहीं सकता। इसलिए कपिल मिश्र के आरोप को मैंने खारिज किया। आज समझ नहीं पा रहा कि क्या कहूं? हैरान हूं, स्तब्ध हूं और शर्मसार भी…। योगेंद्र यादव के इस ट्वीट के बाद उन आम लोगों के बारे में सोच रहा हूं जिसने अपनी लड़ाई का झंडा एक उम्मीद के हाथों में पकड़ा दिया था। रात्रिकालीन ड्यूटी कर दिन भर रामलीला मैदान में गिटार पर वंदे मातरम की धुन बजाता सूचना प्रौद्योगिकी कर्मचारी। लोगों को मुफ्त में पानी पिलाता रेहड़ी वाला और माता-पिता के साथ आए तिकोनी गांधी, नेहरु से अण्णा की नई पहचान से जुड़ी टोपी पहने बच्चे को मुफ्त में गुब्बारा देता फेरीवाला।
योगेंद्र यादव यह ट्वीट कर रहे थे और कवि ‘क्रांतिकारियों’ के चयन के लिए बधाई दे रहे थे। वे एक खास जाति के एक कुलनाम और उसी दूसरे कुलनाम को बधाई देते हुए बता रहे थे कि आम आदमी के मैदान की जंग में लगा वह अखंड भारत का नक्शा थोड़ा सिकुड़ गया है। दिल्ली के मैदान पर आगे विधानसभा चुनाव भी है और 2019 का तो बेताल सबकी पीठ पर सवार है। कुछ तो मजबूरियां रही होंगी यूं ही कोई बेवफा नहीं होता। राजनीति को स्याह और सफेद में देखने का दोरंगा चश्मा कब का टूट चुका है। वह धूसर रंग भी है जो बता रहा है कि आम आदमी उतना भी आम नहीं होता। उसमें वर्ग से लेकर जाति तक का खास जुड़ा हुआ है।

आम आदमी पार्टी राज्यसभा के लिए किसे टिकट देगी यह पार्टी का अंदरुनी मामला है। लेकिन मोहल्ला सभा से लेकर जनमत, जनमत वाला खेल तो आपने ही शुरू किया था। आपने ही तो प्रधानमंत्री के नाम के आगे ‘मौन’ लगाया था। कहा जाता है कि आम जनमानस की याद बहुत छोटी होती है। अभी आपके पांच साल ही हुए हैं इसलिए आपकी कही बातें जेहन में कौंध जाती हैं। अब आप भी फैसला सुनाने के बाद चुप्पी का विकल्प ही चुनते हैं। जहां आंदोलन का शोर था वहां अब मोबाइल पर फैसले का ट्वीट है। आम आदमी ट्वीट को पसंद कर सकता है उसे बांट सकता है, टिप्पणी कर सकता है पर अपने सवालों के जवाब नहीं पा सकता।

इन पांच सालों में आम आदमी ने वो जंतर मंतर भी खो दिया जहां लोकपाल और मुझे चाहिए स्वराज का नारा गूंजा था। किसकी है जनवरी किसका अगस्त है की तर्ज पर 26 जनवरी के पहले आप जिस जगह ठिठुरती ठंड में रजाई लेकर धरने पर बैठे थे आपके जज्बे की वो गर्माहट अभी भी याद है। उस जुनूनी आम आदमी को अपने विज्ञापन के लिए 526 करोड़ रुपए खर्च करने की जरूरत कहां थी। उसका विज्ञापन तो कबीर के दोहों की तरह एक आदमी से दूसरे आम आदमी की ओर हो रहा था। उम्मीदों की एक मानव कड़ी बनी थी जो आपको महामानव बना रही थी। उम्मीदों की एक ऐसी समांतर धारा बह रही थी जिसमें मुख्यधारा के सभी असंतुष्ट आकर मिल रहे थे। इस समांतर उम्मीद का नाम था विकल्प।
लेकिन आज पांच साल बाद आम लोगों के एक बड़े तबके को लग रहा है कि यह अलग तरह की राजनीति, अलग तरह के नेता यानी विकल्प भी एक जुमला ही निकला। कांग्रेस नेता कह रहे हैं कि आप पर राजनीति का रंग चढ़ गया। इस टिप्पणी को अगर सकारात्मक रूप में देखा जाए तो महसूस होगा कि चटख सतरंगी उम्मीद ही बेरंग हो गई है। उम्मीद थी कि आप पर राजनीति का रंग नहीं चढ़ेगा। तो कांग्रेस नेता वाली राजनीति का मतलब क्या? राजनीति का मतलब आम को जाति, धर्म और वर्ग का बैज लगा कर खास रंगरूट बना देना। और जब सब यह कर रहे थे तो आप कब तक बच सकते थे।

राजनीति करने के लिए राजनीति का रंग चढ़ना जरूरी था। अब आपके राज्यसभा के दावेदार कह रहे हैं कि सभी पार्टी एक जैसी है, कोई पार्टी खराब नहीं है। यानी कि हम अलग हैं इसे एक झटका लगा है। अब यह अलग दिखना भी तो एक वर्गीय भावना है। शादी में जाने के पहले हम दर्जी से लेकर बुटीक या परिधान विशेषज्ञ को कहते हैं कि हम अलग दिखना चाहते हैं। बहुत कोशिश होती है अलग दिखने की। लेकिन जैसे ही जलसा शुरू होता है पता चलता है कि सब एक जैसे ही अलग दिख रहे हैं। अगर आप एक जैसे अलग नहीं दिखेंगे तो फैशन के हाशिए से बाहर चले जाएंगे। मुगलई गाउन के समय में आप अपनी शादी वाला अचकन या बनारसी साड़ी नहीं पहनेंगे क्योंकि आप कुछ ज्यादा ही अलग हो जाएंगे। आप कपड़े तो युनाइटेड कलर आफ बेनेटन वाला खरीदेंगे लेकिन जलसे में सबकी त्वचा पर एक ही रंग के फाउंडेशन की परत चढ़ी होगी। इन सबके बाद कैमरा फिल्टर तो है न। सेल्फी में सबके चेहरे का रंग एक सा, एकदम बेदाग।

आप भी अब ‘टेलरमेड’ राजनीति का हिस्सा हैं। आपने रघुराम राजन से लेकर कई साफ छवियों वाले लोगों को खुद से जोड़ने की पेशकश की थी। आपकी सदिच्छा थी कि अच्छे लोगों को राज्यसभा लेकर जाएं। लेकिन अब वैकल्पिक राजनीति के भाव को ही धक्का लग चुका है। उन्हें भी डर है कि हम अलग नहीं रह पाएंगे। आम लोगों से लेकर खास तक के बीच वैकल्पिक राजनीति का सपना टूट चुका है। अब भ्रष्टाचार रहा है या नहीं यह तो दूसरी बात है। लेकिन आप खुद बोल रहे हैं कि देखिए स्कूलों का इतना बड़ा नेटवर्क है यानी शैक्षणिक नेटवर्क है। तो अब आपके पास विकल्प नहीं नेटवर्किंग है। दिल्ली से लेकर हरियाणा तक एक खास जाति और वर्ग की नेटवर्किंग है जो पता नहीं कब किससे जुड़ जाए। आज कांग्रेस से जुड़ने में फायदा है तो कल आम आदमी के अगुआ बनने में भी परहेज नहीं।

इस स्तंभ में पहले भी लिखा था कि इक्कीसवीं सदी प्लास्टिक का युग है। यह लौह या अन्य धातुओं के विपरीत लचीला होता है। आपका विकल्प किसी लौह सरीखा संकल्प नहीं बन पाया। लेकिन यह बात है कि प्लास्टिक की ही सही आपने उम्मीद तो दी थी, सपने तो दिखाए थे, कुछ अलग हट कर बात तो की थी। वरना हम आज आपके राज्यसभा उम्मीदवारों पर क्यों बात कर रहे होते। आपकी मर्जी जिसे टिकट दें, जैसे सभी पार्टियां करती हैं। और आम आदमी की उम्मीदों का क्या? वह फिर से सपने देखेगा और नए विकल्प चुनेगा। विकल्प और सपने टूटते हैं मरते नहीं। पहले भी जन्मा था और अब भी कहीं सपनों की प्रसव पीड़ा किसी विकल्प को जन्मने की तैयारी कर रही होगी। आप की पारी के लिए शुक्रिया।

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