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बेबाक बोलः राजकाज- हाशिए का हल्ला

अक्षरों के छापेखाने से निकलने के बाद से हर समय को लगता है कि उसे किताबों की जरूरत सबसे ज्यादा है। हर आगे निकलते समय को यह शिकवा भी हो जाता है कि उसका साथ किताबों से छूटने लगा है। किताबों और अक्षरों को लेकर विधागत प्रयोग पर सहमते कदम आगे बढ़ रहे हैं। भाषाई अस्मिता का सवाल तो है ही। किताबों के मेले में पाठकों के नाम स्नेहाशीष लिखते लेखकों को सामने दिख रहा आॅनलाइन पन्नों का ढांचा डरा भी रहा है तो बहुत से कलमकार ई-बुक के साथ हौसलेमंद कदमताल कर चुके हैं। हिंदी से लेकर स्त्री, दलित और पूरा हाशिया बीच बहस में है। इस बहस से निकले हासिल ने मेले में नई भाषा, नए लेखक और नए पाठ की किताबें भी दी हैं। हर बार की तरह सबसे बड़ा सवाल हिंदी का है। लोकार्पणों और सेल्फियों के बीच हिंदी के छापेखाने की कमाई का हिसाब है तो वहीं कल तक अंग्रेजी के आका आज हिंदी और बांग्ला में अपना बाजार खोज चुके हैं। इसी बीच राजकाज में औपनिवेशिक भाषा के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंकने वाले बलदेव वंशी विदा लेते हैं और हिंदी पट्टी में उनके लिए श्रद्धांजलि के दो शब्द खोजने पड़ते हैं। हिंदी और हाशिए के इसी हल्ले पर इस बार का बेबाक बोल।

दिल्ली का किताबी मेला और मेले में हिंदी। मेला आम जनता का जश्न होता है और यह किताबों का, अक्षरों का मेला है तो इस जश्न में जलवा किसका – इस पर तो पिछले कई सालों से बहस होती है।

दिल्ली का किताबी मेला और मेले में हिंदी। मेला आम जनता का जश्न होता है और यह किताबों का, अक्षरों का मेला है तो इस जश्न में जलवा किसका – इस पर तो पिछले कई सालों से बहस होती है। इसलिए किताबों के साथ भाषा भी आ खड़ी होती है। यह विश्व पुस्तक मेला है, सिर्फ हिंदी की किताबों का मेला नहीं। लेकिन कठघरे में हिंदी को तो खड़ा होना ही है। उसे अपना हिसाब-किताब देना ही है। हिंदी वाले स्टॉल पर आरोप है कि वह लोकार्पण और लेखकों (और इस बार लेखिकाओं) से मिलने में व्यस्त है लेकिन कारोबार अंग्रेजी वाले कर रहे हैं। भाई-भतीजावाद, बिक्री की रणनीति की कमी जैसे अजर-अमर सवाल। हिंदी किताबों के लोकार्पण और सेल्फी-सेल्फी के बीच खबर मिलती है कि बलदेव वंशी नहीं रहे। हिंदी और भाषा के कारोबारियों, सर्जकों और पाठकों के हुजूम के बीच बलदेव वंशी के नहीं रहने की सूचना का आना किसी विडंबना से कम नहीं। इस बार अपने इस स्तंभ में पुस्तक मेले के हिंदी वाले कोने से बलदेव वंशी को श्रद्धांजलि। एक शिक्षक, कवि और सबसे बड़ी पहचान भाषा के आंदोलनकारी की। एक ऐसा व्यक्ति जिसकी कोई इकहरी पहचान नहीं और जो इकहरे होते समाज के खिलाफ खड़ा होता है पूरे दम-खम के साथ। दिल्ली विश्वविद्यालय के ये शिक्षक भाषा पर काफी कुछ लिख रहे थे। और उनका लिखना स्वांत: सुखाय भर नहीं था। सेवानिवृत्ति के बाद वह अपनी उपलब्धियों को सहेजने और संवारने के बजाया भाषा के लिए आंदोलन की जमीन पर कूदे। संघ लोक सेवा आयोग के दफ्तर पर भाषा को लेकर सबसे लंबा धरना बलदेव वंशी की अगुआई में ही चला।

पुस्तक मेलों और हिंदी के प्रकाशकों और लेखकों से इतर संघ लोक सेवा आयोग में हिंदी का सवाल लोक का सवाल है। केंद्र के बरक्स हाशिए का सवाल है। राज-काज की भाषा ही समाज की भाषा तय करेगी। यही तय करेगी कि किताबों में किसकी भाषा होगी। अंतिम आदमी तक की बात किस भाषा में की जाएगी जो कि अंग्रेजी ही है। इसलिए भाषा से जुड़ा यह आंदोलन देश के अंतिम आदमी तक से जुड़ा आंदोलन था। संघ लोक सेवा आयोग में हिंदी के सवाल को उठाकर बलदेव वंशी ने बताया था कि जनता की भाषा किस तरह से मूक हो जाती है। उन्होंने बताया था कि हाशिए पर पड़ा एक आदमी जब निचली अदालत से उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय तक पहुंचता है तो वह किस तरह बेआवाज होता जाता है। वह बेआवाज इसलिए होता है कि उसकी लोरी की, हंसने-खेलने, शोक और सुख की भाषा अदालत की भाषा नहीं है। अपने देश में, अपनी अदालत में वह दुभाषिये पर निर्भर है। उसकी पीड़ा का क्या हल निकाला गया यह वह हथौड़े की आवाज के साथ नहीं समझ सकता है।

औपनिवेशिक गुलामी से आजाद होने के बाद भी बेआवाज रही हिंदुस्तान की अवाम को आवाज देने के लिए बलदेव वंशी ने भाषा आंदोलन शुरू किया था। एक ऐसा आंदोलन जिससे आम लोग खुद ब खुद जुड़ रहे थे। गुजरे साल के अंतिम हफ्ते में हरियाणा के फरीदाबाद में हुए एक कार्यक्रम में बलदेव वंशी से मुलाकात हुई थी। संत साहित्य पर उनके कामों को लेकर परिचर्चा थी। दादू, मलूकदास, मीराबाई, संत सहजो पर शोधपरक काम करने वाले बलदेव वंशी अभी के माहौल को लेकर चिंतित थे। मलूकदास और कबीर की विरासत वाले साहित्य में आम जनता की भाषा क्यों और कैसे गुम हो गई। उन्होंने ‘विचार कविता’ का आंदोलन शुरू किया था। मार्क्सवादी कविता से लेकर अकविता और विचार कविता। इसके मूल में था भाषा का भाव। भाषा, राज और समाज के बीच ‘लोक’ का जो गैप (अंतराल) बना है वह कब और कैसे भरेगा।

बलदेव वंशी के फरीदाबाद वाले कार्यक्रम के लिए निकल रहा था तो मेरे सहयोगी ने टोका कि आप ‘संतों’ के कार्यक्रम में जा रहे हैं? हिंदी पट्टी में संत साहित्य को लेकर जो इकहरा भाव पैदा हो गया है यह टिप्पणी उसका नमूना थी जिसे लेकर बलदेव जी हमेशा चिंता जताते थे। उन्होंने कहा कि हम भारतीय हमेशा अपनी सर्वश्रेष्ठता का राग अलापते हैं। लेकिन हमारा भारतीय समाज सदियों से उन उपेक्षित, वंचित सामाजिक समूहों की आवाज को सुनना नहीं चाहता है जिनके हाथों से तत्कालीन ज्ञान के प्रतीक छीन लिए गए थे। उनकी चिंता थी कि बुद्ध, महावीर, दयानंद, विवेकानंद, महात्मा गांधी व साधु-संतों की अथक कोशिशों और भारतीय संविधान में समानता, न्याय के संकल्पों के बावजूद यह जड़ता पूरी तरह टूटी नहीं। मध्ययुग में भक्ति आंदोलन के आलोड़न के बाद रैदास, कबीर, धन्ना, पीपा की आवाजों ने बाबा साहेब आंबेडकर जैसे नेताओं को प्रभावित किया था, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव संविधान में भी दिखा। लेकिन आज भी भारतीय समाज गैरबराबरी की जिस अट्टालिका पर खड़ा है उसमें भाषा की गैरबराबरी का भी एक मजबूत पाया है।

बलदेव वंशी के संघर्ष की आंच को याद करते हुए कड़ाके की सर्दी में लगा यह मेला थोड़ा सुकून दे रहा है। हिंदी कोने के लेखकीय मंच पर लिखनेवाले और पढ़नेवालों का आमना-सामना। कल तक लेखन की परिधि के हाशिए पर रखी जमात का हल्ला है। लिखनेवाली स्त्री और पढ़नेवाली स्त्री की सेल्फी नया पाठ गढ़ रही है। छपने-छपाने में पिछला साल तो लेखिकाओं के नाम ही रहा। हिंदी के कोने में महिलाओं के पन्ने पर आरोप-प्रत्यारोप भी बहुत हैं। जैसे किताबों का मेला और मेले में हिंदी कठघरे में रहती है तो वैसे ही हिंदी के कठघरे में स्त्री भी है। बाजार से लेकर देह तक के आरोपों के बीच इनकी आवाज का कोलाज बदलते समय की कहानी कह रहा है। वे कह रही हैं कि अभी सपने ही तो ‘डाउनलोड’ हुए हैं तो इतनी खलबली क्यों। हिंदी के मैदान में हमें खुल कर खेलने दो। लिखेंगे, सीखेंगे, पसंद किए जाएंगे और खारिज होकर भी अपनी जगह बनाएंगे। हिंदी की बस्ती में स्त्री के साथ ‘दलित दस्तक’ भी है। हाशिए पर धकेली गई जमात अपनी भाषा और आवाज के साथ है। हिंदी के लेखक मंच पर हाशिए का हल्ला शुरू है। समीक्षकों और आलोचकों के अंत्यपरीक्षण और कारोबारी आंकड़ों के अलावा इनके लोकार्पणों का अपना महत्त्व है जो रैदास और मीरा के अंतराल को भर रहा है। बेआवाजों के शोर के बीच बलदेव वंशी का नाम भर तलाशने में मिली नाकामी भाषा और आंदोलनों के आकाओं की कहानी खुद कह रही थी। सनद रहे, यह समय का पहिया है जो घूम रहा है। लगातार।

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