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बेबाक बोलः राजकाज- कहते हैं कि…

अब अपना इख्तियार है चाहे जहां चलें/रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम...। देवी प्रसाद त्रिपाठी ने राज्यसभा में लोकतंत्र के अभिभावक के तौर पर भूमिका निभाई। राजनीति के मैदान से आया कलम का ऐसा साधक जिसने होमर से लेकर वाल्मीकि, जफर, मीर, गालिब, कालिदास के उद्धरणों से संसद को गुंजायमान रखा। राजनीतिक और वैचारिक छुआछूत बरतने वालों को आईना दिखाया। संसद के अमूल्य समय को गतिरोध की भेंट चढ़ानेवाले सांसदों को अपने विदाई भाषण में खरी-खरी सुना गए कि लोकतंत्र तो इंसानी रिश्तों में बसता है। राजनीति के मैदान में आधी सदी तक ‘राजनीतिक रूप से सही’ की पारी खेलनेवाले त्रिपाठी उस राह से जुदा हो गए जहां से वह पूरे देश के होकर पूरे देश के लिए बोलते थे। असहिष्णुता के लंबे दौर में सहिष्णु राजनीति की राह दिखानेवाले त्रिपाठी का विदाई भाषण आने वाली संसदीय पीढ़ी के लिए एक सबक हो सकता है। इस सबक का हमारा पाठ इस बार के बेबाक बोल में।

विदाई भाषण में डीपी त्रिपाठी

चर्चा बिलकुल हुई ही नहीं’…राज्यसभा में एक महिला सांसद भाषण के बीच में ही अपना गुस्सा तब जाहिर कर बैठती हैं जब अपने विदाई भाषण में डीपी त्रिपाठी ने कहा कि पिछले छह सालों में संसद में महिलाओं के मुद्दे पर गंभीरता से चर्चा नहीं की गई। त्रिपाठी के भाषण के बीच एक स्त्री की यह प्रतिक्रिया ही एक सांसद के रूप में उनकी ‘राजनीतिक रूप से सही’ यात्रा पर मुहर लगा जाती है। त्रिपाठी ने राज्यसभा में दिए अपने आखिरी भाषण में पूछा कि महिलाओं से लेकर न्यायपालिका और मीडिया तक पर चर्चा करने में भारतीय संसद इतना झिझकती क्यों है? कामसूत्र वाले भारत में यौनिकता पर कभी गरिमामय ढंग से चर्चा नहीं की गई जबकि गांधी और लोहिया इस पर बात कर चुके हैं। क्योंकि बात जब महिलाओं को बराबरी देने की आएगी तो हम यौनिकता के सवालों से नहीं बच सकते हैं।

बहादुरशाह जफर, मीर, गालिब, कालिदास, टॉमस ट्रांसट्रोमर को एक साथ उद्धृत करनेवाले देवीप्रसाद त्रिपाठी की संसद से विदाई, राजनीति के आधे युग की विदाई का समय था। आम तौर पर संसद में साहित्य और कला के क्षेत्र के लिए सीटें आरक्षित रहती हैं क्योंकि इससे जुड़े लोग आम तरीके से चुनाव जीत कर संसद नहीं पहुंच सकते हैं, इसलिए साहित्य, समाज और कला-संस्कृति के सवालों को उठाने वाले अगुआओं के लिए संसद ने पीछे के दरवाजे का इंतजाम किया। लेकिन संसद में साहित्य, समाज और सरोकारों के सवालों को जिसने बुलंद किया उसने शुरुआत राजनीति के आगे के दरवाजे से की थी। आम धारणा है कि साहित्य और कला की समझ वाले लोग राजनीति में नहीं होते हैं और इस क्षेत्र से जुड़े लोग जब राज्यसभा में आते हैं तो गौरतलब दखल नहीं दे पाते हैं। लेकिन राजनीति के मैदान से आने वाले त्रिपाठी ने संसद में साहित्य, कला और सरोकारों के मुद्दों को जिस बेहतरीन राजनीतिक समझ के साथ उठाया उसने इन्हें सबसे अलग कर दिया।

संसद में आगे के दरवाजे से आने के बाद भी पीछे वालों के लिए आवाज उठाने के कारण ही इनके चेहरे को ‘राजनीतिक रूप से सही’ की पहचान मिली। यह राजनीतिक रूप से सही रहने की संवेदना इन्हें साहित्य की समझ के कारण ही मिली। साहित्य का सही और संवेदनशील अध्ययन आपको चेतना देता है। साहित्य उस ज्ञान से लैस करता है जो आपको चीजों की पहचान करना सिखाता है। इसी चेतना से वे भेदभाव और गैरबराबरी के पारखी बने। महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर संसद में दूर तक पहुंचनेवाली आवाज उठाई।
‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’ जैसे तंज के तीर त्रिपाठी पर लगकर टूट जाते हैं। यह वह चेहरा है जिसने कभी राजनीति से अपना मुंह नहीं छुपाया है। सत्ता के गलियारे में घूमने वाला वह व्यक्ति जो यह जानता है कि सत्ता द्वारा छीने गए अधिकारों की वापसी यहीं से करानी है। राजनीति गंदी है, यह कह कर मीर, गालिब और तुलसी के शब्दों के साथ बाजीगरी नहीं की, बल्कि मीर और तुलसी की राजनीतिक समझ को डिकोड किया। वे संसद में वह सौंदर्य ढूंढ़ते हैं जो कालिदास अपनी नायिका में देखते हैं। तुलसीदास के रामरचितमानस में सीता की गरिमा को देखकर राम को जो अहसास होता है, वही अहसास वे सत्ता के गलियारे में ढूंढ़ते हैं। दादरी से लेकर बाबरी तक के असहिष्णु समय में ‘कागजी क्रांति’ का सत्ता से कदमताल कराया। रोहित वेमुला की मौत को ‘सांस्थानिक हत्या’ कहा। ललित कला अकादमी पर सरकारी नियंत्रण के खिलाफ मुखर हुए।

विदाई भाषण में त्रिपाठी याद दिलाते हैं कि आपातकाल में लालकिले से जांच के बाद जब तड़के उन्हें तिहाड़ जेल ले जाया गया था तो वहां सुबह चार बजे उनका स्वागत करने वाले अरुण जेटली ही थे जिन्होंने कहा कि आओ तुम्हारा इंतजार कर रहा था। जेटली, हरकिशन सिंह सुरजीत से लेकर ज्योति बसु तक की चर्चा कर उन्होंने बताया कि लोकतंत्र का मतलब ही तमाम राजनीतिक विविधताओं का जुटान है। फिर विचारों की विविधता से परहेज क्यों? उन्होंने 2013 के उस समय को याद किया जब तर्कशास्त्री नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के खिलाफ लाए प्रस्ताव में जेटली उनका कंधे से कंधा मिला कर साथ दे रहे थे। त्रिपाठी ने इसे अपने संसदकाल का सबसे सुखद समय की संज्ञा दी।

इसके साथ ही उन्होंने संसद में उस समय को सबसे दुखद बताया जब एक बहस में उन्होंने कालिदास को उद्धृत करना चाहा था और उन्हें यह कह कर रोक दिया गया कि यह लैंगिक रूप से पक्षपाती होगा। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि होमर, गालिब या कालिदास के उद्धृरण रोकने से क्या हासिल होगा। पुराने को समझे बिना हम नई राह कैसे रच सकते हैं। उनका हमेशा से मानना था कि वैचारिक और राजनीतिक छुआछूत लोकतांत्रिक राह को सिकोड़ती है। इस सिकुड़ी राह में संसद में बहस के लिए रास्ता भी नहीं बचा है और पूरा संसद सत्र गतिरोध की भेंट चढ़ जाता है। संसद नहीं चलने देने की प्रवृत्ति को अलोकतांत्रिक बताते हुए इसकी राह खोजने की अपील की।

त्रिपाठी का मानना रहा है कि साहित्य और राजनीति के बीच दूरी पैदा करने वाले अधिनायकवाद की राह पकड़ते हैं। वे आज भी प्रेमचंद की परंपरा में विश्वास करते हैं कि साहित्य राजनीति के आगे चनलेवाली मशाल है। सत्ता और समाज के द्वंद्व की राजनीति के गलियारों में घुसपैठ करा विमर्श के नए रास्ते तलाशने की कोशिश की। सदन में हाजिरी और भागीदारी कितनी जरूरी है यह त्रिपाठी से सीखा जा सकता है। आपातकाल के समय से लेकर जेएनयू में छात्र ्न्न्न्न्न राजनीति की अगुआई से मिले राजनीतिक प्रशिक्षण ने इन्हें जनपक्षधरता की कलम भी पकड़ाई। ये सीख देते हैं कि अच्छी राजीतिक समझ आपको साहित्य का अच्छा विद्यार्थी बनाती है, तो साहित्य का अच्छा विद्यार्थी राजनीति का अच्छा मास्टर बनता है।

ये दोस्तों के बीच डीपीटी के नाम से जाने जाते हैं और इन्हें करीब से जाननेवाले जानते हैं कि ये अद्भुत धैर्य के मालिक हैं। इनके बारे में एक बार पहले भी अपने स्तंभ ‘बकलम खुद’ में लिख चुका हूं, ‘इनका धैर्य इतना अप्रतिम है कि अगर असहिष्णुता पर भी उन्हें संवाद की संभावना खोजनी है तो वे पूरी सहिष्णुता से वक्त का इंतजार करते हैं और फिर उसपर अमल की कोशिश वक्त से आगे न बढ़ कर वक्त का इंतजार करना किसी भी कोशिश की दिशा में महत्त्वपूर्ण है। ये उन सियासतदानों में से हैं जो अपने लिखे को कहते हैं, कहे को जीते हैं। कलमबद्ध प्रतिबद्धताओं से मुकरने वाले इतिहास से बेदखल होते हैं। अपनी कलम के साथ डटे रहकर वे इतिहास तो लिख ही रहे हैं’। आज संकीर्णता के इस माहौल में आप वो चेहरा हैं जो हमारा हाथ पकड़ कर हमें वृहत्तर की ओर ले जाता है। संसद से आपकी विदाई लोकतंत्र के अभिभावक के जाने जैसा है।

देश की सबसे बड़ी पंचायत में यह कोई पहला आखिरी वक्तव्य नहीं था। ऐसे देश में जहां सांसद जाति, धर्म और दूसरी संकीर्ण वजहों के कारण चुने जाते हों वहां इस भाषण को सहेजने की जरूरत है ताकि आने वाली संसदीय पीढ़ियों को सबक मिल सके। इसकी सामग्री ही नहीं, इसका अंदाज भी अलग है। इसके मुकाबिल तो बस यही है, ‘हैं और भी दुनिया में सुख्नवर बहुत अच्छे/कहते हैं कि गालिब का है अंदाजे ब्यां और’।

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