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बेबाक बोलः राजकाज- राग दरबारी 2

श्रीलाल शुक्ल की रचना ‘राग दरबारी’ ने पचास साल पूरे कर लिए हैं। इसके लिखे जाने के समय ही पाठकों ने महसूस किया कि शुक्ल का शिवपालगंज तो हर जगह फैला हुआ है। आज आधी सदी बाद शिवपालगंज का क्या हाल है? वृहत्तर स्तर पर देखें तो उसी शिवपालगंज के कॉलेज से तैयार सत्ता आज देश की सत्ता बन चुकी है। सहकारिता का लघु घोटाला महाबैंक घोटाले में बदल चुका है। आज भी ड्राइवर साहब का टॉप गियर देश की हुकूमत जैसा है और वर्तमान शिक्षा पद्धति रास्ते में पड़ी उस कुतिया की तरह है जिसे कोई भी लात मार सकता है, स्कूलों में पढ़ानेवाला, अस्पताल में इलाज करनेवाला अकेला है और मुआयना करने वाले दस-दस। आज भी यही लग रहा कि पुनर्जन्म के सिद्धांत का आविष्कार दीवानी अदालतों में हुआ है ताकि वादी और प्रतिवादी इस अफसोस को लेकर न मरें कि उनका मुकदमा अधूरा ही पड़ा रहा। लोकतांत्रिक संस्थानों की त्रासदी का यह महाख्यान, आज के वैश्विक समय में किस तरह से दुहरा रहा है इसी पर बेबाक बोल।

फोटो : आरुष चोपड़ा

चास साल बाद 2018 का समय। शोधार्थी रंगनाथ-2 फिर से शिवपालगंज पहुंचता है। श्रीलाल शुक्ल का शिवपालगंज जो आज एक राष्ट्रीय रूपक है वह शोध का विषय तो बनता ही है। स्वतंत्र भारत का पहला उपन्यास जो भारत के धर्म, राजनीति और समाज सबको एक कठघरे में रखता है। आजाद भारत की वह त्रासदी जो अपने समय का सबसे बड़ा हास्य पैदा करती है। राजनीतिक संस्थाओं के खोखलेपन का एक जटिल रूप हमारे सामने आता है। इसी शिवपालगंज पर रंगनाथ-2 आज फिर से शोध करना चाहता है।
रंगनाथ-2 आज उस शिवपालगंज में क्या देख रहा है? इस शोधार्थी ने प्रेमचंद के गोदान का गांव भी देखा है और फणीश्वरनाथ रेणु के मैला आंचल का मेरीगंज भी देखा है। प्रेमचंद और रेणु के गांव औपनिवेशिक गुलामी के गांव हैं। शुक्ल का शिवपालगंज पहला अखिल भारतीय गांव है जिसमें भारत का हर गांव दिख जाता है। एक ‘गंजहे’ के मुताबिक पूरी हिंदुस्तानियत दिख जाती है।
प्रेमचंद के गोदान के गांव की बात करें। इसकी कहानी औपनिवेशिक दौर में पूंजीवाद के जरिए सामंती समाज के परिवर्तित होने को वृहत्तर स्तर पर देखती है। जबकि आजादी के बाद राष्ट्रनिर्माण के सपने और विकास योजनाओं को जमीन पर उसके यथार्थ में देखने (सूक्ष्मतर स्तर) की अगली कोशिश है मैला आंचल। इन दोनों से अलग सूक्ष्मतर स्तर पर देखने वाली उसी की अगली कड़ी में है ‘राग दरबारी’।

रंगनाथ-2 देख रहा है कि उसी शिवपालगंज से तैयार सत्ता आज देश की सत्ता बन चुकी है। सत्ता शिवपालगंज के संस्थानों को शिकार बनाकर अंतरराष्ट्रीय पूंजी के दौर में खेल रही है। सहकारिता (कोआॅपरेटिव) की जगह अनंत शून्य वाले गणित में अंतरराष्ट्रीय पूंजी का अलजबरा है। बगल के इंटरमीडिएट कॉलेज में इस बार 26 जनवरी पर गाना बज रहा है, ‘जब जीरो दिया मेरे भारत ने…देता न दशमलव भारत तो चांद पर जाना मुश्किल था’। ‘राग दरबारी’ में एक ही महिला पात्र है और बच्चे न के बराबर, शायद ये तत्कालीन भ्रष्टाचार के चौखटे में फिट नहीं बैठ रहे थे।

लेकिन रंगनाथ-2 के शिवपालगंज में पचास साल बाद महिलाओं और बच्चों का भी कोलाहल है। स्कूल में बहुत से बच्चों को मध्याह्न भोजन नहीं मिला है क्योंकि उनके पास आधार कार्ड नहीं है। ये बच्चे स्कूल ही इसलिए जाते थे क्योंकि दोपहर का खाना मिलता था लेकिन बिना आधार कार्ड के ये देश के लिए खतरा हैं। लेकिन बहुत से शादीशुदा जोड़ों ने सरकारी योजना के तहत फिर से शादी कर ली है क्योंकि सरकार की तरफ से कुछ जेवर और गृहस्थी का सामान मिल रहा है। यह विवाह घोटाला सामने आया क्योंकि महिलाओं ने शिकायत पहुंचाई कि सरकार की तरफ से जो बिछुए मिले हैं वे चांदी के नहीं गिलट के हैं। रंगनाथ-2 सोच रहा है कि इसे घोटाला कहें तो नीरव या चोकसी की करतूतों के लिए क्या शब्द निकालें। वह निष्कर्ष पर पहुंच चुका है कि यह बैंक घोटाला नहीं है यह तो पूंजी का खेल है और हम सब रंगमंच के खिलाड़ी।

रंगनाथ-2 आज वैद्यजी की बैठकी को फिर से देख रहा है। शुक्ल ने पचास साल पहले शिवपालगंज में कहा, ‘जाति प्रथा मिटाने की सारी कोशिशें अगर फरेब नहीं हैं तो रोमांटिक कार्रवाइयां हैं’। आज पचास साल बाद यह रोमांस खूब चल रहा है। घुड़चढ़ी के जुर्म में दलित को गोली मारी जा रही है तो वोट के लिए भैया और बहनजी साथ आ रहे हैं। लोहिया जी और जेपी वाला सारा समाजवाद सिने तारिका में आकर सिमट गया है। राज्यसभा सीटों की जब कंगाली है तो जाति-जाति खेल रहे शिवपालगंज की अगुआई के लिए यही चेहरा मिला। पचास साल बाद वैद्यजी का कठपुतली उम्मीदवार सनीचर के बजाए मनोरंजन जगत से आयात किया गया है।

रंगनाथ-2 पचास साल पहले के नोट्स लेता है, ‘कुछ दिन पहले इस देश में यह शोर मचा कि अपढ़ आदमी बिना सींग-पूंछ का जानवर होता है। उस हल्ले में अपढ़ आदमियों के बहुत-से लड़कों ने देहात में हल और कुदालें छोड़ दीं और स्कूलों पर हमला बोल दिया। हजारों की तादाद में आए हुए ये लड़के स्कूलों, कॉलेजों यूनिवर्सटियों को बुरी तरह से घेरे हुए थे। शिक्षा के मैदान में भभ्भड़ मचा हुआ था। अब कोई यह प्रचार करता हुआ नहीं दिख पड़ता था कि ऊंची तालीम उन्हीं को लेनी चाहिए जो उसके लायक हों, इसके लिए ‘स्क्रीनिंग’ होनी चाहिए। इस तरह से घुमा-फिराकर इन देहाती लड़कों को फिर से हल की मूड पकड़ाकर खेत में छोड़ देने की राय दी जा रही थी। पर हर साल फेल होकर, दर्जे में सब तरह की डांट-फटकार झेलकर और खेती की महिमा पर नेताओं के निर्झरपंथी व्याख्यान सुनकर भी वे लड़के हल और कुदाल की दुनिया में वापस जाने को तैयार न थे। वे कनखजूरे की तरह स्कूल से चिपके हुए थे और किसी भी कीमत पर उससे चिपके रहना चाहते थे।’

इस अंश को पढ़ कर वह शिवपालगंज के युवाओं के बारे में पूछता है। वे दिल्ली में सिर मुंडा कर कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) के सामने प्रदर्शन कर रहे हैं। ये कॉलेज से निकले हैं और खेती नहीं करना चाहते हैं। अब गांव के बच्चों ने इसलिए बोर्ड परीक्षा छोड़ दी क्योंकि नकल नहीं करने दिया गया। त्रासदी वाला हास्य शिवपालगंज-2 में भी है। बोर्ड के परीक्षार्थी का रिजल्ट पूछने के लिए फोन किया तो जवाब मिला कि थाने में हूं। फोन करनेवाले ने कहा कि समझ गया तूने टॉप किया है। पचास साल पहले जो शिक्षा व्यवस्था रास्ते में पड़ी कुतिया की तरह थी, जिसे कोई भी लात मार सकता था, आज उससे निकले लोग हर तरह से लतियाये जा रहे हैं।

शिवपालगंज को लेकर रंगनाथ-2 का शोध आगे बढ़ गया है। यहां राशन भ्रष्टाचार के कारण आटा तो मुफ्त नहीं है लेकिन असीमित डाटा निशुक्ल है। वैश्विक पूंजी के खेल के बाद विश्वविद्यालय और कॉलेज अब वाट्सऐप यूनिवर्सिटी की भूमिका में आ गए हैं। इस वाट्सऐप यूनिवर्सिटी ने फोटोशॉप के सिलेबस से कई रुप्पन बाबुओं को दीक्षित किया है। भंग पिए सनीचर सच और अफवाह का रोमांस करा तर्क और ज्ञान की आॅनर किलिंग करवा रहे हैं। पचास साल बाद आखिर बदला क्या है? शोधार्थी देख रहा है कि यहां लंगड़ की संख्या बढ़ती जा रही है। आज मल-मूत्र त्याग पर जो तवज्जो है उससे लगता है कि शिवपालगंज कितना फैल गया है।

सामंती-पूंजी गठजोड़ की सत्ता का चरित्र निर्मम व्यंग्य के साथ अगर बिना किसी उम्मीद और संभावना के हो सकता था तो वह इस आख्यान में है। सामंती दौर के बाद राष्टÑवाद यानी आजादी एवं जनतंत्र के निर्माण की प्रक्रिया में राष्टÑीय-पूंजीवाद से गठजोड़ और फिर अंतरराष्ट्रीय पूंजी के बीच की कड़ी है ‘राग दरबारी’। प्रेमचंद के यहां जो आदर्श है वह रेणु तक आते-आते मर जाता है और उसके बाद बच जाता है निपट यथार्थ। रंगनाथ-2 भी संवाद दोहरा रहा है, ‘यहां के झंझटों में मत फंसो, भागो, भागो, भागो। यथार्थ तुम्हारा पीछा कर रहा…सारे मुल्क में यह शिवपालगंज ही फैला हुआ है। पाखंड और मक्कारीवाली व्यवस्था में किस तरह के चरित्र पैदा हो रहे हैं…’।

इस यथार्थ को कथानक के बजाए चरित्रों और संवादों या कथावाचक के जरिए व्यंग्य में ही सटीक तौर पर पकड़ा जा सकता था। शोधार्थी पूछ रहा है कि पचास साल के बाद क्या हुआ है इस कथानक में? आधी सदी पहले जो विलक्षण था आज आम भाषा हो गई है। सोशल मीडिया में और तमाम कार्टूनों के जरिए इसे समझा जा सकता है। राजू श्रीवास्तव से लेकर रंगीला तक इसके दृश्यगत रूप हैं। आज सब कुछ ज्यादा ही ‘गंजहा’ हो गया है।

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